Thursday, November 14, 2019 02:39 PM

व्यंग्य, व्यंग्य है इसमें फूहड़ता को कोई जगह नहीं

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना-2

अतिथि संपादक : अशोक गौतम

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावनाएं क्या हैं, इन्हीं प्रश्नों के जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचल में व्यंग्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस सीरीज की दूसरी किस्त...

विमर्श के बिंदू

* व्यंग्यकार की चुनौतियां

* कटाक्ष की समझ

* व्यंग्य में फूहड़ता

* कटाक्ष और कामेडी में अंतर

* कविता में हास्य रस

* क्या हिमाचल में हास्य कटाक्ष की जगह है

* लोक साहित्य में हास्य-व्यंग्य

डा. हेमराज कौशिक

मो.-9418010646

हिंदी गद्य में व्यंग्य की अपरिहार्यता असंदिग्ध है। हिंदी गद्य की अन्य विधाओं में इसका उपयोग हो रहा है। व्यंग्य की परिधि बढ़ी है। हास्य व्यंय की धारा निरंतर प्रवाहित है। हिंदी में कबीर के साहित्य में व्यंग्य का प्रखर रूप देखा जा सकता है। भारतेंदु युग से प्रारंभ होने वाली व्यंग्यधारा अनेक पड़ाव से गुजरती हुई विकसित हुई है। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, श्री लाल शुक्ल, नरेंद्र कोहली, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जन्मेजय, सुशील सिद्धार्थ, सूर्यकांत नागर, हरीश नवल प्रभृति व्यंग्य साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। व्यंग्य लेखन चुनौतीपूर्ण कार्य है। श्रेष्ठ व्यंग्य लेखन के लिए व्यंग्य दृष्टि, अनुकूल भाषा और अभिव्यंजना कौशल अपेक्षित होता है। वह सतत अध्ययन, व्यापक अनुभव और गहन दृष्टि से अर्जित होता है। व्यंग्य अपने परिवेश के सामाजिक-राजनीतिक पाखंड, छल-छद्म, विसंगतियों और विद्रूपताओं से उत्पन्न है। विपरीत परिस्थितियों, असंगतियों और विडंबनाओं के प्रतिरोध स्वरूप व्यंग्य का आविर्भाव होता है। व्यंजना एक आलोचनात्मक यथार्थ है, जो सामाजिक-राजनीतिक आदि विविध क्षेत्रों में व्याप्त बुराइयों की आलोचना करता है और उनके प्रति वितृष्णा उत्पन्न कर सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। असंगतियों और मिथ्याचारों के प्रति आक्रोश व्यक्त करता है। एक श्रेष्ठ व्यंग्य में ‘सेटायर’ और ‘ह्यूमर’ का समन्वित रूप होता है। वक्रोक्ति, ब्याज स्तुति आदि अवयव भी व्यंग्य को पुष्ट करते हैं। व्यंग्य भाषा, विचार, घटना आदि, किसी पर भी आधारित हो सकता है। एक प्रभावोत्पादक व्यंग्य में संयमित भाषा, हास्य, वाग्वैदग्ध्य, मित कथन, सटीकता, संक्षिप्तता जैसे तत्त्व विद्यमान रहते हैं। ऐसे व्यंग्य अपने लक्ष्य को साधते हुए गहरा प्रभाव डालते हैं। व्यंग्य की मूलभूत संरचना में व्यंग्यकार की मनोस्थिति, परिवेश के प्रति दृष्टिकोण, समयसामयिक परिस्थितियों की विपरीत स्थितियां, असंतोष आदि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यंग्य केवल मात्र चाक्षुश संवेदना से ही रूप ग्रहण नहीं करता, अपितु भोगे हुए यथार्थ की उपज भी होता है जिसमें अपनी शैलीगत विलक्षणता से उन विडंबनाओं को रूपायित करते हुए उल्लेखनीय प्रभाव उत्पन्न करता है। व्यंग्य की हंसी में विसंगति के उपहास का भाव होता है। साथ में उसमें मार्मिक टीस भी होती है। किसी शब्द, सूक्ति, वाक्यांश में ऐसी अनूठी व्यंग्जना होती है कि पाठक की हंसी फूट पड़ती है। एक कुशल व्यंग्यकार में लोकमंगल की चेतना निहित होती है, जिसमें सामाजिक प्रतिबद्धता होती है। वह व्यक्ति की अपेक्षा सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों पर प्रहार करता है। व्यंग्य की सफलता व्यंग्यकार की संतुलित दृष्टि, बुद्धि की प्रखरता के साथ निर्वैयक्तिकता पर अवलंबित होती है। सीधे, सपाट और व्यक्तिगत द्वेष से युक्त सामाजिक सरोकार की उपेक्षा करने वाले प्रहारात्मक व्यंग्य आलम्बन के मन में वैर भाव ही उत्पन्न करते हैं। ऐसे व्यंग्य जो आलम्बन पर शब्द शक्तियों के आश्रय से सतही हास्य, अमर्यादित कटाक्ष, फूहड़ता, फूहड़ भाषा को निमंत्रण देते हैं उन्हें व्यंग्य की कोटि में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। व्यंग्य लेखन के नाम पर द्विअर्थी रसीले शब्द या वाक्य, फूहड़ता से युक्त हास्य व्यंग्य की साहित्यिकता, उद्देश्यपरकता के लिए घातक होते हैं। वस्तुतः व्यंग्य समाज, साहित्य, राजनीति, धर्म, मानवीय दुर्बलताओं, विकृतियों पर तीव्र प्रहार करता है। व्यंग्य सामाजिक अन्याय, शोषण या सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों से क्षुब्ध होकर तीव्र कटाक्ष कर आलम्बन या सामाजिक पर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है। व्यंग्य की इस पीठिका में हिमाचल प्रदेश में व्यंग्य लेखन पर दृष्टिपात करें तो यहां अनेक रचनाकार व्यंग्य लेखन में सक्रिय हैं। कुछ व्यंग्य संग्रह भी सामने आए हैं और पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य सृजन निरंतर प्रकाश में आ रहा है। रतन सिंह हिमेश का व्यंग्य सृजन के क्षेत्र में स्मरणीय योगदान है। अखबारी दुनिया में ठगड़ा राम बकलम खुद, ठुणिया राम, ठगड़े का रगड़ा आदि आज भी स्मृतिपटल पर हैं। सुदर्शन वशिष्ठ, डा. ओम प्रकाश सारस्वत, गुरमीत बेदी, अजय पाराशर, अशोक गौतम प्रभृति व्यंग्यकार हिंदी व्यंग्य साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। अशोक गौतम निरंतर व्यंग्य सृजन में रत हैं। उनके अब तक 24 व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में उनके व्यंग्य प्रायः प्रकाशित होते रहते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में बहुत से रचनाकारों के व्यंग्य प्रकाशित हो रहे हैं। सभी का यहां उल्लेख संभव नहीं। फिर भी यह कहा जा सकता है कि व्यंग्य साहित्य धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है और हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही है। समय के साथ व्यंग्य एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थान बना रहा है।

मौलिक रचना का रहस्य

सुदर्शन वशिष्ठ

मो.-9418085595

आज तक समझ नहीं आया, ये मौलिक रचना क्या होती है! भाषा-संस्कृति विभाग में था तो सम्मेलन होने पर लेखक-कवियों को पत्र भेजे जाते : ‘‘कृपया अपनी अप्रकाशित, अप्रसारित और मौलिक रचना का पाठ करें.......आप समारोह में कवि के रूप में आमंत्रित हैं।’’ बहुत पहले यह भी लिखा जाता था कि रचना सरकार की नीतियों के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। बाद में जब साहित्यकार समझदार हो गए तो इसे हटा दिया गया। ये अप्रसारित या अप्रकाशित का गतिरोध तो किसी को भी रोक नहीं पाता, ‘मौलिक’ तो न हम जानते थे, न वे समझते थे। उस समय पत्रिकाओं में भी ऐसी ही मांग की जाती थी। साथ एक प्रमाणपत्र देना होता था ः ‘‘मेरी अमुक रचना अप्रकाशित, अप्रसारित और मौलिक है। ‘बगुला’ पत्रिका में छपने से पूर्व इसका प्रकाशन अन्यत्र नहीं करवाया जाएगा।’’ ईमानदार लेखक एक पत्रिका को रचना भेजने के बाद इंतजार करते रहते। तब तक वह एक प्रकार से ब्लॉक हो जाती थी। यदि एक रचना दो पत्रिकाओं में छप जाए, संपादक बुरा मान जाते और लेखक को छपास का भूखा या न जाने क्या क्या घोषित कर देते। भाषा विभाग में सेवक हुआ तो जाना, साहित्यकार ब्रह्मा होता है। वह रचना करता है तो साहित्यकार भी सर्जक है। सरकार के भाषा विभाग के सेवक उसके चारण हैं, भाट हैं। उसकी सेवा के लिए सरकारों ने भाषा विभाग पुलिंग में और अकादमी स्त्रीलिंग में खोल रखी है। सरकारी सेवक भी भैया कम नहीं होता, ऐसा घुमाएगा कि पता नहीं चलेगा सेवक कौन है और आका कौन। सरकारी सेवक तो बैठा रहेगा एक जगह सिंहासन पर, साहित्यकार बिना कार के चक्कर काटता जूते घिसाएगा। सेवाकाल के दौरान यह भी जाना कि कवि जैसा दमदार और दबंग प्राणी दूसरा नहीं। पहले सम्मेलन में ‘बेताब’ जी से एक कविता सुनी। खूब वाहवाही लूटी। दो महीने बाद दूसरे सम्मेलन में भी वही कविता सुनी। लगातार कई सम्मेलन बदले, कवि बदले, वह कविता नहीं बदली। आलम यह कि रिटायर भी हो गया, ‘बेताब’ जी वही एक कविता सुनाते रहे। वैसे तो राष्ट्रीय स्तर के समारोहों में, टेलीविजन पर बहुत नामी-गिरामी कवि-शायरों को एक ही कविता सुनाते सुना है। बरसों से एक ही पढ़ रहे हैं। भारत एक बड़ा और बड़े दिल वाला देश है, अतः यहां ऐसा चल जाता है। बहुत से स्थायी अध्यक्ष भी हर जगह एक ही भाषण देते हैं। मुख्य विषय कोई भी हो, उसे अपने बने-बनाए भाषण से जोड़ देते हैं। एक सज्जन तो सभागार में बैठे अपने चेलों को पहले ही पट कर देते। वे पढ़ने के लिए उठते ही तो कोई चिल्ला उठता ः जनाब! वही सुनाइए ‘छलछल  करती.....थलथल करती....।’ धर्मसंकट में पड़े से वे हैरानी से सभागार में नजर दौड़ाते....अरे आज तो बिल्कुल ताजा कविता लाया था, चलो आदेश हुए हैं तो वही सही। विषयांतर की तरह बात कहीं और चली गई। मुद्दा तो मौलिक होने का था। मौलिक पता नहीं हिंदी का मूल शब्द है या अंग्रेजी के किसी शब्द का अनुवाद है। हिंदी शब्दकोष देखा तो कई अर्थ दिए थे ः आदिम, आधारभूत, चरित्रीय, प्रधान लक्षणयुक्त, मुख्यकोटीय, पाठसंगत। एक जगह अर्थ दिए बिना ही ‘मौलिक रचना’ लिखा था। एक जगह ‘मौलिक’ के अर्थ में अकृत्रिम, अनुदित से लेकर असंशोधित कृति भी लिख डाला है। इन अर्थों में कोई भी मौलिक रचना पर फिट नहीं बैठता था। अंत में एक अर्थ स्वरचित भी दिया था। आयोजनों में सबसे आसान है कवि सम्मेलन करवाना। ओउम नमो कविताए नमः बोल कर कवि सम्मेलन करवा लीजिए। लेखक या आयोजक को न किसी तैयारी की जरूरत, न विषय निर्धारण की माथापच्ची। न लेखकों को कुछ तैयार करना है और न आयोजकों को। कविताएं तो तैयार ही होती हैं। साथ लाने की भी जरूरत नहीं। बहुत सारे तो जुबानी ही बांचते हैं। उधर दबंग कवि एक ही कविता बांचते चले जाते हैं। पहले सरकारी पारिश्रमिक बहुत कम था (अब भी संतोषजनक तो नहीं है)। अतः वे कहते जब तक इस बहुमूल्य कविता की कीमत पूरी नहीं हो जाती, इसे ही बांचेंगे। यह तो कालजयी बन चुकी है, आप सरकारी बाबू इसकी कीमत चुका ही नहीं सकते। तीस साल के सेवाकाल के बाद रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले कवि सम्मेलन में ‘बेताब’ जी ने वही कविता सुनाई जो तीस साल पहले सुनाई थी और जो अब एंटीक और कालजयी हो गई थी :

छलछल करती....थलथल करती

तर तर करती नहर सरीखी

वह उतरी नदी सी मेरे मन में....

छलछल....छलछल...छलछल....छलछल।

बांह उठा उन्होंने उंगलियों के इशारे से लहरें बनाईं। लगा, सब भीग गए। सभागार में सन्नाटा छा गया। जब तक वे लहर को तोड़ बांह नीचे लाते, एक ओर से कोई चिल्लाया ः वाह! वाह!! वाह!!! चहुं ओर से शोर गूंज उठा ः वाह! वाह!! वाह! वाह!!

सार्थक व्यंग्य नहीं तो हम नहीं

बद्री सिंह भाटिया

मो.-9418478878

व्यंग्य हमारे जीवन का अहम अंग है। कड़वी से कड़वी बात व्यंग्य में कही जा सकती है। रोजमर्रा के कार्यकलापों में अधिकांश वार्ताएं व्यंग्य में ही होती हैं। व्यंग्य कहे गए शब्द के प्रभाव के तहत उसकी प्रभावान्विति के फलस्वरूप भीतर ही भीतर चोटिल होकर मनन करने को विवश करता है। पीड़ा महसूस करवाता है, आदमी को भीतर ही भीतर छटपटवाता है। प्रत्युत्तर की तलाश भी करता है। व्यंग्य संवेदना भी प्रकट करता है। कही गई बात से कई बार मुस्कुराए बिना नहीं रहा जा सकता। व्यंग्य में कही गई बात का उपहास भी उड़ाया जाता है। इससे हास्य उत्पन्न होता है। इसलिए व्यंग्य को हास्य भी माना जाता है। व्यंग्य राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिक होते हैं। इसमें पारिवारिक और सामाजिक अथवा धार्मिक रूढि़यों पर कटाक्ष भी होते हैं। नेताओं की रोजमर्रा की जिंदगी और उनके भाषणों के प्रभाव से उपजे शब्द मुहावरे में बदल व्यंग्यकार की सहज टिप्पणी से ध्यानाकर्षण का सबब बनते रहे हैं। पारिवारिक स्थितियों में पत्नी के माध्यम से सामाजिक विद्रूपताओं और विसंगतियों को बहुधा प्रकट किया जाता है। व्यंग्य जब किसी अवस्थिति पर उपहासात्मक ढंग से प्रकट किया जाता है तो हास्य उत्पन्न होता है। यह हास्य बहुत से रचनाकारों ने संपूर्ण रूप से व्यंग्य ही समझ लिया है। वे गप्प और गल्ल-बात में अंतर न कर गप्प को तरजीह देकर अपनी बात कहते हैं। उनकी यह बात एक बारगी देखने, सुनने, पढ़ने में मन के किसी कोने में कुलबुलाहट भरी गुदगुदी भर कर क्षणिक हास्य उत्पन्न करती है, मगर उसका स्थायी प्रभाव नहीं होता। प्रायः यह सभी को ही एक-सा प्रभावित भी नहीं कर पाती। कहे गए शब्द और उसकी बानगी तथा प्रकटीकरण एक भंगिमा खड़ी करते हैं। एक भाव उत्पन्न करते हैं जो समय और सामाजिक अवस्थिति के अनुसार उचित न बैठ वीभत्स प्रभाव प्रकट करता है और श्रोता अथवा पाठक के मन में कसमसाहट सी पैदा करता है। वह मन के बाहर हंसता है और भीतर गाली देता है। अपने किसी जाने-पहचाने सामाजिक विरोधी या फिर राजनीतिक विरोधी के कार्य व्यवहार पर किया गया ऐसा व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष क्षण भर के लिए भला लग सकता है। मन में ख्याल आ सकता है कि बहुत ही सही कहा या मजा आ गया, किंतु उसकी शैली और भाषा को जब सामाजिक पैमाने पर परखा जाता है तो वह संपूर्ण रूप से फूहड़ता ही होता है। व्यंग्य का उद्देश्य फूहड़ता नहीं है। यह गप्प अथवा चुटकुले की श्रेणी में नहीं आता जो क्षणांश के लिए हास्य उत्पन्न कर श्रोता या पाठक को हंसा भर देता है। वर्तमान समय में जीवन में व्यंग्य अहम भूमिका निभा रहा है। कुछ हास्य कार्यक्रम केवल सहज हास्य पैदा करने के लिए ही होते हैं। उन्हें सामाजिक विसंगतियों से कुछ लेना-देना नहीं होता। इनमें द्विअर्थी बातें सुनाई जाती हैं। राजनीतिक हास्य सम्मेलनों में भी जो कविताएं सुनाई जाती हैं, वे न गद्य होती हैं न पद्य। बस एक हल्की-फुल्की तुकबंदी और क्षण भर की वाहवाही। बेशक वे टिप्पणियां तात्कालिक कार्य-व्यवहार पर होती हैं, मगर वे फूहड़ता ही अधिक होती हैं, व्यंग्य नहीं। व्यंग्य की कोई सीमा नहीं होती, मगर उसके प्रभाव क्षेत्र में एक व्यापक सामाजिक वर्ग आता है जो प्रादेशिक से होता देशीय और विश्वव्यापी होता है। वहां जो परख होती है उसमें अमुक जनपद अथवा समाज का चरित्र प्रकट होता है। आज आवश्यकता है कि शब्द शक्ति के तीसरे तत्त्व व्यंजना को बनाए एवं बचाए रखा जाए ताकि जीवन-जगत में व्यंग्य की भूमिका बनी रहे।

बांठड़ा : लुड्डीमय साहित्यिक आयोजन

मंडी में पिछले 4 से 6 अक्तूबर तक छोटी काशी महोत्सव हर्षोउल्लास से मनाया गया। कई विभागों, प्रशासन एवं अकादमी के संयुक्त तत्त्वावधान  में मनाए गए इस उत्सव में कला, पुस्तक, पहाड़ी चित्रकला, प्रदर्शनी, व्यास आरती, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों की धूम रही। विविध अखबारों में इस उत्सव की खूब चर्चा-परिचर्चा रही। लुड्डी ने वाहवाही लूटी, नाटी ने धमाल मचाया, बांठड़ा, बुड्ढा परंपरागत नृत्य देखने हेतु दर्शक कुर्सियों से चिपके रहे। परंपरागत व्यंजनों का स्वाद चखने के लिए भीड़ उमड़ी रही तथा अद्भुत कलाकृतियां देख कर लोग अचंभित होते रहे। छोटी काशी में हुए इस उत्सव को साहित्य एवं संगीत का अनूठा संगम भी कहा गया और हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी मंडी को पर्यटन के मानचित्र पर उभारना इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य बताया गया है। बहरहाल यह महोत्सव अपना उद्देश्य पूरा करने में कितना सफल रहा व कैसा रहा, अपने को इस पर टिप्पणी करने के काबिल नहीं समझता। जिसने करवाया व जिसने किया, सब कुछ अच्छा ही किया होगा। सब जगह ये नाचीज़ मौजूद नहीं रहा, न ही मेरे पास संजयी  दिव्य दृष्टि है जो दूर बैठे-बैठे इस कार्यक्रम का आंखों देखा हाल आप तक पहुंचा सकूं। भाइयो व बहनो, यह नाचीज़ इस महोत्सव के  साहित्यिक आयोजन का विवरण आमंत्रित कवि की हैसियत से दे रहा है जिसे दो दिवसीय इस आयोजन में आयोजकों एवं प्रतिभागियों को 2 दिन लगातार झेल कर अंतिम सत्र में एक कविता पढ़नी थी। जिसे मंडी के साहित्य, संस्कृति व  लोक साहित्य में कोई रुचि नहीं होती और जिसने साहित्य, संस्कृति एवं पहाड़ी भाषा के उत्थान के लिए कोई कार्य नहीं किया होता, वह इस आयोजन में लगातार दो दिन बैठने का दुस्साहस नहीं कर सकते थे, लेकिन कई साहित्यकार लेखकों ने धैर्य एवं संयम रखकर इस समारोह के सभी सत्रों में अपनी उपस्थिति निरंतर बनाए रखी। परंतु उसके बावजूद मंडी में मंडी के ही कई साहित्यकार,  रचनाकार मंच पर अपनी-अपनी बात करने के लिए छटपटाते रहे और उन्हें मूक श्रोता बनने के लिए विवश किया गया। आयोजकों द्वारा अपने साथ लाए व बुलाए गए शिमलवी-सोलनवी मंच संचालक व अध्यक्ष की उपेक्षा का शिकार होते रहे। आयोजक, संचालक व बाहरी अध्यक्ष जो चाहते रहे, वह होता रहा। कई हसीन चेहरे साहित्यिक आयोजन में बार-बार मंच पर जाकर व विशेष अनुरोध पर लोकगीत गाते रहे, संगीत बजाते रहे और गीत संगीत की धुन में मंडी महाविद्यालय के नवोदित विद्यार्थी कवियों के साथ-साथ शिमला संजौली के राहुल देव प्रेमी, गोपाल सिंह, लोअर समरहिल के विचलित अजय, कुल्लू के दीपक कुलवी काव्य पाठ करके वाहवाही लूटते रहे। पहले दिन के प्रथम सत्र मंडी सांस्कृतिक धरोहर में विषय पर संक्षिप्त टिप्पणी करने का अवसर डा. कमल के प्यासा को मिला। दूसरा सत्र जो काव्य पाठ को समर्पित था, में कांता सैनी, रमा, लता शर्मा के संस्कार गीतों के नाम पर कई लुड्डी मये में गीत सुनने को मिले। गोपाल सिंह ने ‘सोचा भी ना था’ कविता पढ़ी। फिर डा. रोशन लाल शर्मा ने विशेष अनुरोध पर ‘अम्मा पुछदी सुन धिये मेरिये’ लोकगीत गाया। मैडम शिप्रा, सारिका व शीतल ने अपनी कविताएं पढ़ीं। हां इस बीच रूपेशवरी शर्मा की ‘नानी दादी की लोक कथाएं’ पुस्तक का विमोचन भी ऋग्वेद ठाकुर उपायुक्त मंडी द्वारा किया गया। बिलासपुर के आचार्य मनोज शैल ने छोटी काशी व बनारस के काशी की समानता का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया। उन्हीं के निर्देशन में पहले दिन पंचवक्त्र मंदिर के व्यास तट पर व्यास आरती की गई थी। डा. दीपक गौतम ‘बरखा की छम छम मिंजो ता डरांदी’ गाकर वाहवाही लूट गए। बरसाती व चैती छिंज झझोटियों को सुनने के आनंद के बीच रेखा वशिष्ठ की ‘एक सूखी नदी के नाम’ कविता सुनकर भी अच्छा लगा, लेकिन मंडी की सांस्कृतिक धरोहर गीत-संगीत में विलीन होकर रह गई, साहित्यकार उस धरोहर का वर्णन नहीं कर पाए। अलबत्ता जो साहित्यकार वाया  घाघस-घुमारवीं धर्मशाला जाते हैं और उन्हें बघाटी बोली के लुप्त होने की चिंता इस समारोह के लाइव प्रसारण में सताती रही, वे मंच पर छाए रहे। दूसरे दिन 6 अक्तूबर 2019 को 10 बजे उपायुक्त कांफ्रेंस हाल में बुलाए गए साहित्यकार यथा समय हाल न खुलने के कारण काफी देर तक सड़क पर टहलते रहे। आयोजक सोते रहे, विशिष्ट अतिथि निर्देशक भाषा संस्कृति विभाग पहुंची नहीं। प्रख्यात साहित्यकार प्रोफेसर सुंदर लोहिया ने बीमारी के बावजूद यथा समय अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। निर्धारित विषय समकालीन साहित्य एक परिदृश्य पर कोई साहित्यिक संवाद नहीं हुआ। हां, इस सत्र में मुरारी शर्मा, बंजार की तारा नेगी तथा मंडी के डा.  विजय विशाल ने अपनी-अपनी रचनाएं जरूर पेश की। इसके अलावा भी कई हस्तियों ने अपनी-अपनी रचनाएं पेश कर वाहवाही लूटने का प्रयास किया। दो दिनी इस साहित्यिक आयोजन का यह निष्कर्ष निकला कि ऐसे आयोजन अब  भ्यागड़ा, बारह मासा, चैती, लुड्डी, चैती व नाटी  मय आयोजन हो गए हैं। आयजकों की नासमझी से साहित्य व  साहित्यकारों की गरिमा को सोची-समझी चालों द्वारा दांव पर लगा दिया गया है।

-प्रकाश चंद धीमान, बल्ह, जिला मंडी

सहज हंसने के बहाने साहित्य और जीवन में होना जरूरी

डा. ओमप्रकाश सारस्वत

मो.-8219672740

हंसी जीवन की उज्ज्वल तरंग है जो जीवन के सारे मैल को धो देती है। हंसी अवसाद की शत्रु है और प्रसन्नता की मित्र। यह सत्य है कि साहित्य समाज के सारे मित्रभाव चित्त में हसंते-गाते जीवन के फूलों की क्यारियां उगा देते हैं। एक मैं ही नहीं, दुनिया के सारे समझदार हंसी को जीवन में अनिवार्य मानते हैं। हंसी के बिना हम जीते हुए भी न जीने जैसे होते हैं। हंसी जीवन का मूल है। हंसी जीवन का सार है। गंभीर से गंभीर योगिजनों ने इसे आसनों में शामिल कर मार्जनी की तरह शरीर रूपी लता पर जमी-बैठी धूल को झाड़ने का सबसे कारगर उपाय करार दिया है। दोस्तो! जो चीज हमसे रूठ कर कोसों दूर चली गई है, उसे पाने, पुनः मनाने को आज हम सभी का मन हो रहा है। हंसी हमारी मूल वृत्ति है। यह हमारे मन, चित्त में मूल रूप से विद्यमान रहती है और सदा से हमारे मनोमालिन्य को दूर करती रही है। प्रश्न है कि जो हंसी आज हमारे चित्त रूपी गमले में सूख गई है, उसे पुनः कैसे हरा-भरा किया जाए? हंसी, करुणा, दया, ममता, त्याग, सहानुभूति उमंग की तरह स्वतः अनमने मन से डरावने ठहाके लगा-लगाकर पैदा नहीं की जा सकती। हंसी अपने आप उद्भूत होती है। हास्य स्वयं फूटता है। ऐसे में हंसी को नकली हंसी बनाने वालों से निवेदन है कि हंसी को नकली न बनाया जाए। हास्य की स्थितियां-परिस्थितियां जबरदस्ती पैदा न की जाएं। हंसने का आनंद तो तब है जो हास्य की परिस्थितियां अपने आप पैदा हों। जो हमारे मन को गुदगुदाए अपने आप ही। हमें हंसने के लिए विवश करें, अपने आप ही। चिंतकों ने हास्य के कई कारण बताए हैं जो हमें हंसाने की कोशिश करते हैं। संस्कृत साहित्य में शृांगार रस के बाद हास्य रस को ही प्रमुखता दी गई है। वैसे रसों के शृांगार, रौद्र, वीर, वीभत्स के क्रम में कौन सा मनोविज्ञान है, समझ से परे है। किंतु आचार्यों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार जो कह दिया, किसी ने उस पर उंगली नहीं उठाई। शृांगार में हास्य का आ जाना तो माना जा सकता है, किंतु उसी समय करुण जिसका स्थायी भाव शोक है, में रौद्र रस के स्थायी भाव क्रोध का उभर आना कुछ विचित्र सा लगता है। सारे संस्कृत साहित्य में जितनी चर्चा करुण, शृांगार, वीर रस की हुई है उतनी हास्य रस की नहीं। हो सकता है तब हंसी उस समय के लेखकों/साहित्यकारों को अच्छी ही नहीं लगती हो। सारे साहित्य को खंगालने पर भी हास्य के उस साहित्य के बीस ही उदाहरण मिलें। चलो, पचास-साठ ही सही। पर ऐसा होना उस समय के साहित्यकारों के मन में हास्य रस का इतना सूखा पड़ना उनमें हास्य की कमी को ही दर्शाता है। हास्य अकृत्रिम होता है। वह हंसने वाले को अपने आप ही हंसने को विवश करता है। हास्य के लिए हंसने वाले के मन में विनय और सरलता चाहिए। कुटिलताएं कभी हास्य को नहीं जनतीं। आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रंथ साहित्यदर्पण में हास्य के छह भेद गिनाए हैंः- स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, उपहासित एवं अतिहसित। इनमें पहले दो उत्तम, उसके बाद के दूसरे दो मध्यम और अंतिम दो निम्न कोटि के हास्यों में रखे गए हैं। इसी तरह हास्य का वर्गीकरण करते हुए आचार्य केशवदास ने हास्य के चार भेद कहे हैंः-मंद हास, कल हास, परिहास एवं वाग्वैदग्ध्य। पाश्चात्य विद्वानों ने भी हास्य के छह भेद ही गिनाए हैं- स्मित हास्य, व्यंग्य, विट, आइरनी, प्रहसन और पैरोडी। हास्य और व्यंग्य एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं। हास्य और व्यंग्य का स्वभाव और प्रकृति भी एक-दूसरे से पूरी तरह अलहदा हैं। हास्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की सहज वृत्ति है जबकि व्यंग्य विसंगतियों की। हास्य में बौद्धिकता, गहनता या चिंतन का कोई खास स्थान नहीं होता, जबकि व्यंग्य में ये तत्त्व अति महत्त्वपूर्ण होते हैं। व्यंग्य विरोधों की उपज है जबकि हास्य विरोधाभासों की। जीवन तथा साहित्य में शुद्ध हास्य समुद्र में अमृत खोजने के बराबर है। आजकल के तमाम हास्य कलाकार चुटकी को हास्य का पर्याय मानकर काम चला रहे हैं जो किसी भी स्तर पर तर्कसंगत नहीं। ऐसे में जरूरी है कि हंसने के मूल बहानों को साहित्य में स्थान दिया जाए ताकि हमें अंदर से हंसने-हंसाने के अवसर दे सके।