Monday, August 10, 2020 11:39 AM

सत्र की चीखती दीवारें

यह तो स्पष्ट है कि विधानसभा का शीतकालीन सत्र एकदम ठंडा नहीं हो सकता, इसलिए पहले ही दिन नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री का प्रवेश द्वार पर धरना और सदन से वाकआउट का मंजर तूफानी है। हिमाचल विधानसभा परिसर में धरने की नौबत उन विशेषाधिकारों की ओर संकेत करती है, जो आम नागरिक की जिंदगी में कभी नहीं आते या यूं कहें कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो कुछ घट रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में असामान्य प्रतीत होती घटनाएं ही अब हकीकत हैं। यानी विधानसभा सत्र के दौरान मुद्दों से कहीं अधिक चीखती दीवारें, पक्ष और विपक्ष का सामना करती हैं। राज्य की सहमति में असहमत होते मंजर की गवाही अगर सदन की वास्तविकता है, तो शीतकालीन सत्र का आगाज लगातार दो दिनों से विपक्ष के कब्जे में रहा। तमाम सुर्खियां केवल दो बिंदुओं पर विमर्श कर रही हैं, कि आखिर नेता प्रतिपक्ष को क्यों विधानसभा परिसर के मुख्य द्वार पर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करनी पड़ी और सदन के भीतर कल तक सरकार को आत्मश्लाघा का वरदान देने वाली इन्वेस्टर मीट क्यों विपक्ष के बवाल में कंगाल हो गई। बेशक इस बहाने एक सार्थक बहस की उम्मीद की जा सकती है और विपक्ष को यह पूछ कर अपना धर्म निभाना ही चाहिए, लेकिन यहां तो माहौल की गर्मी सदन के बाहर पहुंच गई। विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए निवेश की अपनी सियासत को इन्वेस्टर मीट की मीन मेख से बहुत कुछ हासिल हो सकता है, लेकिन इसका एक अर्थ यह है कि इस दिशा में सरकार का नजरिया भी स्पष्ट हो। विपक्ष के सवाल पहले दो दिन को हलाल कर गए या सत्ता की चतुराई ने इन कदमों को सदन से बाहर कर दिया। आम आदमी विधानसभा सत्र में गूंजती आवाजों के बीच अपने पहरेदारों को देखता है, लिहाजा विपक्ष के तीखे स्वर सुनने की सहमति या असहमति का रिश्ता सड़क तक है। विपक्ष इसीलिए सदन में कही अपनी आधी बात को सड़क पर आकर पूरा करता है। इन्वेस्टर मीट भी इसलिए विपक्ष की आंखों पर चढ़ा सबसे बड़ा मुद्दा है। सत्ता और विपक्ष के बीच निवेश संगोष्ठी के महाआयोजन पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन कई स्पष्टीकरण सरकार की ओर से आने बाकी हैं। विपक्ष को उस टैंट पर एतराज है, जिस पर खासी धनराशि लगी थी और यह भी कि जो दावे किए, उसका यथार्थ  क्या है। हो सकता है विपक्ष के तीर ज्यादा नुकीले हों या सदन की बहस का मसौदा सत्ता को परेशान कर दे, लेकिन यह तय है कि जयराम सरकार इस विषय की सफलता को अपने दो साल के आयोजन में बेहतरीन ढंग से प्रदर्शित करने की तैयारी कर रहा है। यहां लोकतंत्र के दो पहलुओं पर खड़ी राजनीतिक विरासत से सीधे सवाल नहीं हो सकते। आम आदमी के लिए सत्ता तक की पहुंच भी एक तरह का जश्न है, जो गाहे बगाहे किसी मंच से प्रतिबिंबित होता है। लोकतंत्र की एक छवि तपोवन विधानसभा परिसर के भीतर जनता को वही दिखाएगी या सुनाएगी, जो सड़क पर कही गई बात को पारंगत करे। यानी हम ऐसी चर्चाएं नहीं सुनेंगे जो जिम्मेदार विपक्ष या जवाबदेह सत्तापक्ष को पेश करें। जिस इन्वेस्टर मीट पर हंगामा है, उसके ठीक सामने सरकारी उपक्रमों मे जाया हिमाचली संसाधनों के ठीकरे भी तो हैं। क्या हिमाचल की सत्ता या विपक्ष कभी सोचेगा कि विनिवेश करते हुए निजी निवेश का सुखद पहलू विकसित किया जा सकता है या प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को किस तरह स्वरोजगार से जोड़ा जाए। विधानसभा सत्र की बहस का चरित्र पहले ही दिन अपनी खामोशियों के साथ चीखता रहेगा, तो लोकतंत्र सुदृढ़ होगा या चंद रोज बाद जब सत्ता के दो साल होने का समारोह गूंजेगा, तो खबर होगी। इन्वेस्टर मीट को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता या इस पर उठीं विपक्ष की आपत्तियां अंतिम राह पकडेंगी, लेकिन जिस वजह से शीतकालीन सत्र में यह प्रदेश अपना निवेश करता है, उसके विपरीत चरागाहों पर मुद्दों की आवारगी का आलम नापाक हो जाता है। हमें नहीं मालूम कि विपक्ष का वाकआउट, लोकतांत्रिक आस्था बचा रहा है या सत्ता के आगे बौनी होती बहस अपने शिलालेख लिखेगी, लेकिन जो हमें सदन तक पहुंचाने निकले वे आज क्यों कहने को बाहर निकल रहे हैं, अपने आप में बड़ा प्रश्न है।