Monday, June 01, 2020 02:35 AM

संकटकाल में साहित्य का सरोकार

श्रीकांत अकेला

मो.-9816182525

ऐसे समय में जब पूरा राष्ट्र कोरोना जैसी महामारी के भय से त्रस्त  है और स्वाभाविक है कि समाज का सारा तबका, देश-प्रदेश की सरकारें अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार इस आपदा से पूरे जतन से बाहर निकलने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं। क्योंकि  साहित्य समाज का दर्पण है, इसलिए इस विषय में एक साहित्यकार, लेखक और बुद्धिजीवी अपने को एक सजग-जागरूक  प्रहरी के रूप में अग्रणी भूमिका में आ सकता है। क्योंकि कोरोना को हराना है, इसलिए एक साहित्यकार इस विपदा के समय जहां एक ओर सोशल मीडिया के द्वारा घरों में कैद जिंदगी को  अपनी-अपनी लेखनी और सकारात्मक विचारों से उनकी बेचैनियां कम करने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, वहीं दूसरी  ओर अपने-अपने संपर्कों में शामिल लोगों की भी अपनी क्षमता  के अनुसार मदद में भी हाथ बंटा सकता है।

आज कुछ लोग कोरोना के संवाहक भी बन गए हैं, कुछ सोशल डिस्टेंसिंग की भी उपेक्षा कर रहे हैं तो कुछ कोरोना से लड़ने वाले कर्मवीरों पर  घातक हमले भी कर रहे  हैं। यह सिर्फ  नासमझी है। यह अगर अज्ञानता है तो इसके लिए जागरूकता का हाथियार भी एक साहित्यकार बन सकता है। अपने-अपने घरों में कैद साहित्यकार का मन निश्चित तौर पर समाज की पीड़ा को समझ रहा होगा और आज उसका धर्म भी बनता है कि समाज के इस रूप को भी लेखनी के जरिए कुछ सकारात्मक रूप में रचा जाए, समाज की वेदना एवं व्यग्रता और उम्मीदों को भी कलम की एक पैनी धार दी जाए, कर्मवीरों को स्वर और सामर्थ्य दी जाए। जहां तक मेरा सवाल है कि मैं आजकल इस संकटकाल में क्या कुछ कर रहा हूं तो मैंने ऐसे समय में हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे आदरणीय शांता कुमार के चार उपन्यास, नामतः कैदी, मन के मीत, लाजो और दीवार के उस पार, पढ़ने के साथ-साथ कुछ साहित्यकारों की रचनाओं और काव्य संग्रह को भी पढ़  लिया है या पढ़ रहा हूं।

इनमें अदिति गुलेरी की बात वजूद की, चिर आनंद की वृक्ष जो जैसे कोई छतनार, पंकज तन्हा की शब्द तलवार है, पवन बक्शी  की किताब अर्घ्य और हाटी समुदाय को पढ़ने के साथ-साथ कुछ मित्रों की रचनाएं भी सोशल मीडिया में पढ़ लेता हूं। इसके साथ ही मैं आजकल हिमाचल प्रदेश के उन साहित्यकारों को भी अपनी  वॉल पर खूब जगह दे रहा हूं जो अच्छा लिख रहे हैं, लेकिन  सुर्खियों से दूर हैं। इस कार्य को खूब सराहा भी जा रहा है। क्योंकि  मैं कुछ नामी सामाजिक संगठनों से भी जुड़ा हूं, इसलिए हम  मिलकर लगभग दो हजार मास्क भी बांट  चुके हैं और दवाई तथा भोजन व्यवस्थाओं में भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान दे रहा  हूं। कुछ काव्य संग्रह की समीक्षा भी लिखने का मन है।

खैर जो भी हो, इस कठिन दौर में एक संवेदनशील लेखक, कवि या साहित्यकार कैसे चुप बैठ सकता है। उसके पास आज समय ही समय है, वह चाहे तो ऑनलाइन माध्यमों से नवोदित लेखकों व साहित्यकारों के साथ-साथ बाल कवियों-लेखकों को भी अपना आशीर्वाद दे सकता है। उनका मार्गदर्शन भी कर सकते हैं। उनकी रचनाएं मंगवाकर उनमें सुधार जैसे काम भी कर सकते हैं। यही नहीं, ऑनलाइन लाइव जैसे कार्यक्रमों के जरिए समाज में जन  जागरूकता फैलाने में अपनी अग्रणी भूमिका का निर्वाह भी कर सकते हैं। अंत में मैं सबसे अनुरोध करना  चाहूंगा कि साहित्यिक सेवा से जुडे़ लोग इस संकटकाल में सक्रिय होकर समाज-सरकार का सहयोग करें और अपने आसपास रहने वाले गरीब-असहाय लोगों की भी देखभाल जरूर करें। देखना, हमारी यही सकारात्मक सोच कोरोना को जरूर हराएगी और निश्चित रूप से हम जीत जाएंगे, हम अपने में एक सकारात्मक विश्वास पैदा करें।