Friday, December 13, 2019 07:26 PM

शहर-बाजार यातायात

जरूरत जिंदगी है या जिंदगी ही जरूरत है-यह खींचतान हिमाचल की तरक्की में इनसानी फितरत को बरगला रही है। लोग तरक्की पसंद हैं, लेकिन नई चुनौतियों के बावजूद परिवर्तनशील नहीं होना चाहते और इसके अनेकों उदाहरण प्रदेश की यातायात व्यवस्था में देखे जा सकते हैं। विकास की धूप छांव में राजनीतिक प्राथमिकताएं अपना गठजोड़ देखते-देखते प्रादेशिक प्रबंधन या सुशासन के खिलाफ एकत्रित हो रही हैं। यहां दो घटनाएं और दो ही विधायकों की प्राथमिकताओं पर गौर करें, तो सियासत के संदर्भ नजर आएंगे। विधायक विक्रमादित्य अपनी ओर से जागरूकता अभियान छेड़ते हुए शिमला से वाहनों के इस्तेमाल को अति व्यवस्थित करने के तौर तरीके ढूंढ रहे हैं। वह इस कोशिश में हैं कि सर्कुलर रोड या शहर के अंदरूनी मार्गों पर वाहन पार्क न हों, बल्कि राजधानी के अधिकारी कार पूल करके चलें। इन सुझावों के अलावा अनेकों विकल्पों के लुब्बे लुआब में यह स्पष्ट है कि शहरीकरण की जरूरतों में नागरिकों को तहजीब में बदलाव लाना होगा। शिमला की कसरतों के विपरीत धर्मशाला के नए नवेले विधायक विशाल नैहरिया उस कतार में खड़े हो रहे हैं, जो यातायात के असमंजस को बढ़ावा दे रही है। इन्वेस्टर मीट के बहाने धर्मशाला शहर ने वन-वे चलना क्या शुरू किया, ढीठ प्रवृत्तियां लौटकर अपना हुक्म बजाने लगीं यानी एक खास तबका चाहता है कि अनुशासित यातायात के बजाय, निरंकुश इरादों पर इसे चलने दिया जाए। मुख्यमंत्री कार्यालय ने धर्मशाला के भविष्य और यातायात के दबाव को समझते हुए जिस तरह वन-वे का संचालन किया, उसकी खासी तारीफ हो रही है। आश्चर्य यह कि स्थानीय विधायक अपनी ही सरकार के नियम तोड़ने के लिए एक खास व्यापारी वर्ग का साथ दे रहा है। ऐसे में शिमला के यातायात को अनुशासित करते विधायक विक्रमादित्य को शाबाशी दी जाए या यातायात की अव्यवस्था में खड़े विधायक विशाल नैहरिया को सम्मानित किया जाए। जो भी हो सियासत की ऐसी संकीर्णता से हमारा भविष्य तो उज्ज्वल नहीं होगा। वर्षों से हमीरपुर के नागरिक मुख्य बाजार को वाहन प्रतिबंधित करने का संघर्ष करते आ रहे हैं, लेकिन वहां भी एक खास तबका अपने स्वार्थ की निगाहों से ऐसी किसी भी योजना को खुर्द बुर्द करने में सक्षम साबित हो रहा है। शायद धर्मशाला के विधायक भी व्यवस्थित यातायात की शर्तों को मिटाने में कामयाब हो जाएं या अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं से यह तमगा जीत जाएं, लेकिन कल को संवारने कौन आएगा। दरअसल हिमाचल अपने भविष्य की शर्तों को नजरअंदाज करके सियासी खुशामदी में मशगूल रहना चाहता है। आर्थिक बदलावों के बीच नागरिक व्यवहार को अनुशासित तथा व्यवस्थित बनाने के लिए वांछित कदमों को कठोर समझ लेना या छूट की गुंजाइश ढूंढ कर छोड़ देना, तरक्की के विपरीत है। विक्रमादित्य सिंह अगर सरकारी वाहनों की पूलिंग से शिमला का दबाव कम करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, तो इसे लागू करके कहीं पहाड़ तो टूट नहीं जाएगा। ठीक इसी तरह अगर इन्वेस्टर मीट ने धर्मशाला शहर को वन-वे चलना सिखा दिया, तो कदम पीछे मोड़कर हम तरक्की पसंद नागरिक या प्रदेश नहीं कहला सकते। एक दिन हमीरपुर के प्रमुख बाजार को मालरोड की तर्ज पर वाहन वर्जित क्षेत्र घोषित होना ही होगा, चाहे आज कोई माने या न माने। कमोबेश हिमाचल के हर शहर के बाजारों को वाहन वर्जित तथा यातायात को वन-वे के आधार पर अपना निखार करना होगा। शहरी यातायात को सुचारू बनाने तथा बाजार तक खरीददार पहुंचाने के लिए नए विकल्पों के आधार पर सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं में इजाफा करना ही पड़ेगा।