Thursday, July 09, 2020 04:20 AM

श्याम सेन की पुत्री का विवाह हुआ था कल्याण चंद के साथ

जिलावार हिमाचल (बिलासपुर) भाग-12

 श्याम सेन की पुत्री का विवाह कल्याण  चंद से हुआ था। एक दिन राजा और रानी चौसर खेल रहे थे कि  किसी बात पर दोनों में झगड़ा हो गया। राजा ने चौसर को रानी के सिर पर दे मारा, रानी ने अपने पिता सुकेत के राजा श्याम सेन को पत्र लिखा व सारी व्यथा लिख डाली। अतः दोनों  में लड़ाई छिड़ गई। कल्याण चंद ने पहले तो बैरागढ़ और बाद में पुंग जीत लिया। वहां उसने अपनी सेना बाजार लूटने के लिए भेज दी…

गतांक से आगे

एक बार गुरु हरगोविंद सिंह कीरतपुर आए। राजा कल्याण चंद ने कीरतपुर  और कल्याणपुर उन्हें जागीर में दिया। सन् 1634 ईस्वी में गुरु हरगोविंद सिंह वहीं रहने लगे। मुगल दरबार से राजा की आज्ञा हुई कि उन्हें वहां से निकाल दिया जाए, परंतु राजा ने इसकी कोई परवाह नहीं की। सुकेत का राजा श्यामसेन (1620-53 ईस्वी) कल्याण चंद का समकालीन था। श्याम सेन की पुत्री का विवाह कल्याण चंद से हुआ था। एक दिन राजा और रानी चौसर खेल रहे थे कि किसी बात पर दोनों में झगड़ा हो गया। राजा ने चौसर को रानी के सिर पर दे मारा, रानी ने अपने पिता सुकेत के राजा श्याम सेन को पत्र लिखा सारी व व्यथा लिख डाली। अतः दोनों में लड़ाई छिड़ गई। कल्याण चंद ने पहले तो बैरागढ़ और बाद में पुंग जीत लिया। वहां उसने अपनी सेना बाजार लूटने के लिए भेज दी। उस समय कल्याण चंद को अकेला पाकर जंगल में छिपे हुए सुकेत के सिपाही निकल आए और उन्होंने राजा को मार दिया। जिस स्थान पर राजा की मृत्यु हुई, उसे आज भी ‘कल्याण चंद की दवारी’ के रूप में जाना जाता है। इस लड़ाई में श्याम सेन भी गंभीर रूप से घायल हो गया था, जो अंततः उसकी मृत्यु का कारण बना। राजा की दोनों रानियां सती हो गईं और वहीं पर उनकी देहरियां बनाई गईं। कुछ विवरण के अनुसार केवल सुकेती रानी ही सती हुई थी।

राजा तारा चंद (1645 ईस्वी) :

कल्याण चंद के आठ पुत्र थे और तारा चंद उनमें सबसे बड़ा था। इसने राजा बनने के पश्चात हिंदूर पर चढ़ाई करके महलोग तक का पहाड़ी प्रदेश जीत लिया और नालागढ़ के ऊपर अपने नाम से ‘तारागढ़ किला’  और ‘तारा देवी का मंदिर’ बनवाया। जब गुरु हरगोविंद सिंह (1595-1644 ईस्वी) और उनके पश्चात गुरु हरिराय (1630-1661 ईस्वी) ने कीरतपुर में स्थायी तौर पर रहना आरंभ कर दिया, तो शाहजहां ने राजा तारा चंद को उनको वहां से निकाल देने के लिए कहा। परंतु राजा ने मुगल सम्राट के फरमानों की अवहेलना की। इसलिए नजाबत खां ने शाहजहां के आदेश पर 1645 ईस्वी में कहलूर पर आक्रमण करके राजा तारा चंद को बंदी बना लिया। गुरु हरिराय ने स्वयं सिरमौर में किसी ‘थपल’ नामक स्थान में शरण ली। कहलूर की आंतरिक स्थिति से लाभ उठाकर नालागढ़ के राजा ने सुकेत और कांगड़ा के राजाओं की अपनी ओर मिलाकर कहलूर पर तीनों तरफ से आक्रमण कर दिया। हिंदूर ने कई किले जीते। हिंदूर में तारागढ़ नामक किला उसी ने बनवाया था, जो अब ढह गया है।       -क्रमशः

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