Wednesday, November 13, 2019 03:50 PM

शिक्षा में अध्ययन

हिमाचली शिक्षा में अध्ययन की परिपाटी और युवाओं में आत्मसाक्षात्कार की तड़प पैदा नहीं हो रही है। विडंबना यह भी  कि शिक्षित समाज के भीतर मानव पूंजी का विकास नहीं हो रहा। उपाधियों के गणित में बेरोजगारी की बढ़ती दौलत, लेकिन किसी स्कूल-कालेज में दम नहीं कि छात्र जीवन को रोजगारोन्मुख कर दे। रोजगार का बाजार क्या चाहता है, यह हिमाचल की शिक्षा को खबर नहीं। आश्चर्य यह कि हिमाचल के विश्वविद्यालयों तक का राज्य की आर्थिकी और समाज से कोई तात्पर्य नहीं-कोई सीधा संपर्क नहीं। शिक्षा को डिग्री के बाहर और अध्ययन के असीमित अध्यवसाय से जोड़ने की वजह हिमाचल के किसी परिसर में नहीं मिलती, लिहाजा छात्र जिज्ञासा को स्वतंत्र चिंतन की दिशा में बढ़ने का अभिप्राय नहीं मिलता। शिक्षा अगर रोजगार की इच्छा में जीवन की सफलता का मानदंड है, तो हिमाचल के छात्रों का रुझान और परिसर की पैरवी में हुनर विकास का पौधारोपण होना चाहिए। यह इसलिए भी कि जिस रफ्तार से हिमाचल सरकार इन्वेस्टर मीट की शहनाइयां बजाते हुए 85 हजार करोड़ धन ऊर्जा से वसंत लाने का प्रयास कर रही है, उसे देखते हुए पैदा होने वाले रोजगार और शिक्षा के अवतार को समझना होगा। इन्वेस्टर मीट से पहले तमाम रोड शो और मिनी कॉन्क्लेव को मिला लिया जाए, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस सफर के गवाह हमारे युवा कैसे बनेंगे। क्या उनका शैक्षणिक वातावरण, अध्ययन की परिपाटी और प्रशिक्षण की माटी से निकला कार्य अनुभव इस काबिल है कि निवेश का सार्थक पहलू रोजगार बन जाए। क्या हिमाचल के बच्चों को पढ़ने की पृष्ठभूमि में प्रदेश की आर्थिक चुनौतियां समझाई जाती हैं। क्या परिवेश से अनभिज्ञता और संभावनाओं से दूरी बनाकर कोई समाज अपने बच्चों की शिक्षा या अध्ययन को परिपूर्ण कर सकता है। क्यों हमारी कालेज शिक्षा का ताल्लुक हिमाचली जीवन की प्रासंगिकता से नहीं जुड़ पा रहा है और अगर फाइन आर्ट्स, गीत-संगीत व नृत्य जैसी विधाओं से छात्रों का किनारा रहेगा, तो शिक्षा के लक्ष्य व संवेदना से सांस्कृतिक विरासत भी अछूत हो जाएगी। कुछ इसी तरह हिमाचल के ऐतिहासिक अध्ययन का भी जो क्रम रहा है और उसकी वजह से शिक्षा की जड़ों में ऐसे विषय का संचार नहीं होता। हिमाचल में जो लेखक समाज पैदा हुआ वह कविता, कहानी व व्यंग्य की विधा में आत्म संतुष्टि करते रहे, जबकि प्रकाशन की दृष्टि से प्रदेश के अपने मजमून उदास रहे। हिमाचल के इतिहास, आर्थिकी, ग्रामीण परिवेश, सांस्कृतिक संदर्भ, पर्यावरण और क्षेत्रीय महक पर केंद्रित अध्ययन अगर किताबों की शक्ल नहीं ले रहा, तो शिक्षा केवल पाठ्यक्रम की प्रदक्षिणा करती रहेगी। हिमाचली युवाओं में उद्यमशीलता की प्रतिस्पर्धा शुरू हो, तो सारी आर्थिक चुनौतियां दूर होंगी। हिमाचल में स्वतंत्र चिंतन की धाराएं पैदा करने के लिए अलग-अलग विषयों के अध्ययन केंद्र विकसित करने होंगे। प्रदेश के प्रमुख कालेजों को अगर विषय विशेष के राज्य स्तरीय अध्ययन केंद्रों  के रूप में निरुपित करें, तो आर्थिक, ऐतिहासिक, कला, खेल, लोक संस्कृति, बिजनेस, वैज्ञानिक तथा तकनीकी अध्ययन की जरूरतें पूरी होंगी व शिक्षा अपने पाठ्यक्रम से बाहर निकल कर स्वतंत्र चिंतन के धरातल पर सशक्त होगी।