सरकार की आर्थिक चुनौतियां

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

 

सार्वजनिक इकाइयों के घाटे का मूल कारण यह है कि उनके कार्यों में राजनीतिक दखल होता है और उनके अधिकारियों को कंपनी के लाभ से सरोकार कम ही होता है। अधिकारी के लिए यह पूरी तरह संभव होता है कि भ्रष्टाचार के माध्यम से वह कंपनी को डुबो दे और स्वयं व्यक्तिगत लाभ कमा ले। नई सरकार को चाहिए कि सार्वजनिक इकाइयों के निजीकरण का रास्ता अपनाए...

बीते समय में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भारत की आर्थिक विकास दर को घटाया है। अर्थव्यवस्था की इस मंद गति के पीछे यूपीए एवं एनडीए सरकारों द्वारा लागू की गई कुछ नीतियां हैं। नई सरकार को इन मूल नीतियों पर पुनर्विचार करना जरूरी है। पहली नीति विदेशी निवेश की है। दोनों सरकारों की पालिसी थी कि चीन की तर्ज पर भारत में भी विदेशी निवेश को भारी मात्रा में आकर्षित किया जाए। जिस प्रकार चीन में भारी मात्रा में रोजगार बने हैं और जनता के जीवन स्तर में सुधार आया है, उसी प्रकार भारत में भी हो।  चीन और भारत की परिस्थिति में समय का मौलिक अंतर है। चीन में यह नीति 80 के दशक में अपनाई थी, जिस समय विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही थीं, वहां माल की मांग थी। उस मांग की पूर्ति के लिए पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में निवेश करने को उद्यत थीं। उस समय चीन में भारी मात्रा में विदेशी निवेश आया, रोजगार बने और उत्पादित माल का निर्यात विकसित देशों को हुआ। इस चक्र को चलाने के लिए विदेशी पूंजी के अंतरराष्ट्रीय प्रवाह को खुली छूट दी गई। विदेशी निवेशकों को पूंजी लाने तथा चीनी नागरिकों को पूंजी को बाहर ले जाने की खुली छूट दी गई। इस नीति का आधार था कि विकसित देशों में पर्याप्त मांग थी। अब परिस्थितियां बदल गई हैं। विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर न्यून हो गई है, वहां माल की मांग की विशेष वृद्धि नहीं हो रही है। ऊपर से रोबोट के उपयोग से माल का उत्पादन विकसित देशों में ही होने लगा है। इसलिए चीन द्वारा अपनाई गई नीति को अपनाकर आज हम सफल नहीं हो सकते हैं।

इस समय बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में निवेश करने का कोई विशेष कारण नहीं है, बल्कि पूंजी के मुक्त प्रवाह के सिद्धांत की आड़ में हमारी पूंजी बाहर जा रही है। विदेशी पूंजी नहीं आ रही है। इसलिए जरूरी है कि हम विदेशी निवेश के पीछे भागना बंद करें और अपनी पूंजी अपने ही देश में रखने के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराएं। हमारा ध्यान विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के स्थान पर अपनी पूंजी को रोके रखने की तरफ होना चाहिए। इसी प्रश्न से जुड़ा दूसरा प्रश्न वित्तीय घाटे का है। यूपीए तथा एनडीए सरकारों ने सरकार के वित्तीय घाटे पर नियंत्रण की नीति को अपना रखा था। परिणाम यह हुआ कि सरकार द्वारा रक्षा, अंतरिक्ष, रिसर्च और अन्य जरूरी कार्यों में पर्याप्त मात्रा में निवेश नहीं किया गया। इससे हमारी विकास दर में गिरावट आई है। वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के पीछे सोच थी कि सरकार का वित्तीय घाटा नियंत्रण में रहेगा, तो महंगाई भी नियंत्रण में रहेगी, अर्थव्यवस्था में स्थिरता रहेगी और विदेशी निवेश भारी मात्रा में आएगा, लेकिन जैसे ऊपर बताया गया है कि विकसित देशों में माल की मांग ही कम हो जाने से विदेशी निवेश आने की संभावना कम ही है। ऐसे में अपने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करके और सरकारी निवेश में कटौती करना दोहरे घाटे का सौदा हो गया है। एक तरफ विदेशी निवेश नहीं आया, क्योंकि विकसित देशों में माल की मांग नहीं है। दूसरी तरफ घरेलू सरकारी निवेश में कटौती हुई, क्योंकि सरकार ने वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के लिए अपने निवेश में कटौती की थी। इसलिए आने वाली सरकार को वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने के स्थान पर राजस्व घाटे पर नियंत्रण करने की नीति को लागू करना चाहिए। बताते चलें कि राजस्व घाटे में सरकार के चालू खर्च होते हैं, जैसे सरकारी कर्मियों के वेतन और पेंशन, जबकि वित्तीय घाटे में पूंजी खर्च, जैसे रिसर्च में निवेश भी सम्मिलित होते हैं। अतः सरकार के राजस्व घाटे को नियंत्रण में करना चाहिए, न कि वित्तीय घाटे को। निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय घाटे को बढ़ाने की नीति को अपनाना चाहिए। तीसरा बिंदु सार्वजनिक इकाइयों का है। पचास के दशक में सार्वजनिक इकाइयों की नींव रखी गई थी। उस समय देश ब्रिटिश राज से स्वतंत्र हुआ था और देश के उद्यमियों में इतनी ताकत नहीं थी कि वे स्टील फैक्टरियों आदि में बडे़ निवेश कर सकें। उस परिस्थिति में सार्वजनिक इकाइयों को स्थापित करना उचित था, लेकिन समय क्रम में यह स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक इकाइयों में अकुशलता एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बीएसएनएल एवं एयर इंडिया है।

टेलीफोन के क्षेत्र में किसी समय बीएसएनएल का एकाधिकार था। आज निजी निवेश आने से टेलीफोन के दाम में भारी गिरावट आई है और बीएसएनएल सिकुड़ गया है। इसी प्रकार किसी समय एयर इंडिया का घरेलू उड्डयन में एकाधिकार था। आज प्रतिस्पर्धा के कारण एयर इंडिया का हिस्सा तो कम हो ही गया है, बल्कि यह कंपनी लगातार घाटे में चल रही है। इन सार्वजनिक इकाइयों के घाटे का मूल कारण यह है कि उनके कार्यों में राजनीतिक दखल होता है और उनके अधिकारियों को कंपनी के लाभ से सरोकार कम ही होता है। अधिकारी के लिए यह पूरी तरह संभव होता है कि भ्रष्टाचार के माध्यम से वह कंपनी को डुबो दे और स्वयं व्यक्तिगत लाभ कमा ले। इसलिए नई सरकार को चाहिए कि सार्वजनिक इकाइयों के निजीकरण का रास्ता अपनाए। इनका प्रबंधन ही निजी उद्यमियों को सौंप दे और सार्वजनिक इकाइयों की बिक्री कर जो रकम अर्जित हो, उसे रिसर्च जैसे जरूरी कार्यों के लिए उपयोग करे। चौथा बिंदु कल्याणकारी राज्य का है। सरकार के खर्चों में एक बड़ा हिस्सा मनरेगा, खाद्य सबसिडी, इंदिरा आवास जैसे कल्याणकारी कार्यों का होता है। इन खर्चों का बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन देने में खप जाता है। 70,000 रुपए मासिक वेतन पाने वाला सरकारी कर्मी 7,000 रुपए मासिक वेतन पाने वाले की कथित रूप से सेवा करता है। यानी सेवक का वेतन अधिक और सेवित का वेतन आज कम है। इस विसंगति को तत्काल दूर करना चाहिए। सरकार के खर्चों में बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन का है।

इस रकम को सीधे जनता को वितरित कर दिया जाना चाहिए, जिसे यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना कहा जाता है। देश के हर नागरिक के खाते में एक रकम हर माह सीधे डाल दी जाए। इस रकम से जनता अपने रोजगार, भोजन, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा सभी की स्वयं व्यवस्था कर लेगी और सरकारी कल्याणकारी कर्मियों का पेट भरने में जो सरकार का बजट व्यर्थ जा रहा है, वह रकम बच जाएगी। देश की जनता के जीवन स्तर में तत्काल सुधार आएगा। उपरोक्त बताई गई पालिसियां यूपीए तथा एनडीए दोनों सरकारों ने लागू की थीं। आने वाले चुनाव के बाद जो भी सरकार आएगी, उसको इन नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com