शिक्षक को वांछित सम्मान देना होगा

मनोज पाल परिहार

लेखक, विज्ञान अध्यापक संघ के प्रदेशाध्यक्ष हैं

पांच सितंबर, महान शिक्षाविद्, दार्शनिक, पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन हमारे श्रद्धेय अध्यापकों को याद करने व उनके बहुमूल्य योगदान को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। छात्रों सहित हम सभी को इस पावन दिवस की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। हम पर अपने प्रिय अध्यापकों की अमिट छाप सदैव रहती है। किसी देश का भविष्य उसकी आने वाली संतानों पर निर्भर करता है और उनका स्वरूप कैसा हो, यह  जिम्मेदारी शिक्षकों पर होती है। तभी तो शिक्षक को राष्ट्र निर्माता का दर्जा प्राप्त है, लेकिन क्या आज का शिक्षक उपरोक्त कसौटी पर खरा उतरता है? अगर नहीं उतरता है, तो क्यों? व्यवस्थाओं, नीति-निर्धारण में कहां चूक रह गई? राष्ट्र की प्रगति और विकास उसके अध्यापकों की गुणवत्ता व विकसित दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है, लेकिन क्या वर्तमान संदर्भ में परिस्थितियां चिंताजनक नहीं हैं? आज नीतियों और व्यवस्थाओं को बनाने वालों के बजाय शिक्षकों को ही हर विपरीत परिस्थिति के लिए अन्यायपूर्ण तरीके से दोषी ठहराया जाता है।

यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जैसा समाज होगा, वैसा ही अध्यापक होगा। वह भी इसी व्यवस्था का अंग है। आज का अध्यापक, कई तरह के अवांछित, अमर्यादित दबावों को झेलता और अपमानित होता हुआ, जब तनाव, कुंठा, निराशा, कुर्तकपूर्ण कार्यों-बेवजह स्थानांतरणों और दंडों के भय जैसी बीमारियों से घिरा हो तो, ऐसे वातावरण में उससे घोर आदर्शों और गुणवत्ता की अपेक्षा करना कितना तर्कसंगत है? ऐसे हालात में जहां शिक्षक के अधिकार अपराध बना दिए गए हों, शिक्षण अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। आज अध्यापकों की आलोचना करना, उन पर अपमानजनक टिप्पणियां करना फैशन बन चुका है। मीडिया में भी अध्यापकों के प्रति आए दिन फरलूबाज, निकम्मे, नपेंगे गुरुजी इत्यादि इत्यादि अलंकरणों से नवाजा जाता है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी सीख तो हमारी संस्कृति नहीं देती है।

क्या सभी ऐसे ही हैं? समाज और मीडिया को आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन क्या किसी ने यह ध्यान दिया है कि अध्यापकों के चयन में कड़े और उच्च स्तरीय मापदंड अपनाए जा रहे हैं या इस गरिमापूर्ण व्यवसाय को महज रोजगार देने का जरिया भर समझ लिया गया है। उन्हें चाहिए कि ये सरकार और प्रशासन को बाध्य करते हुए उन पर दबाव सुनिश्चित करें कि अध्यापकों के चयन में केवल पात्र और विद्वान व्यक्ति को ही चुना जाए। बेहतर शिक्षण और स्कूल प्रबंधन के मामलों में अच्छे शिक्षकों की पहचान होना जरूरी है। इससे अध्यापकों का मनोबल बढ़ता है और वह दोगुने उत्साह से और मेहनत करने को प्रेरित होता है, जिसका फायदा अंततः समाज को ही मिलता है। यह भी विडंबना ही है कि जब अध्यापक दिवस पर राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा होती है, तो उसमें आश्चर्यजनक रूप में कुछ विवादास्पद नाम मिल ही जाएंगे, जो दर्शाते हंै कि इन पुरस्कारों के चयन में कितनी गंभीरता और पारदर्शिता बरती जाती है। यह भी सत्य है कि यह प्रक्रिया अपने आप में ही विरोधाभासी है, जिसका कुछ लोग बनावटी तथ्यों और अपने संपर्क सूत्रों की सहायता से खूब फायदा उठाते हैं। संपर्क सूत्रों के इस दौर में कार्यसंस्कृति सदैव ही हारती है। अवार्ड पाने के लिए भी यह शर्त गरिमा के विरुद्ध है कि सम्मान प्राप्त करने के लिए अध्यापक को स्वयं ही अपनी प्रशंसा और अनुशंसा करनी पड़ती है। कोई भी स्वाभिमानी अध्यापक, जिसने जिंदगी भर अपने छात्रों को स्वाभिमान से जीना सिखाया हो, कैसे ऐसे सम्मान के लिए याचना करेगा। ऐसी दोषपूर्ण नीतियों को गरिमामयी और तर्कपूर्ण रूप से पारदर्शी बनाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, तभी इन सभी पुरस्कारों की गंभीरता और गरिमा बनी रह सकती है। ऐसे सम्मान के असली हकदार अध्यापकों को उनका सम्मान देने से हमारी ही प्रतिबद्धता साबित होगी। मैं ऐसे कई निष्ठा से परिपूर्ण विद्वान और शिक्षकों को जानता हूं, समाज भी उनके उल्लेखनीय योगदान से वाकिफ है, को इस प्रकार से पात्र और उपयुक्त होते हुए भी इन सरकारी पुरस्कारों से वंचित रहना पड़ा है, जो व्यवस्था की पोल खोलता है। लेकिन हतोत्साहित होने की बजाय यदि आज भी एक अध्यापक में बेहतर शिक्षण कौशल के साथ धैर्य, क्षमा, परोपकार, दया, करुणा जैसे गुणों के साथ उसमें विचारों की अपेक्षित उदारता है, तो सब व्यवस्था की कमियों के बावजूद भरपूर आदर का पात्र बन सकता है और अपने आचरण-व्यवहार से अपने विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के दिल और दिमाग में चिरस्थायी आदर व सम्मान पा सकता है। सबसे पहले तो व्यवस्था में चल रही कमियों को दूर करना होगा, तभी हम शिष्य और शिक्षक दोनों के साथ न्याय करने में कामयाब हो पाएंगे। यह बात भूली नहीं जानी चाहिए कि शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता होता है, उससे अन्यायपूर्ण व्यवहार उसके हौसले पर विपरीत प्रभाव डालता है। शिक्षा में जो खामियां आ गई हैं, उनके लिए अकेले शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का जिम्मा शिक्षक के साथ-साथ नीति-निर्माताओं का भी है। शिक्षक को उसको वांछित सम्मान देना ही होगा।