सच का दिवाला, झूठे का बोलबाला

सुरेश सेठ

साहित्यकार

यह सही है कि कभी चाणक्य ने कहा था कि अप्रिय सत्य बोलने से मौन रहना बेहतर है, लेकिन आज यार लोग तो इससे कहीं आगे निकल गए। ईमानदार सत्य का दिवाला निकल गया और लुभावना झूठ बोलने वाला जिंदगी के मैदान में मंजिल दर मंजिल विजय प्राप्त करता चला गया। सबसे पहले तो उसने अपनी विजय का एहसास अपने आइने में झांक कर किया तो पाया उस पुरानी जंगल कथा के दिन बीत गए, जब खरगोश मियां जंगल अधिपति शेर को एक कुएं के सेप्टिक जल में झांकने के लिए बोले थे। अपनी ही छवि को अपना प्रतियोगी सिंह मानकर राजा शेर अपना प्रतिद्वंद्वी मारने दहाड़-दहाड़ कर बावला हो जंगल छोड़ गया, लेकिन जनाब मासूम खरगोशों और भ्रमित शेरों के दिन लद गए। आज तो लकड़बग्घों और रंगे सियारों के दिन आ गए, जो अपनी सैल्फियां खींच-खींच अपने प्रचार के शीशमहल सजाते हैं। एक-एक सैल्फी बार-बार इन शीशमहलों में दिखा आपको चमत्कृत करने की चेष्टा करते हैं। ये चमत्कारी लोग अपने पास सबसे प्रभावशाली, सबसे सफल युग पुरुष होने का विरासती अधिकार मानते हैं। एक बार माना, पद और सत्ता प्राप्त करने के बाद यह उसे तब तक छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते, जब तक कि वे अपनी कुर्सियों पर अपनी वंश बेल को प्रतिष्ठित न कर दें। अपनी सफलता सिद्ध करने के इनके पैमाने निराले हैं। आप उन्हें लाख बताइए कि हुजूर आपकी अंधेर नगरी चौपट राजा में नैतिक मूल्यों ने दम तोड़ दिया। आज हर गिरहकट दूसरे की जेब साफ  कर रहा है। भ्रष्टाचार नई ऊंचाइयां छूने लगा, महंगाई ने आम आदमी की सांस अवरुद्ध कर दी, लेकिन उनका जवाब एक ही रहता है कि उनकी पूर्ववर्ती सरकार के गंदलेपन की यह विरासत है, जिसे आज वह ढोने के लिए अभिशप्त हैं। हां, जनता को दिलासा देने के लिए वह इतना अवश्य कह देते हैं कि उनकी पूर्ववर्ती सरकार के जमाने में तो स्थिति इससे कहीं बुरी थी। उन्होंने तो इस गंदलेपन को कम करने का उपक्रम किया है। अब मशीनरी की मरम्मत और अच्छे दिन आने में कुछ समय तो लगता है, तब तक आप यथा स्थितिवाद को ङोलिए। हम यथा स्थितिवाद ङोलते हैं, और साथ ही इस झूठ को भी कि जिसकी पौ बारह ने कल के टुकड़खोर नेताओं को छप्पन भोग दे दिए, और कल के राजकुंवर बीते समय के गालीचे में दब अपराधी होने की घोषणा का अप्रिय सच ङोलने लगे। कहां है रोटी, कपड़ा और मकान? कहां है आपका हमारे सिर की छत लौटा देने का वायदा। कहां हैं नौकरियों की बरसात और हर हाथ को काम दे देने का समावेशी विकास है जनाब तनिक खंगाल कर देखिए। नई योजनाओं की उद्घोषणाएं आपके इर्द-गिर्द प्रतिदिन अपना कोलाहल भरा नृत्यु करती हैं। करीब जाओ तो लगता है, अरे यह सब वही है दशकों से आपका जाना-पहचाना। नया युग आया। इसमें इनके पुराने चेहरों ने जुमलों के नए नकाब ओढ़ लिए। नई वर्दियां पहन लीं। कवायद की ढंग बदल लिए, लेकिन उनके पीछे तरीके वही पुराने रहे, किराए की भीड़ से जुटाई गई रैलियां, जयघोष के वही झांझ कर ताल। हांए अब उनकी धुन अवश्य बदल गई। पहले यह धुन आयातित थी, अब यह ‘मेरा भारत महान’  के गौरवपूर्ण अतीत, सांस्कृतिक मिथकों की धुन से सृजित हो रही है। विदेशी बाजे पर स्वदेशी धुन निकालने का प्रयास हो रहा है। कौए हंस की चाल चलने का प्रयास कर रहे हैं, अपनी चाल भूल रहे हैं।