Saturday, August 24, 2019 07:48 AM

विस्थापन के दंश के निशां अभी बाकी हैं

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

भाखड़ा बांध जिला को विस्थापन के गहरे दंश दे गया, जिसके जख्म आज तक जिंदा हैं। 58 सालों से सियासी व्यवस्था के आश्वासनों को सुनते उस दंश के जख्म और गहराते चले गए, मगर विस्थापन की त्रासदी से पैदा हुई समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हुआ। विस्थापित लोग दशकों से महज सियासी बंदरबांट का ही शिकार होते आए हैं...

बिलासपुर जिला के लिए नौ अगस्त, 1961 का दिन इतिहास में दर्ज हुए पन्नों पर एक अलग ही कहानी बयां करता है। जब राजा दीपचंद द्वारा सन् 1653 में अपनी रियासत कहलूर की राजधानी सतलुज नदी के किनारे बसाए गए पुराने बिलासपुर शहर की गोविंद सागर झील में जल समाधि दे दी गई थी, यह झील 65 वर्ग मील में फैला विशाल जलाशय है, जो भाखड़ा बांध के निर्माण के साथ वजूद में आई है। सतलुज नदी पर निर्मित 1700 फीट लंबा व 740 फीट ऊंचा तथा 1325 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता वाला भाखड़ा बांध भारत का दूसरा और विश्व का तीसरा सबसे ऊंचा बांध है। इस बांध के निर्माण के लिए 12 हजार परिवारों को बुरी तरह बेघर करके उनके 354 गांवों को जलमग्न करने के साथ जिला के सदियों पुराने कई मंदिर, महल जैसी अनेक पुरातन सांस्कृतिक धरोहरें और कई परंपराओं से सुसज्जित चंदेल वंश की कहलूर रियासत का इतिहास जिसके पन्नों पर पुराने बिलासपुर की गौरवमयी गाथा अंकित थी, इस झील की गर्त में दफन कर दिया गया।

निस्संदेह बिलासपुर के भू-भाग पर बना यह बांध आधुनिक भारत का नवीन मंदिर फायदेमंद साबित हुआ, लेकिन हिमाचल के पड़ोसी राज्यों के लिए और बिलासपुर के लिए कुर्बानियों का शिलालेख साबित हुआ। यह आजाद भारत की पहली  पनबिजली परियोजना थी और तत्कालीन सरकार का पहला बड़ा कदम कि इस बांध के पानी व बिजली ने पड़ोसी राज्यों की तकदीर व तस्वीर के साथ उनकी मरुस्थलीय भूमि की पूरी फिलॉसोफी को ही बदल दिया।  60 व 70 के दशक में देश की जिस कृषि क्रांति का जिक्र होता है, उसका आगाज इस बांध की तामीर पर हुआ, जिसकी बुनियाद बिलासपुर की कुर्बानियों पर स्थिर है। देश की उस हरित क्रांति के आगाज का अंजाम राज्य के तीन जिलों के लोग आज तक भुगत रहे हैं। जब देश अनाज की घोर कमी से जूझ रहा था, उस समय बिलासपुर के लोगों ने अपने घर व अपनी हजारों बीघा जमीन बिना किसी विरोध व समझौते के त्यागकर भारत सरकार के हवाले करके खुद बेघर होकर देशहित में सहमति दिखाकर इतनी बड़ी कुर्बानी देकर अपनी दरियादिली की एक अनूठी मिसाल पेश की थी। इस कुर्बानी का जिक्र अकसर चुनावी मंचों से जरूर होता है। चुनावी घोषणा पत्रों में भी उल्लेख किया जाता है, लेकिन मलाल इस बात का है कि छह दशकों से राज्य को कोई भी सियासी रहनुमा या सियासी दल राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर इस कुर्बानी को पूरी तफसील से परिभाषित नहीं कर पाया। यह बांध जिला को विस्थापन के गहरे दंश दे गया, जिसके जख्म आज तक जिंदा हैं। 58 सालों से सियासी व्यवस्था के आश्वासनों को सुनते उस दंश के जख्म और गहराते चले गए, मगर विस्थापन की त्रासदी से पैदा हुई समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हुआ। विस्थापित लोग दशकों से महज सियासी बंदरबांट का ही शिकार होते आए हैं। क्या हमारे देश तथा पड़ोसी राज्यों के शासक इस बात की परिकल्पना करेंगे कि इस बांध के निर्माण से कृषि क्रांति के साथ औद्योगिक क्रांति का भी उदय हुआ। बांध से पैदा हुई बिजली से स्थापित उद्योगों ने उनके राज्यों की अर्थव्यवस्था की कायनात को भी बदल दिया। उस प्रोजेक्ट के लिए साठ के दशक में बिलासपुर को कुर्बान कर दिया, लेकिन जब बात प्रदेश की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी तथा 4200 करोड़ रुपए की रॉयल्टी पर आती है, तो उसके लिए ये राज्य हिमाचल को ठेंगा दिखाने में गुरेज नहीं करते, क्योंकि हिमाचल ने इन राज्यों को पूरी शिद्दत से कभी अपना प्रभावशाली नेतृत्व दिखाया ही नहीं। आज बिलासपुर को विस्थापितों का जिला कहना गलत नहीं होगा। भाखड़ा बांध के लिए विस्थापन, एसीसी सीमेंट की फैक्टरी तथा कोलडैम के लिए विस्थापन और जो कसर रह गई थी, वह कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन ने पूरी कर दी। बांधों ने जहां जिला को विस्थापन दिया, वहीं एसीसी सीमेंट फैक्टरी तथा फोरलेन ने भारी मात्रा में प्रदूषण फैला दिया। विस्थापित लोग सालों से हाथों में ज्ञापन लेकर अपने हक के लिए प्रशासन के पीछे घूम रहे हैं, मगर धरातल पर कोई स्थायी हल नहीं निकल रहा है। देश की प्रगति के लिए दी गई कुर्बानियों को अकसर मुआवजों की बैसाखियों पर टांग दिया जाता है, लेकिन मुआवजे के चंद नोटों से कोई अपने अतीत के गर्त में गए सुनहरे पलों को नहीं खरीद सकता।

इस बांध के निर्माण से जिला मुख्यालय को जोड़ने वाला भंजवाणी पुल, जिसे कहलूर रियासत के राजाओं ने सन् 1889 में बनवाया था, इस झील के आगोश में समा चुका है। इसके लिए मुश्किलों से जूझ रहे हजारों लोग वर्षों से आवाज उठा रहे हैं। मार्च 2007 में बैरी दड़ोला पुल का भी शिलान्यास हुआ, लेकिन कार्य उसके आगे नहीं बढ़ पाया। बिलासपुर महर्षि वेद व्यास व मार्कण्डेय जैसे ऋषियों की तपोस्थली रही है। सदियों पहले इसका नाम व्यासपुर ही था, उस प्राचीन संस्कृति को भी यह बांध अपनी जद में ले चुका है। पुरातन शैली के बने ऐतिहासिक पौराणिक मंदिर भी दशकों से झील में खड़े होकर पुनर्स्थापन के लिए सियासत के आश्वासन सुनकर अपने वजूद की बाट जोह रहे हैं। कत्ला मछली के लिए प्रसिद्ध इस झील में विस्थापितों के ख्वाबों का अक्स भी मौजूद है। यदि इसकी अधोसंरचना को विकसित किया जाए, तो वाटर स्पोर्ट्स से संबंधित तमाम खेलों को बढ़ावा मिल सकता है।

अतः सरकारों को चाहिए कि इस बांध के लिए देशहित में बलिदान देकर विस्थापित हुए लोग जो आज भी न्याय के लिए जद्दोजहद में लगे हैं, उनकी समस्याओं पर विचार हो। नहीं तो नौ अगस्त का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और झील में डूबे इतिहास से उपजे लोकगीत विस्थापन का दर्द बयां करते रह जाएंगे तथा सियासत उन पर होती रहेगी।