Monday, July 22, 2019 12:27 AM

सकारात्मक सोच

ओशो

सकारात्मक सोच रखने वाले अच्छे माता-पिता, अच्छे पति-पत्नी और अच्छे अधिकारी साबित होते हैं, जबकि नकारात्मक लोगों की पूरी ऊर्जा लोगों को गलत साबित करने में ही व्यय होती है। हम चाहें, तो अपने व्यक्तित्व को सकारात्मकता की ओर मोड़ सकते हैं। हमारा मन एक कम्प्यूटर की तरह काम करता है और हमारा सोचने का ढंग इसके लिए इनपुट्स का काम करता है। हमारे विचार इसमें इकट्ठे होते रहते हैं और धीरे-धीरे वे गहराई से जम जाते हैं। व्यक्तित्व को हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं। एक वह, जिसे मनोवैज्ञानिक टी-व्यक्तित्व कहते हैं। यह विषैला व्यक्तित्व है। दूसरा वह है, जिसे मनोवैज्ञानिक एन-व्यक्तित्व कहते हैं, यह पुष्टिकर होता है। विषैला टी-व्यक्तित्व हमेशा चीजों के प्रति नकारात्मक नजरिया रखता है।

विषैले व्यक्तित्व का दुनिया को देखने का नजरिया निराशावादी और उदासीन होता है। पराकाष्ठावादी होना विषैले व्यक्तित्व का एक उदाहरण है। तुम यह नहीं कह सकते कि पराकाष्ठावाद में कुछ गलत है, लेकिन उसका एकमात्र लक्ष्य ही गलतियां निकालना है। आप ऐसे व्यक्ति में गलतियां नहीं ढूंढ सकते, जो पूर्णता की तलाश में है। परंतु वास्तव में पूर्णता उसका उद्देश्य नहीं है, यह एक साधन मात्र है। वह सिर्फ  त्रुटियों, गलतियों और अभावों को देखना चाहता है। यह सबसे अच्छा तरीका है, पराकाष्ठावाद को एक लक्ष्य की तरह रखना, ताकि वह हर चीज की अपने आदर्श से तुलना करके उनकी निंदा कर सके।

विषैला व्यक्तित्व हमेशा उन चीजों को देखता है, जो नहीं हैं। मौजूद चीजें कभी उसकी नजर में नहीं आतीं इसलिए उसमें असंतोष स्वाभाविक और स्थायी बन जाता है। विषैला व्यक्तित्व अपने आपको ही विषाक्त नहीं बनाता, बल्कि दूसरों को भी विषाक्त कर देता है। यह एक विरासत की तरह भी हो सकता है।

अगर तुम अपने बचपन में नकारात्मक लोगों के साथ जिए हो, तो यह नकारात्मकता चमकदार शब्द, सुंदर भाषा,धर्म, भगवान, आत्मा आदि के पीछे भी छिपी हो सकती है। विषैले लोग सुंदर शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन वह सिर्फ  प्रयास मात्र है। वे सिर्फ  इस दुनिया की निंदा करने के लिए दूसरी दुनिया के विषय में बात करते हैं।

वे दुनिया के बारे में चिंतित नहीं हैं। उनका संत-महात्माओं से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन सिर्फ  दूसरों को पापी सिद्ध करने के लिए वे संतों की बातें करते हैं। यह बहुत रुग्ण रवैया है। वे कहेंगे जीजस की तरह बनो, जबकि वे जीजस में बिलकुल दिलचस्पी नहीं रखते। सिर्फ  तुम्हारी निंदा करने के लिए यह उनका एक उपाय मात्र है। तुम उनके शिकार बनते हो क्योंकि तुम जीजस नहीं बन सकते।

वे हमेशा तुम्हारी निंदा करते रहेंगे। वे मान-मर्यादा, आचार, नीति, नैतिकतावादी नजरिया बनाते हैं। वे समाज के ठेकेदार बनने का प्रयास करते हैं, उन्हीं का दुनिया को विषाक्त बनाने में सबसे बड़ा हाथ है। ये लोग हर जगह हैं। वे ऐसा बनना चाहते हैं, ताकि वे निंदा कर सकें ।

यहां तक कि वे सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं, अगर उन्हें दूसरों की निंदा करने का सुख मिले। ये लोग बड़ी जल्दी हावी हो जाते हैं। उनकी विचारधारा ही उनका सबसे बड़ा हथियार है, क्योंकि वे निंदक बन सकते हैं।