शहनाज पर मोहित हो गए थे नासिर हुसैन

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन : एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है बाइसवीं किस्त...

-गतांक से आगे...

हसीन आंखों वाली लड़की

आज अपने पेंटहाउस अपार्टमेंट में बैठकर, अपनी मां की जिंदगी के बारे में जब मैं सोचती हूं, तो सेंट मैरी में जाने वाली 14 साल की लड़की के रूप में उनकी कल्पना कर पाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। इलाहाबाद का सेंट मैरी कान्वेंट, जहां बड़ी-बड़ी आंखों और भूरे बालों वाली एक अल्हड़ छात्रा, अपने भविष्य से पूरी तरह बेपरवाह। सपना बस इतना कि स्कूल में होने वाले नाटक में रानी की भूमिका निभा सकूं। जिस खास दिन के बारे में मैं आपको बताना चाहती हूं, वह उनकी जिंदगी का भी खास दिन था। कई मायनों में। स्कूल की घंटी सामान्य समय पर ही बजी। पिंजरे से छूटे पक्षियों की तरह सैकड़ों लड़कियां स्कूल के बरामदे से दौड़कर इंतजार करते अपने परिवारवालों और गाडि़यों में आने लगीं। इत्तफाकन एक हैंडसम नौजवान, अपने दोस्त के साथ उसकी बहन को सेंट मैरी स्कूल में लेने के लिए आया है। तसल्ली से इंतजार करते हुए, अचानक उसकी आंखों के सामने से यूनिफार्म पहनी हुई लड़कियों का रैला गुजरता है। तभी उसमें से एक लड़की पर उसकी नजर टिक जाती है। एक हसीन युवा लड़की, जिसकी आंखें सूरज की रोशनी की तरह चमक रही हैं। उसकी मोहक चमक से वह खुद को बचा नहीं पाया। उसकी आंखों ने स्कूल के गेट से उस गाड़ी तक उसका पीछा किया, जो उनके इंतजार में खड़ी थी और जिसकी खिड़की पर पर्दे लगे थे, ताकि दुनिया उसकी एक झलक से भी महरूम हो जाए। वह युवक सम्मोहन की अवस्था में कार को जाते हुए देखता रहता है। वह नासिर हुसैन थे, कानपुर के इंकमटैक्स कमिश्नर के साहबजादे। 24 साल के बेहद खूबसूरत नौजवान, शहनाज के करिश्माई व्यक्तित्व के आगे मानो लुटा सा रह गया था। हालांकि तब शहनाज मात्र 14 साल की ही थी। अगले दिन, वह युवक अपने दोस्त के साथ फिर से सेंट मैरी स्कूल के बाहर खामोशी से इंतजार में खड़ा था। आंखें उसी लड़की को ढूंढ रही थीं, जिसने उन्हें मोहित कर दिया था। जैसे ही स्कूल का गेट खुला, लड़कियों का हुजूम तेजी से बाहर निकला, दोपहर की धूप में फिर से वही रौशनी उन्हें नजर आई और क्षणभर में गाड़ी में जाकर छिप गई। अगले कुछ दिनों तक वह अपने दोस्त इशरत के साथ उनकी बहन को लेने के लिए स्कूल आते रहे। हर बार वह बस खड़े रहकर उन सुंदर आंखों और घुंघराले बालों को देखा करते। उनकी बस एक ही झलक मिल पाती, और चतुर सहायिका झट से उन्हें इंतजार करती गाड़ी में बैठा लेती। उन्हें कोई खबर नहीं थी कि वह लड़की कौन थी, वह कोई भी हो सकती थी, किसी भी मजहब की।   

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