Tuesday, March 31, 2020 07:21 PM

समन्वय के केजरीवाल

तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बनते ही केजरीवाल के स्वर बदलने लगे हैं। वह पहले की तरह जिद्दी, दुराग्रही, अक्खड़, अकेले-थकेले नहीं दिखना चाहते, बल्कि उन्होंने हजारों की भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि अब वह सिर्फ  ‘आप’ के नहीं, भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के भी मुख्यमंत्री हैं। दिल्ली के 2 करोड़ लोग उनका परिवार हैं। यह एक राजनीतिक और संवैधानिक औपचारिकता भी हो सकती है! कई नेता संवैधानिक पद पर पहुंचने के बाद यही भाषा बोलने लगते हैं, लेकिन केजरीवाल यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि अब वह केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का आशीर्वाद भी मांगा। लक्ष्य एक ही बताया कि वह दिल्ली को विश्व का नंबर वन शहर बनाना चाहते हैं। अब उन्हें लगता है कि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के सहयोग के बिना दिल्ली का चौतरफा विकास संभव नहीं है। क्या दिल्ली के लिए ही केजरीवाल इतने बदले हैं? पिछले कार्यकाल में केजरीवाल ने लगातार 3 साल तक प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को निशाना बनाते हुए कोसा था। आभार उनके कुछ करीबी सलाहकारों का किया जाना चाहिए कि केजरीवाल ने कोसना बंद किया, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एक भी आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। एकदम चुप्पी साधे रहे। चुनाव से कोई डेढ़ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया और उसने दिल्ली में उपराज्यपाल तथा राज्य सरकार की संवैधानिक शक्तियों को बांट कर तय किया कि कौन, कैसे और किस हद में काम करेगा। नतीजतन केजरीवाल सरकार वह सब कुछ कर पाई, जिसका निष्कर्ष सामने है कि केजरीवाल लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री चुने गए हैं। फिर भी कुछ सवाल मौजू लगते हैं। क्या ‘जिद्दी नायक’ इसीलिए बदला-बदला सा लग रहा है? क्या उनका मिशन अब राष्ट्रव्यापी होने जा रहा है? क्या प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के साथ उनका समन्वय ठीक बन पाएगा? क्या प्रधानमंत्री मोदी का निजी स्तर पर समर्थन और आशीर्वाद वह हासिल कर सकेंगे? आखिर केजरीवाल विरोधियों को माफी देने सरीखी भाषा क्यों बदलने लगे हैं? क्या ‘आप’ होंगे कामयाब एक दिन...? कुछ और सवाल भी हो सकते हैं, लेकिन केजरीवाल इतने सरल, सीधे, सपाट नेता नहीं हैं। वह लचीलापन दिखाना चाहते हैं, क्योंकि अब वह लंबी पारी खेलने को तैयार होंगे। दरअसल मोदी और केजरीवाल बुनियादी तौर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लगभग एक ही प्रक्रिया के जरिए दोनों नेता राजनीति के फलक पर चमके और उभर कर एक ताकत बने हैं। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो वह 6 करोड़ गुजरातियों का आह्वान करते थे। उसी तरह केजरीवाल फिलहाल दिल्ली की 2 करोड़ जनता की ही बात कर रहे हैं। वह फिलहाल दिल्ली पर ही केंद्रित रहना चाहते हैं। मोदी भी राष्ट्रवाद पर आए और अब केजरीवाल भी पानी, बिजली, शिक्षा, अस्पताल के जरिए नया राष्ट्रवाद परिभाषित करना चाह रहे हैं। उनकी हदें यहीं तक सीमित नहीं रहेंगी। वह अपने मॉडल का परीक्षण पंजाब और हरियाणा से शुरू करना चाहेंगे। केजरीवाल धीरे-धीरे देश भर में अपनी सियासी जमीन ठोस और व्यापक करना चाहेंगे। आजादी के बाद दलों और सरकारों ने अपने निश्चित वोट बैंक पर फोकस किया। उसके मद्देनजर किसान, दलित, पिछड़े और कुछ अन्य वर्ग देश भर में ‘आप’ का ठोस, निश्चित चुनावी क्षेत्र नहीं बन सकते, लिहाजा केजरीवाल की निगाह उस जमात पर है, जो निम्न मध्यवर्गीय हो, मेट्रो किस्म की हो और जरूरतमंद भी हो। उस जमात के लिए केजरीवाल समन्वयवादी भी होना चाहते हैं। हालांकि भाजपा की जुबान और कड़वाहट केजरीवाल के प्रति अभी कम नहीं हो रही है। भाजपा का आरोप है कि केजरीवाल राष्ट्रवाद का मुखौटा ओढ़ कर समन्वय और सहयोग की बात कह रहे हैं। ऐसी राजनीति केजरीवाल की समन्वयवादी कोशिशों के आड़े आ सकती है। बहरहाल नए मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री से मुलाकात और उसके बाद भाजपा की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसी से स्पष्ट होने लगेगा कि दोनों ध्रुवों की किसी सिरे पर जाकर मुलाकात होती है अथवा नहीं।