Wednesday, September 18, 2019 04:56 PM

संन्यास की यात्रा

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे...

पानी में खड़े रहकर फिर वह बंदर से काफी देर तक विनती करते रहे, पर बंदर ने कोपिन वापस नहीं किया। फिर यह सोचकर कि नग्नावस्था में वह कैसे भ्रमण करेंगे? किसी बच्चे की तरह बेचैन हो उठे, क्या यही भगवान की इच्छा है? इसके बाद स्वामी जी पानी से बाहर आए और घने जंगल में घुस गए, उन्होंने मन ही मन में निश्चय किया कि  जब तक पहनने को कपड़ा नहीं मिलेगा, तब तक यहीं बैठकर अनशन करते रहेंगे। इतने में पीछे मुड़कर देखा तो एक आदमी तेजी से उनकी ओर बढ़ा आ रहा था। मगर स्वामी जी ने उसकी बात न सुनी तथा और तेजी से आगे बढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति दौड़ता हुआ आकर उनके सामने खड़ा हो गया,स्वामी जी ने देखा उसके हाथ में कुछ खाने की चीजें व एक गेरुआ कपड़ा था। उनके कहने पर स्वामी जी ने उन सभी चीजों को ग्रहण कर लिया। फिर वो व्यक्ति जंगलों में जाकर गायब हो गया। वस्त्र पहनकर वे फिर श्री राधाकुंड लौट आए। यह देखकर वह आश्चर्य में पड़ गए कि उनका वही कोपिन अपने पहले वाले स्थान पर ही रखा हुआ था और सूखा हुआ था।  इस घटना से उनका मन बड़ा प्रसन्न हुआ। इसके बाद वे श्रीराधाकुंड में कृष्ण गुणगान करने लगे। वृंदावन से हरिद्वार जाने के लिए रास्ते में हाथरस का स्टेशन पड़ता है। वहां का स्टेशन मास्टर शरतचंद्र गुप्त एक दिन गाड़ी का समय हो जाने की वजह से यार्ड में होकर अपने दफ्तर जा रहा था। चलते हुए स्टेशन पर उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। इस संन्यासी के मुख पर इतना तेज था कि शरतचंद्र गुप्त प्रभावित हुए बिना न रह सके और उनके करीब जाकर प्रणाम करते हुए बोले, स्वामी जी, आपने खाना नहीं खाया। स्वामी जी के इनकार करने पर उन्होंने कहा, तो चलिए आप मेरे घर चलें। स्वामी जी ने बच्चों की तरह पूछा, तुम क्यों मुझे खाना खाने को दोगे? उनके इस सवाल पर शरतचंद्र खुश होकर बोले कि प्रिय अगर तू मेरे घर आया है, तो मैं तुझको अपने हृदय की रसोई बनाकर खिलाऊंगा। गाड़ी के चले जाने के बाद शरतचंद्र स्वामी जी को अपने घर ले गया और पूरे सम्मान के साथ बैठ जाने को कहा, फिर जो भी घर में था उन्हें खिलाया-पिलाया, फिर उसने उनसे आराम करने के लिए कहा। कुछ देर बाद उसने स्वामी जी को एक बंगाली गीत गाते हुए सुना, ‘चंद्र बदन पर भस्म रमाकर प्रिय तुम मेरे पास पधारे’। शरतचंद्र उनका यह गीत सुनकर इतना आकर्षित हुआ कि अपने कपड़े उतारकर मुंह पर भभूत मलकर स्वामी जी के सामने आ खड़ा हुआ, फिर अनायास ही उनके मुख पर मुस्कान तैरती चली गई। स्वामी जी ने जब शरतचंद्र से जाने की आज्ञा मांगी तो स्वामी जी से कुछ दिन ठहर जाने की जिद की।