Monday, November 18, 2019 04:00 AM

शहनाज को ईसाई धर्म सिखाने को कहा

जीवन एक वसंत/शहनाज हुसैन किस्त-13

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन ः एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है तेरहवीं किस्त...

-गतांक से आगे...

बच्चे परिवार पर आई मुसीबत को समझ रहे थे, और बिना किसी शिकायत के बोर्डिंग जाने को तैयार हो गए, सिर्फ एक शर्त पर, जब भी संभव होगा जैनी को उनसे मिलवाने लाया जाएगा। उनके अब्बू ने वादा किया, वह जानते थे कि बच्चे उसे कितना प्यार करते हैं। अम्मी को याद है कि छह साल की उम्र में घर छोड़कर जाते समय उन्होंने अपना क्या-क्या कीमती सामान बैग में पैक किया था-अपनी प्यारी गुडि़या मैगी, फ्रिल वाली डे्रस और कलरिंग बुक। उस दिन वह खुद को बड़ा और बेहद जिम्मेदार महसूस कर रही थीं। दरअसल उन मुश्किल सालों में वह अपनी उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व हो गई थीं। तीनों बच्चे अपनी मां को बाय बोलकर अपने पिता के साथ गाड़ी में बैठ गए। तीनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम रखा था, वे अपने भविष्य को लेकर कुछ डरे हुए थे। छोटी शहनाज अपनी सीट पर खड़ी होकर अपनी मां को नजरों से ओझल होने तक देखती रहीं।

बोर्डिंग स्कूल

सालों बाद एक योद्धा रूप में उभरी शहनाज हुसैन-दृढ़ और साहसी-की नींव बोर्डिंग स्कूल के दिनों में ही पड़ गई थी। जहां बिताए अकेलेपन के सालों ने उनके व्यक्तित्व में सघर्ष की भावना का विकास किया। ला मार्टिनी एक मिशनरी स्कूल था और दूसरे कान्वेंट्स की तरह, वहां भी धार्मिक शिक्षा पर बेहद जोर दिया जाता था। सफेद कड़क कपड़े पहने नन अपने संस्थान के कड़े आदर्शों का प्रतीक थीं। हर रोज, एक क्लास बाइबिल संबंधी पढ़ाई की होती थी। जब लड़कियां लाइन लगाकर क्लास के लिए जातीं, तो शहनाज अकेले बैठी रह जाती थीं। बच्चे के अकेलेपन और आस्थाहीन भविष्य से चिंतित होकर हेड मिस्ट्रेस, सिस्टर फ्रांसिस ने नसीरुल्लाह बेग को बात करने के लिए बुलाया। ‘मि. बेग,’ उन्होंने कहा। ‘जैसा कि आप जानते हैं, हमारा स्कूल एक ईसाई स्कूल है और हम इस्लाम की तालीम नहीं दे पाएंगे। मैं आपको सलाह दूंगी कि अगर आप किसी टीचर की व्यवस्था कर सकें, जो यहां आकर शहनाज को उसके मजहब के बारे में सिखा सकें।’

नसीरुल्लाह बेग ने विनम्रता से मुस्कुराकर हेड मिस्ट्रेस की बात का जवाब दिया, ‘सिस्टर, चूंकि मैं उसे अपना मजहब नहीं सिखा सकता, तो क्यों न आप ही उसे अपना धर्म सिखा दें।’ उनके शब्दों से प्रभावित होकर, सिस्टर फ्रांसिस उस लंबे इनसान को अपने कमरे से बाहर जाते  देखती रहीं। वह उनके सामने धर्म की दीवारों से बाहर निकालने की चुनौती रख गए थे। उनका विश्वास था कि सिस्टर का गॉड उनके अल्लाह की तरह ही बच्ची की सुरक्षा करेगा।               -क्रमशः