शुभ या अशुभ कर्म

बाबा हरदेव

विद्वानों का कथन है कि पाप या पुण्य अथवा अशुभ या शुभ कर्म केवल मनुष्य के जीवन की धारणाएं हैं। जिसे यह विश्वास है कि वह कर्ता है अथवा कार्य करने वाला है, तो उसे ठीक से यह भी ध्यान कर लेना चाहिए कि इसने ही वह बुरा कर्म किया है अथवा अच्छा कर्म किया है। अर्थात जो मनुष्य मानता है कि इसने वह कार्य किया है तो फिर वह उस कार्य के फल से न बच सकेगा। अतः जिसने वह कर्म अपने द्वारा किया हुआ मान लिया, तो फिर नैतिकता से बचना असंभव है, फिर नीति आएगी ही, क्योंकि कोई भी काम सिर्फ कर्म नहीं है, यह अच्छा है या बुरा भी है और कर्म के साथ जुड़ते ही मनुष्य अच्छे या बुरे के परिणाम के साथ भी जुड़ जाता है। अतः अच्छे और बुरे परिणाम से हमारा संबंध हमारे कर्तापन के भाव के कारण ही होता है। अतः जिस क्षण हमने सोचा कि हमने कुछ किया, उसी क्षण हमारे कर्म का विभाजन हो गया और बुरे या अच्छे का निर्णय हमारे साथ जुड़ गया। उदाहरण के तौर हमने जमीन पर पानी को बहाया, अब जहां-जहां जमीन में गड्ढा होगा वहां-वहां पानी भर जाएगा और यदि कोई गड्ढा जमीन में न हो, तो पानी उस ओर नहीं बहेगा। अब ऐसे ही यदि कर्तापान रूपी गड्ढा हमारे भीतर मौजूद हो, तो ही पाप या पुण्य और शुभ या अशुभ रूपी पानी इसमें भर पाता है, क्योंकि इस सूरत में कर्तापन एक गड्ढे का काम करता है। अब यदि मनुष्य के मन में किसी प्रकार का कर्तापन का भाव न रह जाए, तो फिर उसके लिए न कुछ अच्छा है न कुछ बुरा है। फिर अच्छे-बुरे की बात समाप्त हो जाती है। अतः पाप या पुण्य शुभ या अशुभ का ध्यान अथवा अच्छे-बुरे का ख्याल तभी तक है जब तक हमें यह ख्याल है कि हम कर्ता हैं। कर्तापन के भाव से ऊपर उठ जाने में तथा अकर्तापन के भाव मन में प्रवेश करने में ही पाप या पुण्य और अशुभ या शुभ कर्म से मुक्ति का रहस्य छिपा है। अब कर्तापन की कला मनुष्य को केवल पूर्ण सद्गुरु ही प्रदान कर सकता है और कोई उपाय नहीं है। ऐसे ही भगवान श्रीकृष्ण गीता में फरमाते हैंः

नदते गीता कस्यचित्पापं न चैव सकृतं विभुः।

अतः इस परम शक्ति परमात्मा पर पाप या पुण्य और शुभ या अशुभ का कोई भी परिणाम, कोई प्रभाव नहीं होता है। लेकिन हम लोग तो अज्ञान से दबे हुए हैं, जो स्वप्न लोक में खोए हुए हैं अर्थात अज्ञान और माया में डूबे हुए हैं और पाप या पुण्य और शुभ या अशुभ के जाल में फंसे हुए विचरण करते रहते हैं। जैसे रात में हम स्वप्न देखते हैं कि हमने चोरी की है और एक रात यह स्वप्न में देखते हैं कि हम साधू हो गए हैं।  वास्तविकता तो यह है कि प्रातःकाल जागकर दोनों स्वप्न रह जाते हैं, इनमें किया गया कर्म न कुछ बुरा रह जाता है न अच्छा। इसी प्रकार पूर्ण सद्गुरु की कृपा द्वारा जब हम अज्ञान रूपी स्वप्न से जागकर आध्यात्मिक जागृति से भरकर आत्मबोध उपलब्ध कर लेते हैं, तब हम ईश्वर की परमासत्ता में प्रवेश कर जाते हैं।

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