Monday, June 01, 2020 02:34 AM

सकारात्मकता के साथ समय बिताने का वक्त

विक्रम गथानिया

मो.-7018466915

जब चीन और यूरोप से कोरोना महामारी के फैलने की खबरें आ रही थीं तब हमारे यहां इस बीमारी के न फैलने के तर्क दिए जा रहे थे। पहला तो यह था कि जिस देश में चिकन पॉक्स और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी से निपटने का अनुभव हो, वहां कोरोना से भी निपटना आसान होगा। दूसरा यह था कि इस देश का सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचा इस बीमारी को फैलने में मदद नहीं करता। तीसरा तर्क यह था कि निकट भविष्य में इस देश में गर्मियों का मौसम शुरू होने वाला है। गर्मी के मौसम में यह वायरस खुद-ब-खुद मर जाएगा, इसलिए फैलेगा नहीं। इस तरह हम इस महामारी से बचे रहने को लेकर आश्वस्त थे। अब यहां यह बताना वाजिब हो जाता है कि तब यह तीसरा तर्क एक भ्रांति ही रहा था। गर्मियों का मौसम शुरू हो चुका है और आज भी संक्रमितों की संख्या बढ़ ही रही है। मध्य मार्च में जब इस देश में इस बीमारी की गंभीरता को समझते हुए कुछ शिक्षण संस्थान बंद किए गए तो आंशिक रूप से दहशत का निर्माण होना प्रारंभ हो गया था। फिर एक दिन प्रधानमंत्री द्वारा ‘जनता कर्फ्यू’ का आह्वान हो गया। फिर मन में आशंका उत्पन्न हुई कि अगर प्रधानमंत्री को आगे आना पड़ा है तो जरूर ही स्थिति विकट है। साथ ही ‘जनता कर्फ्यू’ के पिछले दिन सोशल मीडिया पर आसपास के इलाके में विदेश से आए हुए लोगों की सूची भी आ गई थी। इस तरह बीमारी के अपने आसपास पहुंचने की आशंका ने मन को  हल्के अवसाद से भर दिया था। फिर इक्कीस दिन के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा हो गई। इस इक्कीस दिन की संख्या ने आश्वस्त किया था। लगा कि इक्कीस दिनों में सब निपटकर ठीक-ठाक हो जाएगा।

क्वारंटाइन के चौदह दिनों की अवधि की तुलना में यह इक्कीस दिनों की कालावधि और भी ज्यादा उपयुक्त प्रतीत हुई। इसलिए एक अच्छे परिणाम की उम्मीद से लॉकडाउन को बिताना प्रारंभ किया। पहले कुछ दिन तो अखबार और  टीवी पर भारत में कोरोना के संतोषप्रद समाचारों को प्राप्त करने में बीते। इस बीच पैनड्राइव की मदद से दो ऐतिहासिक फिल्में देखीं ः ‘केसरी’ और ‘तान्हाजी’। ‘केसरी’ 12 सितंबर 1897 को सारागढ़ी के किले पर दस हजार पश्तूनों के हमले के विरुद्ध भारतीय ब्रिटिश सेना की  36 सिक्ख रेजीमेंट के 21 जवानों के बहादुरी से लड़ने की और उनकी शहादत की कहानी पर आधारित है। इसी तरह ‘तान्हाजी’ भी एक मराठा वीर तान्हाजी के कौंडना के किले को मुगलों से प्राणों का उत्सर्ग करके मुक्त कराने की कथा पर आधारित है। फिर एक दिन मेज पर, अलमारी में और घर में इधर-उधर बिखरी किताबों, पत्रिकाओं और प्रकाशित-अप्रकाशित सामग्री को व्यवस्थित करने की सूझी। वह काम अलग-अलग स्पॉट्स तय करके एक स्पॉट एक दिन में करके किया। कोरोना को लेकर कविता तो नहीं लिखी, पर दो एक छोटी कविताओं का सृजन जरूर किया। एक उपन्यास की रूपरेखा बहुत दिनों से दिमाग में थी, उस पर लिखना प्रारंभ करके अपेक्षित पृष्ठों का तीसरे हिस्से से कुछ अधिक ही लिख दिया है। फेसबुक पर बीच-बीच में अपनी पुरानी पोस्टों को शेयर करता रहता हूं। वहां फेसबुक पर श्रद्धेय श्री रामदरश मिश्र की वाल पर ‘सुरभित स्मृतियां’ शृखला के अंतर्गत पुराने और महान लेखकों के बारे में उनके संस्मरणों को पढ़ रहा हूं। पूर्व मुख्यमंत्री श्रद्धेय श्री शांता कुमार की फेसबुक वाल पर उनकी आलेख शृंखला को भी पढ़कर बराबर आनंदित हो रहा हूं।