Tuesday, February 18, 2020 07:04 PM

संध्या करने से थकान काफूर हो जाती है

संध्या में प्राणायाम, उपासना, आसन, जप, देव-वंदना, दिग्बंधन तथा मोचनादि कई बातों का अंतर्भाव रहता है। संध्या करने से दिनभर की थकान काफूर हो जाती है। अलग-अलग पंथों, संप्रदायों और शाखाओं के अनुसार संध्या करने के भेद भले ही अलग हों, लेकिन उन सबका उद्देश्य एक ही है- नित्य दैनिक क्रियाओं के लिए स्वयं को शारीरिक तथा मानसिक रूप से तैयार करना। उल्लेखनीय है कि संध्या न करने वाले व्यक्ति (साधक) को कोई भी पुरश्चरण तथा अनुष्ठान करने की आज्ञा शास्त्र नहीं देता। कुछ अटल प्रसंगों के कारण संध्या का त्याग होने पर अगली बार संध्या करते समय खंडित संध्या करने के बाद अगली संध्या करें...

-गतांक से आगे...

संध्या के ऐहिक फलित के संबंध में कहा गया है- ‘ऋषयो दीर्घ संध्यात्वात दीर्घमायुरवाप्नुयुः’ अर्थात ऋषि दीर्घ संध्या करके दीर्घायुषी बनें। संध्यावंदन जितने अधिक समय तक की जाती है, आयु की वृद्धि उतनी ही अधिक होती है। काल की दृष्टि से संध्या के पांच काल हैं- प्रातः, मध्यान्ह, सायं, तुरीय और पंचमकाल। इनमें अर्धरात्रि से पहले का समय तुरीय और बारह से चार बजे तक का समय पंचमकाल कहलाता है। संध्या की योजना और रचना करते समय ही ऋषि-मुनियों ने मानव देहांतर्गत चयापचयों का विचार किया था। प्रतिदिन संध्या करने पर शरीर में संजीवनी का संचार होता है। संध्या में प्राणायाम, उपासना, आसन, जप, देव-वंदना, दिग्बंधन तथा मोचनादि कई बातों का अंतर्भाव रहता है। संध्या करने से दिनभर की थकान काफूर हो जाती है। अलग-अलग पंथों, संप्रदायों और शाखाओं के अनुसार संध्या करने के भेद भले ही अलग हों, लेकिन उन सबका उद्देश्य एक ही है- नित्य दैनिक क्रियाओं के लिए स्वयं को शारीरिक तथा मानसिक रूप से तैयार करना। उल्लेखनीय है कि संध्या न करने वाले व्यक्ति (साधक) को कोई भी पुरश्चरण तथा अनुष्ठान करने की आज्ञा शास्त्र नहीं देता। कुछ अटल प्रसंगों के कारण संध्या का त्याग होने पर अगली बार संध्या करते समय खंडित संध्या करने के बाद अगली संध्या करें। इस प्रकार तीन दिनों की छह बार संध्या करना रह जाए तो चौथे दिन कर सकते हैं। किसी भी कारणवश तीन से अधिक दिन संध्या का त्याग होने पर एक हजार बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। यदि कई दिनों तक संध्या न हो पाए तो गायत्री मंत्र का दस सहस्र जप करना चाहिए।

पंचकाल निरूपण

अहोरात्र काल का विभाजन रुद्रयामल तंत्र में पांच प्रकार से किया गया है जो क्रमशः प्रातःकाल, मध्यान्हकाल, संध्याकाल, तुरीयकाल व पंचमकाल हैं। प्रातःकाल को सृष्टिरूपा कहते हैं जिसकी अधिष्ठात्री देवी ‘ब्रह्मणी’ हैं। मध्यान्हकाल को स्थितिरूपा कहते हैं जिसकी अधिष्ठात्री दवी ‘वैष्णवी’ हैं। संध्याकाल को संहाररूपा कहते हैं जिसकी अधिष्ठात्री देवी ‘सरस्वती’ हैं। तुरीयकाल को तुरीयारूपा कहते हैं जिसकी अधिष्ठात्री देवी ‘पंचमुखी गायत्री’ हैं। पंचमकाल को पंचमीरूपा कहते हैं जिसकी अधिष्ठात्री देवी ‘विराटरूपा गायत्री’ हैं। इन्हीं विराटरूपा गायत्री देवी में समस्त वेद समाहित हैं।