Thursday, July 18, 2019 08:45 AM

समय के आईने में झकझोरते अहसास

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक : 1. समय के सामने

  1. समय के इर्द-गिर्द
  2. अपने समय में

लेखक : अशोक वाजपेयी

प्रकाशक : वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर

 मूल्य : दो सौ पच्चीस रुपए प्रत्येक

अधिक गहराई में उतरे बिना और परिभाषा तलाशे बगैर आम भाषा में कहें, तो वह साहित्य धन्य है, जिसका असर विचार बनकर किसी समाज और संस्कृति को ऐसी समृद्धि से सींच दे कि जनमानस इनकी उन्नति पर गर्व करे। समय साक्षी है कि इतिहास में कलम के कुछ ऐसे धनी हुए हैं, जिनके सृजन ने भविष्य को सफलतापूर्वक दिशा दिखाई है। इस पैमाने पर परखें, तो चंद नाम आपके स्मृति पटल पर अनायास की चमक उठेंगे। हालांकि भारत के परिप्रेक्ष्य में विचार करें तो इस श्रेणी की अधिकतर रचनाएं उपन्यास होंगी या फिर काव्य। खैर, प्रकृति का नियम है कि परंपराएं टूटती हैं और कभी-कभार इस परिवर्तन का परिणाम इतना सुखद होता है कि बयान करने को शब्द कम पड़ जाएं।

हिंदी साहित्य जगत में कुछ ऐसे ही परिवर्तन का झोंका लेकर आए हैं वरिष्ठ कवि-आलोचक और साहित्यकर्मी अशोक वाजपेयी। उनका ताजा रचनाकर्म तीन अलग जिल्दों में सिमटा है, जो उपन्यास या काव्य न होकर उनकी विचारोत्तेजक टिप्पणियों का संग्रह है। पिछले 21 वर्षों में विभिन्न समसामयिक घटनाओं को उनके जागृत मन-मस्तिष्क ने कैसे आत्मसात किया, मौजूदा प्रस्तुति उनका ही संग्रहणीय दस्तावेज है। ‘समय के सामने’, ‘समय के इर्द-गिर्द’ और ‘अपने समय में’ शीर्षक के तहत प्रकाशित तीनों पुस्तकें साहित्य प्रेमियों के लिए ही नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए बौद्धिक खुराक है, जिसकी चेतना जागृत है और जो यथास्थिति में बेखबर होकर जीने के बजाय समस्या को समझने में विश्वास रखता है। अशोक वाजपेयी की मौजूदा कृतियां कई मायनों में अनोखी हैं। किसी भी घटनाक्रम से संबंधित उनका अंदाज-ए-बयां चुटकी बजाते ही पाठक को भी उसी गुजरे दिन में ले जाता है, जहां वह तुलना कर सकता है कि उस घटना विशेष को प्रबुद्ध लेखक ने किस दृष्टि से देखा था। यही नहीं, किसी विचारधारा विशेष से लिहाज किए बिना सबको एक ही कसौटी पर कसना और अपनी बात बेबाकी से कह देना इतना आसान भी हो सकता है, यह अहसास पाठक को प्रभावित भी करता है और रोमांचित भी।

समय के सामने

भारतीय समाज, राजनीति और संस्कृति पर आधारित अशोक वाजपेयी की चुनिंदा टिप्पणियों के संग्रह की तीनों पुस्तकों का वर्गीकरण करें, तो ‘समय के सामने’ शीर्षक के अंतर्गत सन् 2005-2006 के विचारों का संकलन है। पहली ही टिप्पणी श्रेणी विशेष के लेखकों की चुटीली खबर लेती है। यौनिकता के आधार पर भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने अब राहत दे दी हो, पर कई साल पहले वाजपेयी ने विषय पर जिस तरह विचार प्रकट किए हैं वह उनकी क्रांतिकारी सोच का परिचायक है। वर्तमान में कश्मीर के मसले पर भारत और पाकिस्तान युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। इसका हल लेखक की नजर में क्या हो सकता है, यह जानना भी रोचक है। चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन से हुए सलूक पर भी उन्होंने खुलकर लिखा है, बगैर किसी लाग-लपेट के।

समय के इर्द-गिर्द

इस पुस्तक की टिप्पणियां विभिन्न वर्षों में लिखी गई हैं। यहां लेखन की स्वतंत्रता के विरुद्ध घट रही सहिष्णुता को आरंभ में ही अशोक वाजपेयी ने जिस तरह सामने रखा है, वह किसी भी पाठक को सहमत करने में सक्षम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधाभासी बयानों की लेखक आलोचना करते हैं, तो नेताओं की बिगड़ती भाषा पर भी वह आपत्ति जताने से परहेज नहीं करते। लेखन की खूबसूरती और स्वीकार्यता यह कि वाजपेयी राजनीति, धर्म, मीडिया, टेलीविजन, साहित्य और सिनेमा के बड़बोलेपन से होने वाले नुकसान का आकलन करते वक्त किसी को हरगिज नहीं बख्शते।

अपने समय में

इस शीर्षक के तहत संकलित टिप्पणियां भी अन्य दो की ही तरह पठनीय हैं। शुरुआत ही वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर सवाल उठाती है, तो उसके बाद इस पर गदगद मीडिया पर सारगर्भित चुटकी भी रोचक है। चुनावी गठबंधनों में घी-शक्कर होते अपराधियों, कारपोरेट जगत व धर्मनेताओं की जमात भी अशोक वाजपेयी की कलम से बच नहीं पाई है। लब्बोलुआब यह, आप अशोक वाजपेयी की टिप्पणियों से असहमत तो हो सकते हैं, पर उन्हें विचारधारा विशेष से नहीं जोड़ सकते। उन्होंने खामियों की खबर ली है, फिर जिम्मेदार चाहे कोई भी हो। तीनों ही पुस्तकों में भाषा की अशुद्धि ढूंढे नहीं मिलती और बढि़या कागज पर छपाई बेहतरीन है। हर पुस्तक का मूल्य दो सौ पच्चीस रुपए है, जो विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रख उचित ठहराया जा सकता है।

-अनिल अग्निहोत्री

किताब मिली

लोकभाव स्वरांजलि

पुस्तक ‘लोकभाव स्वरांजलि’ का दूसरा हिस्सा हाथ आया, पहला भी शायद इसी से मिलता-जुलता होगा। प्रोफेसर चंद्ररेखा ढडवाल और जनमेजय सिंह गुलेरिया के बेहतरीन प्रयासों से यह संभव हुआ है। मैं समझता हूं कि यह लोकभाव स्वरांजलि से भी बढ़कर सांसों और स्वरों की वंदना है। यह अपनी पैदाइश के समय मौजूद रहे पुरखों को याद करने जैसा है। बीत चुकी नानी-दादी के लहराते सांसों से गूंजते वो मधुर तराने हैं जो हम उनकी गोदी में सुनते रहे होंगे। ये परवरिश के तराने हैं। आंगन की औखली में धान कूटती मां के तराने हैं। सच कहूं तो ऐसा प्रयास धारा में बह जाने जैसा है। अनेकों संस्मरणों के भवसागर को पार करने जैसा है। ओबरी (पुरानी गृह निर्माण शैली का एक गुप्त कमरा) से आती वो गंध है जहां कोई प्रसूता जन्मोत्सव के रंग और किलकारियों के आलोक में मग्न है। लोकभाव स्वरांजलि में मानव के अवतरण से मरण तक के सभी रंग हैं, धवल भी और सुर्ख भी। साहित्यकारों का यह प्रयास और भी परवान चढ़े ऐसी कामना करते हैं। और हां, भावी पीढ़ी भी इस रंग में रंगे ऐसे प्रयास होंगे, उम्मीद है।               -ओंकार सिंह

लोकभाव स्वरांजलि : चंद्ररेखा ढडवाल, जनमेजय सिंह गुलेरिया, देस संगीत प्रकाशन, धर्मशाला, 250 रुपए