Sunday, November 17, 2019 03:27 PM

श्री गोरख महापुराण

गृहस्वामिनी पश्चाताप के स्वर में बोली, बेटा मैं तेरी आंख का क्या करूंगी। मैं तो तेरी गुरु भक्ति देखकर खुद ही दुःखी हो रही हूं। बेटा मुझे माफ कर दो। इतना सुनकर गोरखनाथ ने अपनी पुतली आंख में धर ऊपर से गीला कपड़ा बांध लिया। वह चाहते थे कि इस घटना का पता गुरुदेव को न चले। एक हाथ आंख पर रखकर दूसरे हाथ में दही बड़ा लेकर वह चल पड़े। मछेंद्रनाथ के समक्ष दही-बड़ा रखकर बोले, गुरुदेव! एक ही दही-बड़ा मिला है। गुरु मछेंद्रनाथ ने अपने शिष्य की आंख पर पट्टी बंधे देखकर पूछा कि बेटा! यह तुम्हारी आंख पर पट्टी क्यों बंधी है? गोरखनाथ ने बात को छिपाते हुए कहा, कोई बात नहीं, केवल आंख में दर्द है। मछेंद्रनाथ बोले कि मैं भी तो देखूं कि दर्द का क्या कारण है? गोरखनाथ बोले कि गृहस्वामिनी ने दही-बड़े के बदले में एक आंख मांगी थी। फिर उसने आंख भी नहीं ली और दही-बड़ा भी दे दिया। अपने शिष्य से यह घटना सुनकर मछेंद्रनाथ बहुत नाराज हुए। अपने गुरु को नाराज देखकर गोरखनाथ बोले कि गुरुदेव यह सब भ्रांतिवश हुआ है। इसमें गृहस्वामिनी का कोई दोष नहीं है। इसलिए आप उसे क्षमा कर दें। मछेंद्रनाथ बोले कि बेटा! जब तुम ही उसे क्षमा कर आए, तो मैं ही व्यर्थ क्यों नाराज होऊं। गोरखनाथ बोले यह सब आप ने ही सिखाया है गुरुदेव। मछेंद्रनाथ बोले कि बेटा! अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि  मुझे गुरु भक्त चेला मिला है। जो मेरा नाम रोशन करेगा और मेरी इच्छा पूर्ति के लिए अपने प्राण देने में भी हिचकिचाएगा नहीं। मैं भी तुझे हर प्रकार की गुप्त विद्याएं सिखाकर परिपूर्ण कर दूंगा। गोरखनाथ ने अपना सिर गुरु के चरणों में झुका दिया। मछेंद्रनाथ ने गोरखनाथ को चरणों से उठाकर आंख से पट्टी खोली और पुतली को स्वच्छ जल से धोया। फिर भली प्रकार पुतली को आंख में लगाकर विधिपूर्वक मंत्र का जाप किया जिससे आंख पहले जैसी हो गई और दर्द नाममात्र को भी नहीं रहा। मछेंद्रनाथ को योग्य चेला मिल गया और गोरखनाथ को योग्य गुरु। जिन्होंने अपने शिष्य को सर्व विद्या संपन्न बना दिया। अब गोरखनाथ भी महान सिद्ध व परम योगी हो गए।

गोरखनाथ जी की प्रथम तपस्या

गोरखनाथ और गुरु मछेंद्रनाथ भ्रमण करते हुए बद्रीनाथ धाम जा पहुंचे। गोरखनाथ सर्व विद्याओं के विद्वान हो गए थे। परंतु विधि-विधान जानना भी परम आवश्यक होता है। इसलिए भगवान शिवजी को तपस्या द्वारा प्रसन्न करना चाहिए। ऐसा विचार कर मछेंद्रनाथ बोले बेटा गोरख! अभी तुम्हें शिव कृपा की आवश्यकता बाकी है। उनकी कृपा के बिना सारी विद्याएं अधूरी हैं। अगर तुम पर शिवजी की कृपा का हाथ हो जाए, तो तुम किसी भी बड़े से बड़े संकट का सामना साधारणतया कर लोगे।

गहना नाथ की कथा

कनकगिरी ग्राम से चलकर दोनों गुरु चेला चंद्रागिरी ग्राम में आ पहुंचे। वहां गुरुदेव ने अपने चेले को चारों वेद, छहों शास्त्र तथा अठारह पुराण दिए और सांवर विद्या को सिखाकर भूत-प्रेत, बेताल आदि को वश में करने के मंत्रों का जाप सिखाया। इसके अलावा देवी-देवताओं के दर्शनों की विधि सिखाकर उनके दर्शन भी कराए और उनसे आशीर्वाद भी दिलवाए। इस प्रकार मछेंद्रनाथ ने अपने शिष्य को ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी बना दिया। गोरखनाथ को देवी-देवताओं की दया सहज ही मिल गई। कभी-कभी गुरु गोरखनाथ अपने गुरु के आदेशानुसार प्रथक यात्रा भी करते थे। संत, महंत, योगी, संन्यासियों की महिमा अपरंपार होती है। उनकी माया का पार कोई बिरला ही भाग्यशाली पाता है। इन लोगों के चमत्कारों को देखकर देवताओं की तो बात ही क्या है ऋषि-मुनि भी समझ नहीं पाते हैं। इसलिए इंसान संतों की पूजा भी भगवान की पूजा के समान ही करते हैं। सच्चे संत माता-पिता के समान ही अपने भक्तों पर कृपा करते हैं। यह जनता से दूर-दूर ही रहते हैं।