श्री गोरख महापुराण

हिंगलाज देवी का दर्शन करके मछेंद्रनाथ चलकर बाराहमलहार नाम के वन में गए और वहां के ग्राम में पहुंच कर एक मंदिर में शांति से सो गए। रात के दूसरे पहर में उन्हें एक जोरदार आवाज सुनाई दी और असंख्य मशालें दिखाई दीं। यह सब देख मछेंद्रनाथ को लगा कि मुझ पर भूतों ने आक्रमण कर दिया। तब मछेंद्रनाथ ने विचारा कि मुझे अपनी करामात द्वारा इन भूतों को बस में करना चाहिए। इस प्रकार विचार कर योगी ने स्पर्शास्त्रा की योजना बनाकर अस्त्र की शक्ति के प्रभाव से सब भूतों को स्थिर कर दिया...

अष्ट भैरव की बात सुन देवी ने मछेंद्रनाथ से कहा, ‘बेटा!’ मुझे तुम्हारा पराक्रम देखने की ख्वाहिश है। मैंने सुना है कि तुम पहाड़ उड़ा कर फिर उसी स्थान पर रख सकते हो। क्या मुझे अपने करामत दिखाओगे?’ देवी की इस प्रकार की याचना सुन, उसने मंत्र पढ़कर भस्मी पर्वत पर फेंकी। तब पहाड़ आकाश में उड़ने लगा। तब देवी ने प्रशंसा कर मछेंद्रनाथ की पीठ थपथपाई और पहाड़ को नीचे उतारने को कहा। तब योगीराज ने वायु अस्त्र का प्रयोग किया और पहाड़ उतरकर अपनी जगह पर आकर जम गया। योगी की करामात देख देवीजी को संतोष हुआ। फिर देवी योगी को अपने स्थान पर ले गई। जहां वह तीन दिन रहे और जाते समय देवी ने प्रसन्न हो स्पर्शास्त्र और भिन्नास्त्र दो शस्त्र प्रसाद स्वरूप मछेंद्रनाथ योगी को दिए। तब योगीराज ने प्रसन्न हो उन्हें स्वीकार किया और देवी को नमस्कार कर वहां से चल पड़े।

बेताल की हार

हिंगलाज देवी का दर्शन करके मछेंद्रनाथ चलकर बाराहमलहार नाम के वन में गए और वहां के ग्राम में पहुंच कर एक मंदिर में शांति से सो गए। रात के दूसरे पहर में उन्हें एक जोरदार आवाज सुनाई दी और असंख्य मशालें दिखाई दीं। यह सब देख मछेंद्रनाथ को लगा कि मुझ पर भूतों ने आक्रमण कर दिया। तब मछेंद्रनाथ ने विचारा कि मुझे अपनी करामात द्वारा इन भूतों को बस में करना चाहिए। इस प्रकार विचार कर योगी ने स्पर्शास्त्रा की योजना बनाकर अस्त्र की शक्ति के प्रभाव से सब भूतों को स्थिर कर दिया। सारे भूत पेड़ों के समान तन कर खड़े हो गए, वह अपने नित्य के नियमानुसार बेताल से मिलने जा रहे थे पर बीच में अटक जाने के कारण वह बेताल से मिलने नहीं जा सके। इधर बेताल ने विचारा ‘वह अब तक क्यों नहीं आए?’ इस बात का पता लगाने के लिए पांच-सात भूत और भेजे। जब वह शरमा नदी के किनारे पर आए और अपने जाति भाइयों की दुर्दशा देखकर उनसे बातचीत की तब उन्होंने बताया कि यहां कोई सिद्ध योगी आ पहुंचा है। यह सब करामात उसी की है। तब वह लोग पता लगाने लगे कि वह सिद्ध कहां ठहरा है? जब उन्होंने मछेंद्रनाथ को दूर से देखा तब जाना ये सब इसी की करामात है। फिर सोच-विचार कर वह भूत मछेंद्रनाथ के पास गए और हाथ जोड़ कर प्रार्थना की ‘हे स्वामी!’ हम भूतों की जाति पतित होती है। इसलिए हमारे साथियों को क्षमा कर इन्हें छोड़ने की दया करें? योगीराज ने पूछा ‘जब यह भूत यहां अटक गए उस समय तुम कहां थे और तुम कैसे बच गए?’ इस पर भूत बोले, जब यह भूत लोग समय पर नहीं पहुंचे तब बेताल ने हमें पता लगाने के लिए भेजा है। अब आप इन्हें छोड़ दें जिससे यह बेताल के पास जाकर  क्षमा मांगे। मछेंद्रनाथ बोले, मैं इन्हें नहीं छोडूंगा। मुझे बेताल की तरह बहादुरी देखनी है। मुझे भी तो पता चले वह कितना बहादुर है। मछेंद्रनाथ की बात सुनकर वह भूत बेताल के निकट जा पहुंचे और पैरों में सिर रख कर बोले  कि सिद्धयोगी यहां आ पहुंचा है और शरमा नदी के किनारे सारे भूतों को मंत्र शक्ति द्वारा उसने रोक रखा है और आपके संग भी वैसा ही करतब करने का उसका विचार मालूम पड़ता है। भूतों की बात सुनकर बेताल विश्वभर के भूतों की फौज मंत्र शक्ति द्वारा बुलाई और भूतों की फौज ने आकर बैताल के कदमों में अपने-अपने मस्तक रखे। बेताल ने उन्हें सारी हकीकत समझाई और भूतों की अपनी फौज लेकर शरमा नदी के किनारे अस्त्रों-शस्त्रों सहित आ पहुंचा। तब भूतों ने अपनी करामात दिखाई। भयंकर रूप रखकर तब मछेंद्रनाथ ने भस्मी को आमंत्रित करके अपने पास रख लिया।