Monday, September 24, 2018 02:48 PM

शिक्षा में हिमाचली युवा

प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों का सूखा बताता है कि पहाड़ का नौजवान अब इस करियर में रुचि नहीं रखता है। दूसरी ओर... मेडिकल कालेजों में सालाना 700 नए डाक्टरों का तैयार होना दर्शाता है कि मेडिकल लाइन ही राइट च्वाइस है। रैंकिंग की जाए तो इसके बाद दूसरे नंबर पर प्रोफेशनल कोर्स हैं, तो डिग्री कालेजों का जलवा खत्म हो रहा है। आखिर शिक्षा में कहां है खड़ा है हिमाचली युवा, बता रहे हैं, मस्तराम डलैल व खुशहाल सिंह ...  

136       डिग्री कालेज

30000             छात्र

* रूसा के सिस्टम ने डराए अभिभावक-छात्र

* प्रोफेशनल कोर्सेज को तवज्जो

* मेरिट से एडमिशन ने भी कइयों से छीने पसंदीदा विषय

* सीमित सीटों की शर्त ने रुलाए छात्र-छात्राएं

प्रदेश में महाविद्यालयों की संख्या में तो आए दिन वृद्धि होती जा रही है, लेकिन इन महाविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों का आंकड़ा प्रति वर्ष कम होता जा रहा है। इस वर्ष सत्र 2018-19 के लिए कालेजों में प्रवेश के लिए जो प्रक्रिया पूरी हुई है,उसमें प्रवेश के 136 के करीब डिग्री कालेजों में छात्रों की संख्या का आंकड़ा 30 हजार के करीब सिमट कर रह गया है। हालात यह है कि जो कालेज अभी बीते दो से तीन वर्षों में प्रवेश में जहां वहां खोले गए हैं, वहां छात्रों की संख्या 20 से 30 के भीतर ही है। कुछ कालेज जहां छात्रों की संख्या ठीक भी है, वहां शिक्षकों की कमी आड़े आ रही है और छात्रों को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पा रही है। कालेजों में छात्रों की संख्या के घटने की सबसे बड़ी वजह बन रहा है राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान। इस अभियान के तहत वर्ष 2013 से 2018 तक इतने बदलाव किए गए हैं कि छात्रों के भीतर रूसा के तहत शिक्षा ग्रहण करने में ही खौफ सताने लगा है। रूसा को लेकर आए दिन होने वाले बदलावों के चलते अभिभावक भी अपने बच्चों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें कालेजों में न भेज कर प्रोफेशनल कोर्सेज की तरफ ज्यादा भेज रहे हैं। प्रदेश के कालेज तो खोल दिए गए है, लेकिन उन्हें अभी तक रोजगारपरक कोर्सेज से नहीं जोड़ा गया है। छात्रों को बीकॉम, एमकॉम और बीएससी के अलावा कोई दूसरे प्रोफेशनल कोर्स करने का मौका नहीं मिल पा रहा। प्रदेश के मात्र कुछ एक कालेजों में वोकेशनल कोर्सेज शिक्षा विभाग ने शुरू किए हैं। इन कोर्सेज में ही मात्र और मात्र दो ही ट्रेड छात्रों को उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। इन वीवॉक कोर्सेज में भी सीटें लिमिटिड रखी गई हैं, जिसकी वजह से कम छात्रों को इन कोर्सेज में प्रवेश मिल पा रहा है। वर्ष 2013 से जब से प्रदेश में यूजी डिग्री में रूसा को लागू किया गया है,वहां से कालेजों में सीटों की संख्या भी तय कर दी गई है। सीटों की संख्या तय होने के साथ ही इन तय सीटों पर प्रवेश छात्रों को मैरिट के आधार पर दिया जा रहा है। मैरिट के आधार पर अधिकतर छात्रों को तय सीटों पर प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। कॉमर्स संकाय में मैरिट का आंकड़ा 70 से 75 फीसदी के बीच में ही सिमिट कर रह जाता है। इसके अलावा मेडिकल और आर्ट्स में भी 60 से 65 फीसदी तक के ही छात्रों को प्रवेश कालेजों में मिल पा रहा है। रूसा में सीटों की संख्या मात्र 120 तक ही अधिकतर कोर्सेज में सिमिट कर रह गई है। पहले जहां कम प्रतिशतता वाले छात्रों को भी प्रवेश कालेजों में मिल जाता था वहीं रूसा में सीटों की संख्या तय होने से अब छात्रों को आसानी से प्रवेश कालेजों में नहीं मिल पाता है। इसकी वजह से अधिकतर छात्र अब कालेजों में प्रवेश न लेकर प्रोफेशनल कोर्सिस या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों पर ही फोकस कर रहे है।

अच्छी शिक्षा से ही मिलेगी

अच्छी लाइफ

रोहित 

रोहित नड्डा का कहना है कि बेहतर रोजगार के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षित होकर ही वे बेहतर नौकरी के काबिल हो सकते हैं। उनका कहना है कि अच्छी शिक्षा के मिलने से न केवल अच्छा रोजगार मिलता है, बल्कि सोसायटी में अपना नाम कमाया जा सकता है।  रोजगार तो एक अशिक्षित कामगार भी हासिल कर रहा है, लेकिन शिक्षित होकर मिलने वाले रोजगार की बात ही कुछ और है। बेहतर शिक्षा के जरिए ही इनसान समाज में भी अपना सराहनीय योगदान दे सकता है।

स्कूल-कालेजों में एक्सट्रा एक्टीविटीज जरूरी

स्पर्श

अजय

छात्र अजय और स्पर्श का कहते हैं कि शिक्षा किताबों में ही नहीं मिलती है। बचपन से बुढ़ापे तक इनसान सीखता रहता है। जिंदगी के हर दिन छोटे-बड़े  से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।   युवाओं के पूर्ण विकास के लिए शिक्षा संस्थानों में एक्स्ट्रा एक्टिविटीज का होना भी नितांत आवश्यक है, ताकि सभी सिर्फ इंजीनियर व डाक्टर ही न बनें अपितु समाज को किसी न किसी रूप में अपना योगदान दे सकें। अच्छी शिक्षा से ही इनसान जीवन में तरक्की कर सकता है।

रूसा ने बढ़ाई छात्रों की टेंशन

शरुन

छात्रा शरुन मानती हैं कि उनको रुचि के अनुसार विषय मिले हैं। वह कहती हैं कि उन्हें व उनके साथियों को वहीं विषय मिले है, जिसमें उनकी रुचि है। हालांकि यह भी सही है कि कई छात्र और छात्राएं ऐसे भी हैं, जिनको उनके पसंदीदा विषय नहीं मिले पाए हैं। उनका कहना है कि इसकी एक वजह यह भी है कि कालजों में रूसा सिस्टम लागू किया गया था। इसकी सजा कई छात्रों को भुगतनी पड़ी है। सीटे सीमित होने से भी कई छात्रों को उनके पसंदीदा विषय नहीं मिल पा रहे हैं। लिहाजा रूसा के चलते कई छात्र परेशान हैं।

छात्र संगठन बिगाड़ रहे माहौल

शैफाली

सलोनी

शैफाली व सलोनी का कहना है कि उनके संस्थान में काफी हद तक अच्छा माहौल, योग्य फैकल्टी व लाइब्रेरी जैसी सुविधा मिल रही है, लेकिन कई संस्थान ऐसे हैं, जहां पर इनकी कमी है। इससे छात्रों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।  इनका यह भी कहना था कि कई जगह छात्र संगठनों द्वारा कालेज का माहौल खराब किया जा रहा है। छात्र संगठन अपनी राजनीति चमकाने के लिए कालेज का मौहाल खराब कर रहे हैं और ऐसे में बेहतर फेकल्टी व अन्य सुविधाएं होने के बाद इन संस्थानों में शैक्षणिक माहौल भी खराब हो रहा है।

स्टूडेंट कम नहीं हुए, कालेज बढ़े

सेंटर फॉर एक्सीलेंस कालेज संजौली के प्रचार्य डा. चंद्रभान मेहता  ‘दिव्य हिमाचल’ से कुछ यह बोले....

दि हिः कालेजों में छात्रों की संख्या क्यों गिर रही है?

मेहता : ऐसा नहीं है कि छात्रों की संख्या गिर रही है। हां, जब से रूसा आया है, तब से सीटें तय कर दी गई हैं। तय सीटों में से अधिकतर कालेजों में सीटें पूरी भर रही है।

दूरदराज के क्षेत्रों में कालेज खुलने से जो छात्र बड़े कालेजों की तरफ  आते थे, अब वे वहीं अपने नजदीकी कालेजों में ही प्रवेश ले रहे हैं। ऐसे में बड़े कालेजों में छात्रों की संख्या जरूर कम हुई है, लेकिन जो कालेज खोले गए हैं,वहां लड़कियों की संख्या अधिक है, जो बेहतरीन पहल है।

दि हिः परंपरागत शिक्षा से हट कर छात्र क्या करना चाहते हैं?

मेहता : आज के दौर में छात्र ऐसी शिक्षा चाहते हैं, जिसमें रोजगार की संभावनाएं अधिक हों। ऐसे में कालेजों में सबसे पहले तो ऐसे कोर्स शुरू करने पर जोर देना होगा, जिससे कि छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया जा सके। यह तभी संभव हो सकता है जब यूजीसी इस तरह का बदलाव करे।

इससे पहले जब रूसा लागू किया गया था, तब यह प्रावधान था कि कालेजों में छात्रों को हॉबी बेस पर कई तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बारे में बताया जाता था, लेकिन अब वह समय की कमी के चलते हो नहीं पा रहा है। आज  सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की संभावना कम होती जा रही है। अवसर कम हैं और प्रतियोगिता अधिक है। ऐसे में छात्र ऐसी शिक्षा की ओर भाग रहे हैं, जहां उन्हें जल्द अच्छा रोजगार मिल सके।

दि हिः छात्रों की रुचि को बनाए रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए ?

मेहता ः छात्रों की रुचि को बनाए रखने के लिए सबसे पहले जो कोर्स छात्र पढ़ना चाहते हैं , उस तरह के कोर्स शुरू किए जाने चाहिएं। इसके अलावा मेरा अपना मानना है कि जो पर्यावरण और नैतिक शिक्षा जिसे हम उच्च शिक्षा में पढ़ना शुरू करते हैं, वे छात्र को तभी दे देनी चाहिए, जब वह प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहा होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से जुड़ी बारीकियां भी छात्रों की स्कूल और कालेज स्तर पर सिखाई जाएं तो इससे छात्रों की रुचि बनी रहेगी।

रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत

एपीजी विश्वविद्यालय के निदेशक डा. अजीत नेदूनगडी से बातचीत के अंश...

दि हिः कालेजों में छात्रों की संख्या क्यों गिर रही है ?

डा. अजीतः प्रदेश के कालेजों में शिक्षा का स्तर गिरा है। छात्रों को यहां स्तरीय शिक्षा नहीं मिल रही है, यही वजह है कि छात्र यहां से बाहर के संस्थानों का रुख कर रहे हैं।   हिमाचल के कालेजों में कला विषयों में छात्रों की रुचि काफी कम हुई है और इससे कालेजों में भी छात्रों की संख्या पर असर पड़ा है। दरअसल ये विषय छात्रों की आज के दौर में बेहतर शिक्षा हासिल करने के मकसद को पूरा नहीं कर रहे। कालेजों में जो शिक्षा दी जा रही है, वह उनको बेहतर करियर सुनिश्चित नहीं कर रही। इसका असर छात्रों की संख्या पर पड़ा है।

दि हिः परंपरागत शिक्षा से हट कर छात्र क्या करना चाहते हैं?

डा. अजीतः छात्र ऐसी शिक्षा चाहते हैं, जिनसे इनको न केवल रोजगार बल्कि एक अच्छी सैलरी वाली शिक्षा मिल सके। रोजगार अलग बात है, बेहतर सैलरी वाली नौकरी दूसरी बात है। आज के दौर के युवाओं की महत्त्वाकांक्षा बहुत ज्यादा बढ़ गई है और वे एक बेहतर लाइफ जीना चाहते हैं। ऐसे में छात्र एक बेहतर शिक्षा चाहते हैं, जो उनके सुनहरे भविष्य को संवार सके, उनके सपनों को पूरा कर सकें। देश में आज चिकित्सकों की भारी कमी है क्योंकि हमारे पास इतने डाक्टर तैयार ही नहीं हो पाते क्योंकि हम आज भी परंपरागत विषयों को पढ़ा रहे हैं। छात्र इस परंपरागत शिक्षा से हटकर शिक्षा ग्रहण चाहते हैं।

दि हिः छात्रों की रुचि को बनाए रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए ?

डा. अजीतः हमें छात्रों को शिक्षा देने का तरीका बदलना होगा। छात्रों को लर्न विद रीडिंग की बजाय लर्न विद डूइंग...तकनीक से शिक्षा देनी होगी। आज के छात्र ज्यादा मेहनत नहीं करना चाहते बल्कि वे स्मार्ट वर्क करना चाहते हैं। इसलिए छात्रों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए, जो व्यावहारिक हो और उसे सफलता की ओर ले जाए।

इंजीनियरिंग छोड़, मेडिकल की ओर मुडे़ युवा

प्रदेश में कुल 45 इंजीनियरिंग कालेज एक साल में तीन हुए बंद

फार्मेसी कालेजों की तरफ बढ़ रहा छात्रों का रुझान

हिमाचल प्रदेश में अब हर साल तैयार होंगे 700 डाक्टर

हिमाचल के छात्रों का करियर सर्च ट्रेंड देश की बयार में मेडिकल की ओर बह रहा है। राज्य में डाक्टरों की कमी ने मेडिकल की तरफ छात्रों का अधिक रुझान बढ़ा दिया है। इसके विपरीत इंजीनियरिंग एजुकेशन से छात्र रूठ गए हैं। हिमाचल प्रदेश में 45 सरकारी तथा निजी इंजीनियरिंग कालेज हैं। जमीनी सच्चाई यह है कि पिछले तीन सालों में सरकारी कालेजों को छोड़कर अन्य संस्थान खाली पड़े हैं। प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों की हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि एक साल के भीतर तीन प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों को ताला लग गया है। राज्य सरकार से मान्यता के दम पर कई प्राइवेट कालेज सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा के लिए बिना छात्रों के संस्थान चला रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार तकनीकी इंजीनियरिंग कालेज सुंदरनगर में भी कुछ कोर्स की सीटें खाली रही हैं। हालांकि तकनीकी शिक्षा में प्रदेश के छात्र फार्मेसी इंजीनियरिंग की तरफ रुचि जरूर दिखा रहे हैं। इसी कारण प्रदेश के निजी फार्मेसी कालेजों में छात्रों की संख्या भी बेहतर है। तकनीकी विश्वविद्यालय और एचपीयू से मान्यता प्राप्त फार्मेसी शिक्षण संस्थानों को छोड़कर अन्य कालेजों को छात्र ढूंढने पर नहीं मिल रहे।  प्रदेश में मेडिकल कालेज स्थापना में हिमाचल सरकार क्रियाशील दिख रही है। आईजीएमसी शिमला और टीएमसी के अलावा अब प्रदेश में चार और सरकारी कालेज खुल गए हैं। नेरचौक के अलावा नाहन, चंबा और अब हमीरपुर में मेडिकल कालेज स्थापित हो गया है।  इसके अलावा सोलन में निजी प्राइवेट कालेज चल रहा है। प्रदेश के इन मेडिकल कालेजों में हर साल 700 नए डाक्टर तैयार होंगे। इन संभावनाओं के चलते हिमाचल सरकार चिकित्सकों के ज्यादा से ज्यादा पद भरने की तैयारियों में अभी से जुट गई है। चिकित्सकों के लिए निजी क्षेत्र में भी रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। इस कारण इस फील्ड में युवाओं का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित दिख रहा है। बहरहाल हिमाचल प्रदेश के युवाओं को रुझान ऐसी शिक्षा की ओर हो रहा है, जो कि उन्हें अच्छे व्यवसाय की ओर ले जाए । गौरतलब है कि आजकल नौकरियों के लिए कड़ी प्रति स्पर्धा का दौर है । हर कोई एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। कंपीटीशन में आगे निकलने के लिए युवाओं को पहले से तैयार होना पड़ रहा है। कंपीटीशन में अव्वल रहने के लिए युवाओं को जहां कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है, लेकिन इसके अलावा बेहतर शिक्षण संस्थानों की भी जरूरत है । इसके अलावा प्रदेश में बेहतरीन कोचिंग संस्थानों की भी दरकार है, जहां युवा अपने आपको किसी भी प्रतियोगिता के लिए तैयार कर सकें।

जमा दो के बाद अच्छे संस्थान की तलाश

हिमाचल सरकार प्रदेश में बेहतर शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है। बावजूद इसके हिमाचल के छात्रों को शिक्षा का ढांचा अपनी पसंद का चाहिए। यही कारण है कि हिमाचली छात्र स्कूली स्तर की शिक्षा प्राइवेट संस्थानों में पसंद करते हैं। इसके विपरीत जमा दो की शिक्षा ग्रहण करने के लिए छात्र सरकारी संस्थान तलाशते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण निजी उच्च शिक्षण संस्थानों का आधारभूत ढांचा और शिक्षा की गुणवत्ता है। हिमाचल प्रदेश में निजी विश्वविद्यालय, निजी इंजीनियरिंग कालेज और एजुकेशन अकादमी मछली मार्केट की तर्ज पर खुल गई है। बिना आधारभूत ढांचे के कई निजी संस्थान शिक्षा के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। इसी कारण हिमाचल के छात्र एजुकेशन के लिए बाहरी राज्यों का रुख कर रहे हैं। हालांकि जमा दो तक की शिक्षा के लिए हिमाचल अब भी सबसे क्रेडिबल राज्य आंका गया है। उच्च शिक्षा के लिए ही छात्र बाहरी राज्यों में पलायन करने को मजबूर है।