Wednesday, September 18, 2019 05:37 PM

श्री गोरख महापुराण

सब देवों ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और भगवान विष्णु मछेंद्रनाथ को अपने विमान में बिठाकर बैकुंठ ले गए। बैकुंठ में उन्होंने मछेंद्रनाथ को अपने साथ अपने ही आसन पर बैठाया। वहां पर मछेंद्रनाथ का खाना-पीना, उठना-बैठना सब भगवान विष्णु के साथ ही था। वह नित्यप्रति मणिकर्णिका में स्नान करते थे। फिर उन्होंने अपने पूर्व जन्म की समाधि देखने की इच्छा प्रकट की, तब भगवान विष्णु ने उन्हें ले जाकर वासुदेव व कवितानारायण की समाधि दिखलाई जिसे देखकर मछेंद्रनाथ बहुत प्रसन्न हुए...

मछेंद्रनाथ बोले, अरे मूर्ख! तू मुझे धमकी देकर अपनी इज्जत गंवा रहा है, सो तू ही मारा जाएगा। तेरे समान बहुत से दिलावर मेरे सामने आए हैं। अब तेरे सिर पर मौत सवार हो गई है इसलिए तू यहां आया है। इतना सुन वीरभद्र ने धनुष आगे कर मछेंद्रनाथ से राम का नाम जपने को कहा।  इस पर मछेंद्रनाथ बोले अरे मूर्ख! राम का नाम तुझे इतना अपवित्र लग रहा है जो मुझे जपने के लिए कह रहा है। यह मन में स्मरण कर कि इसी राम के मंत्र द्वारा शिवजी व वाल्मीकि जी सुखी हुए और तुझे भी यही मंत्र मुक्ति देगा। इतना कहकर मछेंद्रनाथ ने भस्मी हाथ में लेकर वज्रास्त्र को शुद्ध करके फेंका तो वह चारों दिशाओं में घूमने लगा। तब वीरभद्र को अपना वाण तिनके के समान दिखाई देने लगा। जो वाण योगी के प्राण लेने के लिए था वह भस्मी के जोर से आकाश में घूमता दिखाई देने लगा और मछेंद्रनाथ की शक्ति से वह वाण टुकड़े-टुकड़े हो गया।  इस पर वीरभद्र ने नागा अस्त्र छोड़ा और मछेंद्रनाथ ने अपनी रक्षा के लिए रुदाक्ष और खगेद्रास्त्र फेंका, जिसने वीरभद्र को जर्जर कर डाला। उसके बाद वीरभद्र ने वातास्त्र और मछेंद्रनाथ ने पर्वतास्त्र छोड़ा। इस पर दोनो पक्ष एक-दूसरे को नीचा दिखलाने की कोशिश करते रहे। अंत में ब्रह्मा, विष्ण, महेश युद्ध स्थान पर आ पधारे और मछेंद्रनाथ की शंका का समाधान किया। फिर वीरभद्र को बुलाकर मछेंद्रनाथ से मित्रता करवाई और बताया कि ये कविनारायण का अवतार हैं।  तब तो वीरभद्र भी उन्हें वरदान देने को तैयार हो गए और कहने लगे कि मैंने बड़े-बड़े वीर देखे हैं, लेकिन मछेंद्रनाथ के समान कोई नहीं देखा। फिर वीरभद्र ने आलिंगन कर पूछा आपकी क्या इच्छा है? तब मछेंद्रनाथ ने कहा, मैंने जो सांवरी मंत्र सिद्ध किए हैं उनमें आपकी सहायता की जरूरत है। वीरभद्र ने मछेंद्रनाथ को वरदान दिया और मछेंद्रनाथ ने तीनों देवों को प्रणाम किया।  श्रीविष्णु भगवान ने मछेंद्रनाथ को अपने पास बुलाकर कहा, जब तुम मुझे याद करोगे तभी मैं तुम्हारे संकट दूर करूंगा। ऐसा कहकर विष्णु जी ने अपना चक्रास्त्र उसे दे दिया। शिवजी ने प्रसन्न होकर अपना त्रिशूलास्त्र, ब्रह्माजी ने शापादायास्त्र और इंद्र ने वज्रास्त्र प्रदान किया। बाकी सब देवों ने अपने-अपने ग्रहों को प्रस्थान किया। उसी समय मछेंदनाथ ने उन देवों से प्रार्थना की मेरी इच्छा मणिकर्णिका पर स्नान करने की है,सो आप मेरी इच्छा पूर्ण करें। सब देवों ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और भगवान विष्णु मछेंद्रनाथ को अपने विमान में बिठाकर बैकुंठ ले गए। बैकुंठ में उन्होंने मछेंद्रनाथ को अपने साथ अपने ही आसन पर बैठाया। वहां पर मछेंद्रनाथ का खाना-पीना, उठना-बैठना सब भगवान विष्णु के साथ ही था। वह नित्यप्रति मणिकर्णिका में स्नान करते थे। फिर उन्होंने अपने पूर्व जन्म की समाधि देखने की इच्छा प्रकट की, तब भगवान विष्णु ने उन्हें ले जाकर वासुदेव व कवितानारायण की समाधि दिखलाई जिसे देखकर मछेंद्रनाथ बहुत प्रसन्न हुए। बैकुंठ में मछेंद्रनाथ एक वर्ष तक रहे। उसके बाद वह इंद्र के साथ अमरावती  आ गए।  वहां भी तीन महीने रहने के पश्चात ब्रह्माजी के कहने पर नारदमुनि के साथ सत्यलोक को गए। वहां छः माह रहे। इस तरह सात साल मेहमानदारी में रहे। सभी देवताओं ने उन्हें एक-एक दिन अपने पास रखा। फिर मछेंद्रनाथ ने देवताओं से आज्ञा ली और देवताओं ने उन्हें विमान में बिठाकर मृत्युलोक  में भिजवाया।