Thursday, April 18, 2019 07:03 PM

संस्कार हैं मनुष्यता की विरासत

वीरबल सिंह डोगरा

चढियार

मनुष्य का इतिहास सृष्टि की रचना के बाद मनुष्यता की विरासत में मिला है। सभ्य समाज का प्रबुद्ध मनुष्य हिंदू सामाजिक संस्कारों की बहुमूल्य पूंजी का खजाना है, उसकी विरासत को बनाए रखना मनुष्य के सद्गुणों का परम धर्म-कर्म बनता है। सामाजिक संस्कार मनुष्य को उसके मां-बाप  शब्द की विरासत का सर्वप्रथम संस्कार हैं। उसके बाद के संस्कार उसके घर-द्वार परिवार से शुरू होते हैं। उसके बाद के संस्कार दादा-दादी, भाई-बहन की गोद का भरा हुआ प्यार-प्रेम-ममता का रिश्ता बन जाता है। फिर गुरुजनों की पाठशाला, विद्यालयों में शिक्षा-दीक्षा से संस्कार मिलते हैं। सामाजिक संस्कार हर जाति, धर्म, वर्ग के लोगों का आपसी मैत्री भाव की मित्रता भाईचारे का बंधन दर्शाता है। हमें अपने सामाजिक संस्कारों के प्रति जागरूक रहकर कृतसंकल्प रहना होगा। 21वीं शताब्दी का मनुष्य भौतिकवाद के कलियुग से गुजरता हुआ कला के वशीभूत हो चुका है। मनुष्य सामाजिक संस्कारों को भुला करके, माया के चक्रव्यूह के जाल में फंस चुका है। मनुष्य का सदियों पुराना रिश्ता दुश्मनी में बदल चुका है। मनुष्य का आपसी प्यार-प्रेम का रिश्ता संस्कारविहीन हो चुका है। मनुष्य संपत्ति के पीछे-पीछे घूमता हुआ, खूनी दुश्मन बन चुका है। कलियुग का मनुष्य फैशन की मस्ती में बच्चे से लेकर वृद्धजनों को उनके पुत्र-बहुओं से मान-सम्मान नहीं मिलता है। दो वक्त की रोटी के लिए भी गुलाम बन चुके हैं। सामाजिक संस्कारों में आई गिरावट का जिम्मेदार कलियुग का आम मनुष्य है। अतः हमें सामाजिक संस्कारों के प्रति जागरूक रह कर वृद्धजनों, वरिष्ठ नागरिकों को पूर्ण मान-सम्मान का दर्जा हर क्षेत्र में देना होगा। बच्चों को माता-पिता के संस्कारों का हाथ जोड़ करके सत्कार करना होगा। गुरुजनों की शिक्षा-दीक्षा का अनुपालन करना होगा। यही हमारे संस्कारों की विरासत की बहुमूल्य पूंजी होगी।