Wednesday, August 21, 2019 04:53 AM

सड़क के मुजरिम

सड़क सुरक्षा के बीच गुजरते सप्ताह की शानदार प्रस्तुति के बावजूद आम नागरिक अपने भीतर के मुजरिम को नहीं पहचानेगा, तो इस दौर के संदेश कहीं गुम हो जाएंगे। हर तरह की परिवहन सुरक्षा के लिए सड़क का सम्मान अहम है, लेकिन पिछले करीब दो-तीन दशकों से इसके विपरीत कानूनों को नजरअंदाज करने का प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। यह केवल वाहनों की वजह से नहीं, बल्कि अतिक्रमण, गलत इंजीनियरिंग, पर्वतीय मानदंडों की अवहेलना, गुणवत्ता में रिसाव, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी तथा परिवहन प्रबंधन की खामियों से कहीं अधिक घातक बनता जा रहा है। बेशक गलत ड्राइविंग या पर्वतीय सीमाओं से अधिक गति से दौड़ने के कारण अधिकतम जानी नुकसान हो रहा है और इसमें भी दोपहिया वाहनों पर युवा जिंदगी के खतरे मंडरा रहे हैं, लेकिन ट्रैफिक प्रबंधन जस का तस है। सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान श्रावण अष्टमी के मेले सरेआम ट्रैफिक नियमों की अवहेलना प्रदर्शित कर रहे हैं, तो चौकसी का उदाहरण कब पेश होगा। ट्रक टूरिज्म से जुड़े मूल प्रश्नों का हल भरी बरसात में मुंह बाये खड़ा रहता है, लेकिन धार्मिक आस्था के सामने पुलिस बंदोबस्त नरम पड़ जाता है। बिना हेल्मेट के बाइक पर चार-चार युवा सवार दिखाई दें, तो सड़क सुरक्षा के ये आयाम हमारी लाचारी का सबब बन कर खड़े हैं। कुछ इसी तरह की प्रवृत्ति में दौड़ती निजी बसें अपने रूट की कामयाबी में सड़कों पर राक्षसी व्यवहार करती हैं, तो यातायात नियमन कहीं पीछे चला जाता है। सड़क सुरक्षा की दृष्टि से हिमाचल में ट्रैफिक नियम दिखाई नहीं देते और न ही सार्वजनिक परिवहन की कोई आचार संहिता अमल में लाई जा रही है। पूरे प्रदेश की प्रमुख सड़कों के किनारे बस स्टॉप निर्धारित होने के साथ-साथ इनके लिए विशेष ठहराव अधोसंरचना के मानदंड तय करने होंगे, ताकि बसें जब रुकें तो आम यातायात अवरुद्ध न हो। इसी तरह चौक-चौराहों को यातायात के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता है और यह भी कि ट्रैफिक सिग्नल बढ़ाए जाएं। शहरी यातायात को व्यवस्थित करने के लिए नए विकल्प आवश्यक हैं। दूसरी ओर पर्यटक वाहनों की बढ़ती आमद के हिसाब से ट्रैफिक प्लानिंग, प्रणाली तथा नियमन की दिशा में चुनौतियों का त्वरित समाधान चाहिए। आश्चर्य तो यह कि हिमाचल में बस स्टैंड निर्माण को सड़क सुरक्षा के हिसाब से नहीं देखा जा रहा है और आज भी कई जगह वोल्वो जैसी बसें वहां घुस नहीं पातीं, नतीजतन बसों की पार्किंग सड़कों पर होती है। कुछ इसी तरह टैक्सी संचालन भी राज्य में सड़क सुरक्षा और यात्री सुविधा के विपरीत हो रहा है। हिमाचल में टैक्सी सेवा का विस्तार बिना किसी जवाबदेही और आधार के हो रहा है, लिहाजा सड़कों पर चुनौतियां बढ़ रही हैं। सड़क निर्माण में हम ढेरों विसंगतियां देख सकते हैं। प्रदेश की सड़कों पर बढ़ता यातायात दबाव भविष्य की चिंताओं में समाधान चाहता है। राज्य को परिवहन की जरूरतें समझते हुए यह तय करना होगा कि भविष्य की आर्थिक गतिविधियों से इसका तारतम्य कैसे बैठाया जाए। खासतौर पर पर्यटन के रास्ते हिमाचल में आ रहे वाहनों की रफ्तार को अनुशासित करने तथा वाहन चालकों की तहजीब बदलने की जरूरत है, जबकि कुछ अन्य परिवहन विकल्पों के जरिए यातायात दबाव को कम करना होगा। इसी तरह औद्योगिक क्षेत्रों, सीमेंट तथा फलोत्पादों की ढुलाई के लिए अलग से माल ढुलाई गलियारे विकसित करने की जरूरत है। बिलासपुर-शिमला रोड पर सीमेंट ढुलाई या परवाणू-शिमला सड़क पर सेब ढुलाई के वर्तमान परिदृश्य में सड़क सुरक्षा के अर्थ बेमानी हो जाते हैं। बिना पार्किंग सुविधा के निजी वाहनों की बढ़ती तादाद या बिना हेल्मेट के भागती युवा पीढ़ी के सामने हमारी व्यवस्था फिलहाल मौत के कुएं ही देख रही हैं। प्रदेश की जनता को सड़क की परिधि में अपनी नैतिकता तथा ड्राइविंग के शिष्टाचार को प्रदर्शित करना होगा, वरना दुर्घटनाओं के अलावा आपसी मारपीट के किस्से और घातक हो जाएंगे और वाहन स्वामित्व से जुड़ा अहंकार हर गली तक खतरे पैदा करेगा।