Tuesday, March 31, 2020 01:58 PM

शिक्षक ही निकाल पाएगा नकल का कांटा

जगदीश बाली

लेखक, शिमला से हैं

नकलचियों की चलती देख बेचारा मेहनती विद्यार्थी मन मसोस कर रह जाता है। नकल के प्रति जो रवैया अपनाया जाता है, वह केवल नकलचियों को ही नहीं, बल्कि मेहनती और ईमानदारी बर्तने वाले विद्यार्थियों को भी इस बुराई का दामन थामने के लिए लालायित करता है। बोर्ड के नकल से संबंधित कायदे-कानून को और सख्त करने की दरकार है...

कहते हैं बुरी आदत आसानी से नहीं जाती और उस पर अगर नीयत ही खराब हो तो सभी कायदे-कानून, आदेश-निर्देश धरे के धरे रह जाते हैं। जब पहरेदार की मंशा ही बिगड़ी हो, तो चाहे कोई भी ताला लगा लो, वह चोर को चाबी थमा कर रहेगा व ‘ऑल इज वेल’ भी पुकारता रहेगा। मैं बात कर रहा हूं हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड की दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं की जो अंतिम दौर में हैं। लिहाजा परीक्षा में तैनात कैमरे, नकल व ड्यूटी पर तैनात अध्यापक व उड़नदस्ते चर्चा व खबरों में हैं। हालांकि इस बार बोर्ड व शिक्षा विभाग ने सभी परीक्षा केंद्रों पर तीसरी आंख अर्थात वीडियो कैमरों की तैनाती सुनिश्चित करवाई थी जिससे नकल पर अंकुश भी लगा, परंतु कई केंद्रों पर कैमरे लगे होने के बावजूद न नकल करने वाले बाज आए और न नकल करवाने वाले। तीसरी आंख व अध्यापकों की निगरानी के तले नकल के सैकड़ों मामले सामने आए हैं। कहीं नकल के स्थानीय पुजारियों ने बिजली गुल करवा दी तो कहीं किसी ने कैमरे की आंख मरोड़ कर एंगल ही बदल दिया। एक परीक्षा केंद्र पर तो एक ही दिन एक ही सत्र में नकल के 70 मामले पकड़े गए। अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे परीक्षा केंद्र पर परीक्षा के दौरान क्या आलम रहा होगा। जब परीक्षा भवन के दरवाजे पर ही नकल की पर्चियां उड़नदस्तों का स्वागत करती हुई पाई जाएं, तो परीक्षा भवन के अंदर की हकीकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। जब ड्यूटी पर तैनात पर्यवेक्षक अपने कर्त्तव्य के प्रति सजग व गंभीर नहीं होगा तो नकल की आड़ में बैठे चंचल व चपल परीक्षार्थी उसका फायदा लेने में पीछे नहीं रहेंगे। बेचारी तीसरी आंख भी क्या करे जब असली आंखें ही बंद कर ली जाएं। वह भी शरमा जाती होगी। परीक्षा भवन में जो फर्ज शिक्षकों को अदा करना चाहिए, अगर वह कार्य निरीक्षण पर आए एसडीएम व डीसी साहब को करना पड़े, तो यह अध्यापक के लिए सिर झुकाने व आत्मग्लानि वाली ही बात है। ये सारी बातें इस बात की द्योतक हैं कि हमारी परीक्षाओं के रंग ढंग में गलन और सड़न जरूर है। मैं यह तो नहीं कह रहा कि सभी परीक्षा केंद्रों पर ऐसा चलता है परंतु कैमरों की मौजूदगी में भी नकल के मामले सामने आना ड्यूटी पर तैनात पर्यवेक्षकों की कारगुजारी पर सवालिया निशान लगा जाता है। कैमरे लगने से स्टेट ओपन स्कूल अर्थात मुक्त विद्यालय के माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों की कसमसाहट स्पष्ट दिखाई देती है। मुक्त विद्यालय के परीक्षार्थी शाम के सत्र में परीक्षा देते हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे परीक्षार्थी होते हैं जो नियमित परीक्षाओं से मुड़ कर इस मुक्त परीक्षा में अपना भाग्य आजमाते हैं या फिर वे जिन्हें प्रोमोशन के लिए पास प्रमाण पत्र चाहिए होते हैं। ड्यूटी पर तैनात पर्यवेक्षकों व अन्य अध्यापकों से उनका रिश्ता निकल ही आता है। लिहाज कहो या फिर मजबूरी, नकलचियों की निकल ही पड़ती है। कर्त्तव्यपरायण कर्मियों के लिए इन परीक्षाओं में डयूटी देना मुश्किल हो जाता है। उनसे पूछा जाता है-कैसे आदमी हो, इतना भी नहीं कर सकते?

गुरुओं में भी ऐसे कई ‘ग्राम सेवक’ होते हैं, जो स्थानीय पैठ बनाने के चक्कर में परीक्षा भवन में रसद पहुंचाने के जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। यदि कोई कर्त्तव्यपरायण, आत्मबोधी इस धमाचौकड़ी के विरुद्ध जुबान खोल भी दे, तो समझो कुछ महीनों के लिए विद्यालय और साथ लगते मोहल्ले में उसका हुक्का पानी बंद। उनका जीना कुछ समय के लिए तो हराम हो ही जाता है। ऐसे निष्ठावान शिक्षकों के लिए कैमरे की ये तीसरी आंख एक सहारे का तिनका है। बोर्ड की परीक्षाओं में ऐसा भी होता आया है कि कई केंद्रों पर नाम मात्र ही उड़नदस्ते दबिश देते हैं और वह भी केवल रस्म अदायगी ही होती है। बोर्ड द्वारा नकल के मामलों में परीक्षार्थियों को कार्यालय बुला कर कंपार्टर्मेंट दे दी जाती है। ये परीक्षार्थी अनुपूरक परीक्षाओं में आराम से अपना काम कर जाते हैं क्योंकि इन अनुपूरक परीक्षाओं में ढील कुछ ज्यादा ही होती है। नकलचियों की चलती देख बेचारा मेहनती विद्यार्थी मन मसोस कर रह जाता है। नकल के प्रति जो रवैया अपनाया जाता है, वह केवल नकलचियों को ही नहीं, बल्कि मेहनती और ईमानदारी बर्तने वाले विद्यार्थियों को भी इस बुराई का दामन थामने के लिए लालायित करता है। बोर्ड के नकल से संबंधित कायदे-कानून को और सख्त करने की दरकार है। लाजिमी है कि नकल के उठते जख्म की समय रहते दवा कर ली जाए, और जो शिक्षा की गुणवत्ता बची है उसे बचा लिया जाए अन्यथा ये जख्म नासूर बन जाएगा। परीक्षा भवनों में कैमरे नकल के अंधेरे को हटाने के लिए एक चिराग का काम कर सकते हैं, परंतु यह कार्य अकेले बोर्ड का नहीं। इस हकीकत को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि अध्यापकों की मदद के बगैर नकल हो नहीं सकती व यह बुराई अध्यापक की चाहत के बगैर हट नहीं सकती। समूचे शिक्षा समुदाय को पवित्र कर्त्तव्य जान कर संजीदगी से नकल रूपी बुराई को रोकना होगा। विभाग या बोर्ड शिक्षकों की सुरक्षा का जिम्मा ले और शिक्षक बंधु इस मुहिम को सफल बनाने के लिए हाथ से हाथ मिलाएं। हाथ नहीं मिलाएंगे तो हाथ मलते रह जाएंगे। मैं यह नहीं कहता कि बोर्ड की परीक्षा व्यवस्था बिलकुल गल-सड़ चुकी है, बल्कि अभी भी प्रदेश इस मामले में कई अन्य राज्यों से बेहतर है। परंतु अगर नकल रूपी इस सड़न को नहीं रोका गया तो धीरे-धीरे यह सड़न कैंसर बन जाएगी। इस पर अंकुश लगाना जरूरी है। ऐसे में कैमरे की आंख का सहारा महत्त्वपूर्ण है। परंतु यह भी सनद रहे कि कैमरे लटका देना ही काफी नहीं, बल्कि महत्त्वपूर्ण होगा कि ड्यूटी पर तैनात शिक्षक भी अपना फर्ज समझें। अभिभावकों व समाज को भी नकल के विरुद्ध मुखर होना होगा। नकल के सहारे एक वर्ष बचाने की कवायद में छात्र जिंदगी भर अपाहिज रह जाता है। शिक्षकों को यह याद रखना होगा कि नकल हमारे पांव का कांटा है, किसी और से नहीं बल्कि हमी से निकलेगा अन्यथा यह कांटा हमेशा हमें चुभन और वेदना देता रहेगा।