Sunday, September 22, 2019 07:50 AM

शिक्षकः कल और आज

टी.सी. सावन

लेखक, शिक्षाविद हैं

सभ्य समाज के निर्माण में एक अध्यापक अपने जीवन का संपूर्ण हिस्सा अर्पित करता है और जीवन भर नपी-तुली जिंदगी जीता हुआ इस समाज के लिए बड़े-बड़े डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, चिंतक, नेता, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पैदा करता है। उस महान विभूति को सादर नमन है जो करुणा, सहनशीलता और कर्मठता के पाठ पढ़ाता हुआ इस समाज को दिशा-निर्देश देने वाले महापुरुषों को उत्पन्न करता है...

An Engineer's fault is buried in the bricks,

A Doctor's fault is buried in the grave,

A Lawyer's fault is buried in the files,

But a Teacher's fault is reflected in the people.

निःसंदेह उपर्युक्त पंक्तियां समाज में एक अध्यापक की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दृष्टिपात कराती हैं जिसका समाज के प्रति बहुत बड़ा दायित्व होता है। सभ्य समाज के निर्माण में एक अध्यापक अपने जीवन का संपूर्ण हिस्सा अर्पित करता है और जीवन भर नपी-तुली जिंदगी जीता हुआ इस समाज के लिए बड़े-बड़े डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, चिंतक, नेता , प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पैदा करता है। उस महान विभूति को सादर नमन है जो करुणा, सहनशीलता और कर्मठता के पाठ पढ़ाता हुआ इस समाज को दिशा-निर्देश देने वाले महापुरुषों को उत्पन्न करता है। जरा सोचिए !  क्या होता, अगर एक शिक्षक न होता? शायद कुछ भी न होता, जब एक शिक्षक न होता!

आदि काल से ही भारतीय संस्कृति में एक शिक्षक को सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता रहा है। एक शिक्षक समाज का निर्माता होता है। एक अध्यापक उस दीए के समान है जो स्वयं जलता है मगर औरों को रोशनी देता है। यह वही भारत है जहां श्रद्धा में पत्थर तक पूजे जाते हैं। कण-कण में शक्ति बसती है और इसी भारतीय संस्कृति में एक शिक्षक का दर्जा भगवान से भी बड़ा है। कबीर का दोहा विश्वविख्यात है। ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो मिलाय’। एक शिक्षक ही है जो हमें जीवन पथ पर जीने के योग्य बनाता है। जन्म से तो हम सब जीव ही होते हैं, हमें इनसान बनाने में बहुत हद तक एक शिक्षक की भूमिका रहती है।

प्राचीन काल में गुरु-शिष्य परंपरा का अत्यधिक वर्चस्व रहा है। ज्ञान के हर क्षेत्र में गुरु- शिष्य संबंध का स्वर्णिम इतिहास रहा है। शिष्य अपने गुरु के सानिध्य में रहकर ज्ञान अर्जन करते थे। बाद में वही शिष्य गुरु बनकर औरों को शिक्षा देते थे। गुरु-शिष्य की यह परंपरा अनेक क्षेत्रों में रही है जैसे-अध्यात्म, संगीत, कला, वेदाध्ययन, वास्तु इत्यादि। भारतीय ग्रंथों में गुरु की महिमा सर्वोपरि मानी गई है। यथा ... ‘गुरुर ब्रह्मा गुरुर्विष्णुए र्गुरुर्देवो महेश्वररूए गुरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।’ प्राचीन काल में गुरु-शिष्य के  संबंधों में आपसी स्नेह भाव था, श्रद्धा थी, आज्ञाकारिता थी और अनुशासन था। गुरु नैतिक शिक्षा देते थे, निःस्वार्थ भाव से ज्ञान बांटते थे । आज समय ने करवट बदली है, गुरुकुलों  का स्थान विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने लिया है । शिक्षा पद्धति बदल रही है और समाज व सामाजिक सोच बदल रही है। शिक्षा के मापदंड बदल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आज गुरुओं का इतना सम्मान किया जाता है जितना पूर्व काल में होता था? शायद आज वक्त बदल रहा है। जाहिर है बदलते परिवेश में कुछ बदलाव तो जरूर होगा । एक जमाना था जब गुरु दिन को रात कहे तो शिष्य मान लेता था। यह श्रद्धा थी, विश्वास था। आज के डिजिटल युग का छात्र, शिक्षक का अनादर करने लगा है। शिक्षक की क्षमता पर शक करने लगा है। उसके समझाने के तरीके पर सवाल खड़े करने लगा है। इसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि आज का शिक्षक पक्षपाती और व्यावसायिक भी हो रहा है जिससे वो निरूस्वार्थ भाव का शिक्षण देखने को कम ही मिल रहा है। आज इसी समाज में शिक्षकों के नैतिक पतन की भी खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं जो बरसों पुराने गुरु-शिष्य के पावन संबंध को तार-तार कर रही हैं ।

हम प्रायः सुनते हैं कि फलां जगह पर शिक्षक ने छात्रा को बनाया हवस का शिकार। जी हां! कहने में भी संकोच हो रहा है कि यह भी इसी समाज का एक पहलू है,जो निंदनीय है। असहनीय है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है भारतीय समाज में? शिक्षकों में नैतिक मूल्यों का हृस होना अच्छा संकेत नहीं है। आज इस विषय पर हम सब चिंतकों को सोचने की आवश्यकता है। आखिर क्या वजह है कि रक्षक ही भक्षक बनता जा रहा है? देश की शिक्षा पद्धति में एक आयाम यह भी जुड़ जाना चाहिए कि समय-समय पर शिक्षकों के नैतिक मूल्यों के उत्थान हेतु क्रियाकलाप किए जाने चाहिएं। सेमिनार आयोजित किए जाने चाहिएं। गोष्ठियां की जानी चाहिएं ताकि हम इस बुराई के नतीजे पर पहुंच सकें और निवारण ढूंढ सकें।  हम हर वर्ष पांच सितंबर को भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक और शिक्षक थे जिनका शिक्षा के प्रति खास लगाव था। उनका मानना था कि बिना शिक्षा के इनसान कभी भी मंजिल पर नहीं पहुंच सकता है, इसलिए इनसान के जीवन में एक शिक्षक होना बहुत जरूरी है। एक शिक्षक को डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए। उनके विचार, उनके भाव, उनके वक्तव्य और उनके व्यक्तित्व को आत्मसात करना चाहिए। निःसंदेह शिक्षक पूजनीय रहा है और रहेगा भी। वक्त के साथ कई चीजें बदल जाया करती हैं। मगर एक शिक्षक समाज निर्माता था, सुधारक था, वह कल भी था...आज भी है और अगले कल भी रहेगा।