Thursday, July 18, 2019 08:08 AM

समसामयिक विषयों को नई दृष्टि से देखती कविताएं

मेरी किताब के अंश :

सीधे लेखक से

किस्त : 14

ऐसे समय में जबकि अखबारों में साहित्य के दर्शन सिमटते जा रहे हैं, ‘दिव्य हिमाचल’ ने साहित्यिक सरोकार के लिए एक नई सीरीज शुरू की है। लेखक क्यों रचना करता है, उसकी मूल भावना क्या रहती है, संवेदना की गागर में उसका सागर क्या है, साहित्य में उसका योगदान तथा अनुभव क्या हैं, इन्हीं विषयों पर राय व्यक्त करते लेखक से रू-ब-रू होने का मौका यह सीरीज उपलब्ध करवाएगी। सीरीज की १४वीं किस्त में पेश है साहित्यकार विक्रम गथानिया का लेखकीय संसार...

काव्य संग्रह ‘इस नए वक्त में’ के लेखक विक्रम गथानिया का कहना है कि कविता लेखन में हृदय की भूमिका अधिक रहती है, इसलिए कविता को हृदय की भाषा भी कहा जाता है। एक संवेदनशील प्राणी ही कविता की रचना कर सकता है। उसमें संवेदना के भाव जब कभी भी प्रस्फुटित होने को होते हैं तब वह वेदना कह लो या बौद्धिकता भी साथ में सक्रिय हो जाती है, तब एक कविता कागज पर जन्म ले चुकी होती है। यह एक विशेष स्थिति से गुजरने जैसा होता है।

साथ ही आनंददायक भी। अपना परिचय देते हुए वह कहते हैं कि मेरा जन्म एक किसान परिवार में 6 नवंबर 1968 को हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के एक गांव मतलाना में हुआ। मैं अपने माता-पिता की चार संतानों में सबसे बड़ा हूं। मुझे बचपन से ही कक्षा आठ से लेखक बनने की चाह उत्पन्न हुई थी। इसलिए मुझे आज भी कक्षा आठ के हिंदी के पाठ्यक्रम की कविताओं और उनके कवियों के नाम याद हैं। मेरे मन में लालसा उठती थी कि किसी रचना के साथ मेरा नाम भी लिखा हो। मेरा हरगिज यह मानना नहीं है कि चाह मात्र से कोई लेखक बन जाता है। लेखक बनने के लिए एक कठिन साधना की जरूरत होती है और जीवन के कटु अनुभवों से भी गुजरना पड़ता है। अध्ययन की भी एक महती भूमिका होती है। यही कारण है कि स्नातक स्तर पर हिंदी मेरी पढ़ाई का विषय न होते हुए भी मैं आरंभिक वर्षों में हिंदी में लिखने लगा था। वर्ष 1996 में मेरे पहले कविता संग्रह ‘मैं एक इतिहास हूं’ का प्रकाशन हुआ था। अब मेरे पास हिंदी साहित्य की स्नातकोत्तर डिग्री भी है और साहित्य की विभिन्न विधाओं की पांच पुस्तकें प्रकाशित हैं। मेरा दूसरा काव्य संकलन ‘तुम्हारे होने का पता’ वर्ष 2010 तथा तीसरा काव्य संग्रह ‘इस नए वक्त में’ वर्ष 2018 में प्रकाशित हुए हैं। एक कहानी संकलन ‘गांव की एक शाम’ वर्ष 2017 तथा एक उपन्यास ‘अपहरण’ 2015 में प्रकाशित हो चुके हैं। कभी मैं यह भी कहा करता हूं-मुझ सा बनने के लिए मुझ सा ही जीना पड़ता है।  मासूमियत से ठगे जाने के लिए कोई प्रेम करने लगता है।

युवा अवस्था में प्रवेश करने पर यह हो सकता है। यह भी मुझ जैसे विरले के संबंध में संभव है, जिसे भविष्य में कवि बनना है। सामाजिक वर्जनाओं से टकरा जाना एक सहज सरल कार्य नहीं है। इसके लिए प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। मैंने देखा है ऐसे विषय पर कोई विरला ही, यहां तक कोई साहित्यिक भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करता है।

यहां तक उस विषय पर एक साहित्यिक उपन्यास ‘अपहरण’ का सृजन भी हो चुका होता है।  ऐसे में मुझे कुछ को साहित्यिक कहने में आपत्ति भी है। वरिष्ठ आलोचक डा. सुशील कुमार फुल्ल ने मेरे पहले कविता संग्रह को एक पठनीय और प्रयोगशील कृति कहा है। इसके संबंध में वे यह भी लिखते हैं, ‘भावों और विचारों की विविधता पूरे मनोयोग से गुंफित मिलती है। कवि संवेदनशील प्राणी होता है, उसी के अनुरूप प्रस्तुत संकलन में अन्याय के प्रति उसका आक्रोश उफान की तरह यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है।’ उन्होंने ही इस पहले काव्य संकलन के लिए लिखा है, ‘जो यशस्वी संकेत देती है।’

उनकी भविष्यवाणी सत्य साबित हुई है, आज मैं कवि के रूप में विख्यात हूं। वरिष्ठ लेखिका सुनीता तिवारी ने दूसरे कविता संग्रह की कविताओं को जीवन से जुड़ी कविताएं कहा है और यह भी कहा है, ‘कविता संग्रह अनुभूतियों का ऐसा समंदर है जिसमें कितनी ही संवेग लहरियां उठती हैं।’ जयपुर से वरिष्ठ कवि सवाई सिंह शेखावत ने इसी संग्रह की कविताओं के आम आदमी से जुड़े होने के और एक एजेंडे के अंतर्गत लिखे होने के कारण इसके कवि को ‘जीवन के कारोबार का कवि’ कहा है।

मेरा तीसरा काव्य संग्रह गत वर्ष नई  किताब प्रकाशन समूह के सहयोगी प्रकाशन अंतरा प्रकाशन से आया है। इसकी अधिकांश कविताएं मैंने फेसबुक पर सक्रिय हुए लिखी हैं। इन कविताओं में पिछले संग्रहों की अपेक्षा एक अलग तेवर प्रदर्शित हुआ है। समसामयिक महत्त्वपूर्ण विषयों को नई दृष्टि से देखने का एक सही नजरिया प्रस्तुत हुआ है। व्यंग्यात्मकता, दार्शनिकता और एक सरल भाषा शैली से ओतप्रोत ये कविताएं संप्रेषणीयता में समृद्ध हैं। सरल मुहावरे में लिखी ये कविताएं अपने शिल्प में अद्वितीय हैं। अनुभवों के कड़वे-मीठे आस्वाद में ये जीवन की कविताएं हैं। विविध विषयों के प्रश्नों को उठाती ये कविताएं यथार्थ से जुड़ती हैं। राजनीति में झूठ का बोलबाला है। दूसरे को झूठा साबित करने के लिए झूठ बोला जाता है। ‘झूठ का पांव’ नामक कविता में ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं :

कहते भी हैं

झूठ के नहीं होते हैं पांव

पर यहां

सदा से जमा है

झूठ का पांव।

राजनीति में आलोचना का एक स्तर हो, इसकी अपेक्षा में आहत कवि ने प्रधानमंत्री के द्वारा पहने दस लाख के सूट को विपक्ष द्वारा आलोचना का विषय बनाने पर ‘महंगे कपडे़ पहने होंगे प्रधानमंत्री ने’ में लिखा :

यह भी तो सही है

अगर प्रधानमंत्री के पहने कपडे़

नीलाम भी करने हों

कीमत अच्छी खासी देने वाले

मिल सकते हैं दुनिया में।

यहां यह ध्यातव्य है कि प्रधानमंत्री का उक्त सूट नीलाम भी हुआ है। यहां ऐसा भी नहीं कि ये पंक्तियां नीलामी के बाद लिखी गईं। उक्त कविता का सृजन मैंने जनवरी 28, 2015 को फेसबुक के लिए किया था। ठीक उन दिनों जब आलोचना का दौर आरंभ ही हुआ था। जबकि नीलामी फरवरी 20, 2015 को संपन्न हुई थी। अगर प्रत्येक व्यक्ति अपने काम के प्रति ईमानदार हो तो ऐसे में वह अपने प्रति और अपने शब्दों के प्रति भी ईमानदार होता है, यथा :

शब्द की इज्जत

महज वादा निभाना भी नहीं होता

झूठे न पड़ते हों शब्द

स्वार्थ आड़े न आता हो

स्वार्थ बड़ा न होता हो शब्द से

शब्द की इज्जत बची रहती है।

शहर या कस्बे में भीड़ का बढ़ना आम बात है। इस प्रकार आवासीय स्थिति के कारण शहर का एक स्वाभाविक दृश्य उभरता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण सब कुछ का अतिरिक्त प्रबंध विकास के रास्ते में बाधक है। ‘यह शहर की संरचना है’ कविता की पंक्तियां द्रष्टव्य हैं :

ये जो छोटे छोटे दडवे हैं

एक दूसरे से सटे हुए

हालांकि बड़ी बड़ी इमारतों के हिस्से हैं।

देश संपन्न हुआ है। पर गरीब कौन है, इसकी सही पहचान होना भी जरूरी है। अकर्मण्यता के चलते लोग आलसी और अनैतिक होने लगे हैं। ‘गरीब कौन’ कविता की ये पंक्तियां देखें :

अमीर नहीं है कोई

इसलिए वह गरीब है

ऐसा सोचना ठीक नहीं

गरीबी के स्तर होते हैं

गरीबी रेखा होती है

उसके नीचे भी

गरीब होते हैं

सामाजिक आर्थिक ढांचा

होता ही ऐसा है

इसका मतलब यह भी नहीं

कि हटनी नहीं चाहिए गरीबी।