Sunday, November 17, 2019 03:43 PM

समय और अवसाद

श्रीश्री रवि शंकर

प्रकृति के नियंता 24 सिद्धांतों में से समय ‘काल’ भी एक है। प्रत्येक क्षण, एक-एक क्षण बहुत महत्त्वपूर्ण है। समय और कहीं नहीं है, यह यहीं अभी है। ईश्वर के शांत क्षण को महाकाल कहा जाता है। शिव को महाकाल के रूप में जाना जाता है। महाकाल का तात्पर्य है बड़ा या महान समय। हम प्रायः यह कहते हैं, मेरा समय बहुत अच्छा था, क्या यह ऐसा नहीं है? महान समय का तात्पर्य समय शून्य क्षणों के अंतराल में आया हुआ क्षण होता है। जब तुम्हारे मन में शांति होती है तब तुम समय के प्रवाह को अनुभव नहीं करते हो।

जब तुम्हारे मन में शांति नहीं होती तब तुम्हारे द्वारा व्यतीत किया हुआ दो मिनट का समय भी तुम्हें यह अनुभव देता है कि जैसे दो घंटे बीत गए। भगवान शिव को ‘काल संहार मूर्ति’ भी कहा जाता है। इसका मतलब है कि वह भगवान जो समय का नाश करते हैं। समय को मारना कैसे संभव है? यह अत्यंत चरम सुख से ही संभव है। जब तुम अत्यंत आनंद में होते हो, तो तुम्हें समय के बीतने का अनुभव नहीं होता है।

जब तुम समय के प्रवाह को नहीं अनुभव करते हो तो यह कहा जाता है कि समय को मार दिया गया है। समय और अवसाद या दुःख में एक गहरा संबंध है। जब हम दुःखी होते हैं तो हमें यह लगता है कि समय बहुत लंबा है। जब तुम प्रसन्न होते हो, तब तुम्हें समय का अनुभव नहीं होता है। तो प्रसन्नता या आनंद क्या है? यह हमारी स्वयं की आत्मा है। यही आत्म तत्त्व शिव तत्त्व है या शिव का सिद्धांत है। प्रायः हम जब भगवान की बात करते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति तुरंत ऊपर की ओर देखता है। ऊपर वहां पर क्या है? ऊपर से केवल बरसात होती है और ऊपर कुछ नहीं है। प्रत्येक वस्तु हमारे अंदर है, न ऊपर है न नीचे है। अंदर की तरफ  देखना या अपने अंदर रहना ही ध्यान है। जब तुम अपने किसी नजदीकी व्यक्ति, अपने मित्र या किसी अन्य की तरफ देखते हो तो तुम्हें क्या लगता है? तुम्हारे अंदर कुछ-कुछ होता है। तुम्हें ऐसा अनुभव होता है कि कोई नई ऊर्जा तुम्हारे अंदर से होकर प्रवाहित हो रही है। उन महान क्षणों को पकड़ो। यह वही महान क्षण हैं जो समय शून्य क्षण होते हैं। ठीक है, तुमने उस व्यक्ति की उपस्थिति के कारण उन समय शून्य क्षणों का अनुभव किया होगा।

उस व्यक्ति ने तुम्हारे अंदर उन भावनाओं को उत्पन्न किया होगा, तो क्या हुआ? उस व्यक्ति विशेष में रुचि रखने के बजाय या उस स्थिति में रुचि रखने के बजाय बस तुम केवल अपने अंदर हो रहे ऊर्जा के स्रोत के प्रवाह के साथ रहो। ईश्वर ने तुमको दुनिया में सभी छोटे-मोटे सुखों व आनंद को दिया है, लेकिन चरम आनंद को अपने पास रखा है। उस चरम आनंद को प्राप्त करने के लिए तुम्हें उस ईश्वर और केवल ईश्वर के पास ही जाना होगा। अपने प्रयासों में निष्ठा रखो।

ईश्वर से तुम अपने को अधिक होशियार और चालाक बनने की कोशिश मत करो। जब तुम इस चरम आनंद को प्राप्त करते हो तो बाकी सभी  वस्तुएं आनंदमय हो जाती हैं। इस चरम आनंद के बिना दुनिया की किसी भी चीज में आनंद टिकाऊ नहीं होगा। ईश्वर को तुम किस तरह का समय देते हो? अधिकतर तुम ईश्वर को बचा-खुचा समय देते हो, जब तुम्हें कुछ और करने को नहीं होता। ईश्वर को अच्छा समय दो, इससे तुम पुरस्कृत होगे।