Wednesday, June 26, 2019 11:13 AM

समाज के अंधे दर्पण में औरत का वजूद

अंतिका प्रकाशन का हाल ही में आया उपन्यास, ‘समय मेरे अनुरूप हुआ’, वास्तव में चंद्ररेखा ढडवाल की लेखकीय क्षमता का ऐसा हस्ताक्षर है, जो साहित्य का समय बदल रहा है। वक्त का काजल पहनकर लिखा यह उपन्यास पाठक की आंखों में सुरमा बनकर समा जाता है। सृजन के शृंगार में दर्द के सन्नाटे चीख उठते हैं और समय की परछाइयों  का हिसाब होता है, तो अनेकों सवाल बारूद बनकर परिवेश की टोह लेते हैं। उपन्यास में गूंजती औरत के अस्तित्व की मर्यादा, समाज के छीजते चरित्र के आर-पार होकर नारी विमर्श के तहखाने तक सेंधमारी करती है और तब पुरुष सत्ता पिघलने लगती है या विवशताओं की गागर में गुरूर का सागर खुद का विलोम करना चाहता है। उपन्यास को लघु उपन्यास कहना इसे आंकने में जल्दबाजी होगी, बल्कि यह न तो पन्नों को जाया करता है और न ही शब्दों की यात्रा को।

रचना की अपनी गूढ़ता में चंद्ररेखा ढडवाल सामाजिक कैनवास के हर छोर को औरत के रंग से भिगो देती हैं, इसलिए वहां लेखन के पुराने हाशिए टूटते हैं और उपन्यास उस माटी पर जाकर खड़ा हो जाता है, जहां कभी प्रेमचंद की परंपराओं ने जन्म लिया था। यहां अनेक खूंटे हैं और हर दिन सामाजिक अहंकार के इन खूंटों पर कोई न कोई औरत-किसी न किसी भूमिका में टंग जाती है। खूंटे खामोश हैं- खुंखार हैं। खूंटे हुक्म देते हैं और समाज के प्रतीक बनकर बेडि़यां पहना देते हैं। क्या हमारे समाज में पुरुष का होना ही औरत के लिए ऐसे किसी खूंटे से बंधना है। इसलिए जब उपन्यास के भीतर औरत पूछती है ‘वह पति के घर क्यों है या इससे पहले पिता के घर भी क्यों थी’, तो समाज के भाव और भंगिमाओं की तिजोरी का रिसता खालीपन सामने आ जाता है। उपन्यास के भीतर, ‘विपरीत स्थितियों में अपने को सहेजने व संभालने के लिए जो विधान पुरुष रच सकता है, वह स्त्री के संदर्भ में मान्य नहीं है। इस तरह सोचने को स्त्री स्वतंत्र नहीं है तो उसे इसकी आदत भी नहीं रह गई है।’

अपनी पूर्णता से जूझती औरत हर तरह की प्रताड़ना के बावजूद पति को खलनायक मानने में संकोच करती है या अपने अस्तित्व के अनेक प्रतिबिंबों के बीच स्थापित सहिष्णुता से लहूलुहान होकर भी, अपनी खामोशी का चीरहरण करवा लेती है या सिसकियों का प्रतिशोध ओढ़ कर भी, टूटे वजूद पर नए सपनों का मुलम्मा चढ़ा लेती है। उपन्यास के भीतर पर्दा दर पर्दा चीखता है-औरत का प्यार और अधिकार चीखता है। मन और तन के सांचे में औरत के भंवर में समय की प्रतीक्षा, उसके संवेग को बार-बार छूना चाहती है, लेकिन संयम की अजीब तालाबंदी में समाज का दर्पण पूरी तरह अंधा हो जाता है। समाज की ऐसी अनेक असहज दीवारों पर लेखिका उपन्यास को लिखते हुए इसे ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष करतीं, अपने जीवट से अपने लिए रास्ता तलाशती कोशिशों को’ समर्पित करती है। औरत के दामन पर गहरी छाप छोड़ता उपन्यास, किसी आंचल की तरह इबारत की छांव सौंपता है, तो सृष्टि से सृजन की मिलकीयत छीन कर चिंतन की चितवन तक पहुंचा देता है।

वास्तव में यह उपन्यास जीवन दर्शन में औरत को फिर से समझने की कलात्मक शक्ति प्रदान करता है। इसमें समाज का अहंकार-बांझपन, उम्र भर के हथोड़े, औरत के सबक-औरत के गणित एक साथ उद्वेलित करते हैं। हजारों द्वंद्व भागना चाहते हैं, लेकिन मुक्ति का रास्ता बेहद तंग-जलालत भरा, ठीक रेणु की तरह। इच्छा-अनिच्छा की सरहद पर खड़ी औरत को अपना क्षेत्र या अपने वजूद का स्वामित्व नहीं मिलता।

सवाल हर बार उस मोड़ पर ले आता है, जहां हम अपनी रूढि़यों-पीढि़यों के भंवर में लटके होते हैं। ऐसे कई विराम जहां हम अंगारों पर खड़ी सभ्यता को बदनाम कर रहे होते हैं। औरत के हाशियों पर लिखा एक बेहतरीन उपन्यास पाठक के भीतर तक समा जाता है और तब भीतरी दर्पण टूटते हैं और घायल को कातिल ठहराने के सबूत भी चीख उठते हैं। यहां हर शब्द नुकीला है, चुभता है और इसीलिए समय और समाज के बीच झांकते हुए ‘समय मेरे अनुरूप हुआ’ के माध्यम से अनेक प्रश्न हमारे लिए छोड़ जाता है।

                         -निर्मल असो