Sunday, November 17, 2019 03:23 PM

विष्णु पुराण

पिवंति पितरस्तेषा भास्करात्तर्पर्ण तथा।।

आदते रश्मिभिर्यंतु क्षितिसस्थ रसं रविः।

तमृत्सृजित भूतानां पुष्ठयर्थ सस्यबुद्धते।।

तेन प्रीणात्यशेषाणि भूतानि भगवानरविः।

पितृदेवमनुष्यादीनेवमाप्याय यत्यसौ।।

पक्षतृप्ति तु देवानां पितृणां चैक्मासिकीम।

शश्वतृप्ति च मर्त्याना मैत्रेयाकः प्रयच्छति।।

कृष्णपक्ष के क्षीण होने पर पितरगण दो कला वाले चंद्रमा का पान करते रहते हैं। इस प्रकार सूर्य के द्वारा पितरों का तर्पण किया जाता है। अपनी किरणों के द्वारा सूर्य पृथ्वी से जितने जल को आकर्षित करते हैं, उनको प्राणियों के पोषण और अन्न की वृद्धि के लिए पृथ्वी पर ही बरसा देते हैं। इस प्रकार सूर्य समस्त प्राणियों को प्रसन्न करते हुए देवगण आदि सभी को तृप्त करते हैं। हे मैत्रेय जी!  इस प्रकार से भगवान सूर्य देवताओं की पाक्षिक पितरों मासिक और मनुष्यों की दैनिक तृप्ति के कारण हैं।

रथत्रिचक्र सोमस्य कुंदाभातस्य वाजितः।

वामदक्षितौं युक्त दश तेन चरत्यसौ।।

वीथ्याश्रयाणि ऋक्षाणि ध्रूशयारेण वेगिना।

हासबुद्धिक्रमस्तस्य रशमीना सविता र्यथा।।

अर्कस्येव हि तस्याश्चा सकृद्यूक्ता वहिप्त ते।

कल्पमेक मुनिश्रेष्ठ वारिगर्भसमुद्रभदा।।

क्षीण परत सुरै सोमभाप्याय यति दीप्तिमान।

मैत्रेयैककलं संत रश्मिनकेन भास्करः।।

क्रमेण येन पोतोऽसौ देवैस्तेन निशनरम।

आप्याययत्नुदिन भास्करो वारितस्करः।।

तंभृत चार्धमासेन तत्सोमस्थ सुधामृतम।

पिवंति देवा मैत्रेय सुधाहारा यतोऽमरा।।

त्रयस्त्रिशत्सहुस्राणि त्रयस्त्रिशच्छतानि च।

त्रयस्मित्तवा देवाः पिवंति क्षपदाकरम।।

श्री पराशर जी ने कहा, चंद्रमा के रथ में तीन पहिए हैं, उसके बाएं और दाएं ओर कुंद पुष्प के समान सफेद रंग के दस घोड़े जुते हुए हैं और रथ के ध्रुव के आकार पर स्थित हैं। चंद्रमा उसी वेगवान रथ पर चढ़कर भ्रमण करते हैं तथा नागवीथि आश्रित अश्विनी आदि नक्षत्रों को भोगते हैं। सूर्य के समान इनकी किरणें भी न्यूनता और वृद्धि को प्राप्त होती हैं।

हे मुनिवर! सूर्य के समान उनके घोड़े भी समुद्र गर्भ से उत्पन्न होकर एक बार जोते जाने पर एक कल्प तक रथ को खींचते रहते हैं। हे मैत्रेय जी! देवताओं द्वारा पान किए जाने के कारण क्षीण हुए कला मात्र चंद्रमा को सूर्य अपनी किरणों द्वारा पुनः पुष्ट करते हैं। जिस क्रम से देवता उनको पार करते हैं, उसी क्रम से शुक्ल पक्ष की प्रतिपज से जल का अपहरण करने वाले सूर्य उन्हें नित्यप्रति पोषित करते हैं। इस प्रकार अर्द्धमास में संचित चंद्रमा के उस अमृत का देवगण पुनः पान करते हैं क्योंकि उन देवताओं का आहार वही अमृत है। तैतीस सहस्र तैतीस सौ तैतीस देवता चंद्रमा के उस अमृत को पीते रहते हैं।

कलाद्वयावशिष्टस्तु प्रविष्टः सूर्यमंडलम।

नमाख्यरश्मीवसति अमावस्या ततः स्मृत।।

अप्सु तस्मिन्नहोरान्नै पूर्व बिशित चंद्रमा।

जब चंद्रमा कलामात्र रह जाता है और सूर्य मंडल में प्रविष्ट होकर उसकी अमा नाम की किरण में रहता है, तब उस दिन को अमावस्या कहते हैं।