Saturday, September 21, 2019 04:47 PM

सहमति-असहमति का मंच

विधायक ना पसंद था या सत्तापक्ष बुलंद था, जो जनमंच के माइक पर संवाद बंद था। श्री नयनादेवी विधानसभा क्षेत्र की वास्तविकता में देखें, तो जनमंच राजनीतिक विरोधाभास में आयोजन की घेराबंदी कर गया। दयोथ में स्थापित समारोह के आजू-बाजू जनता की ख्वाहिशों, हकीकत की आवाज और सत्ता के आगाज का प्रबंध था, लेकिन भूमि और भूमिका के बीच सरहद उभर आई। कांग्रेसी विधायक रामलाल का लाल होना तथा प्रत्युत्तर में भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता का सुर्ख होना जो कह गया, उसमें हर कोई अपने-हिसाब से सहमति-असहमति खोज लेगा। ऐसे में जनमंच की भूमिका में असहमति न होगी, तो संवाद की बजाय सरकारी आंकड़ों की अदालत ही होती। यह दीगर है कि विपक्ष की वाणी से सत्ता का माइक उछल गया या माहौल में चुनाव जैसा प्रचार क्यों घर कर गया। बहरहाल उस मुद्दे का क्या होगा जिस पर विधायक रामलाल आग बबूला हुए या संयम की लक्ष्मण रेखा के बाहर ही राजनीति खुद को कहती रहेगी। हमें नहीं मालूम कि विपक्ष के आरोपों पर जनमंच क्या करता है या इस चीखो-चिल्लाहट के बीच आम आदमी का संघर्ष किससे अधिक सहमत होता है, लेकिन जनता के सवाल पर हर जगह मार्मिक व वास्तविक है। अगर कहीं कोई बुढ़ापे में केवल श्मशानघाट के रास्ते की चिंता कर रहा है, तो यह जिंदगी का सफरनामा है, जिसे जनमंच की कवायद में पूरा होना है। बेशक राज्य की शिकायतों का हिसाब जनमंच करता है और इस बार भी 664 का निपटारा हो गया, लेकिन कितने सवाल इस भीड़ से बाहर रहे, यह हिसाब अभी बाकी है। मसलों का आपसी संबंध भरमौर से किन्नौर तक अगर एक समान है, तो सुधरने और सुधारने की प्रक्रिया में अभी इंतजाम करना बाकी है। वास्तव में जनमंच एक मौका है और सरकार को पाने का एहसास सरीखा है, इसलिए श्री नयनादेवी विधानसभा क्षेत्र के दो पक्ष आमने-सामने रहे। जनता को जनता की भाषा में सुनने के लिए जनमंच का हृदय इतना विशाल चाहिए कि शिकायतों के बीच फरमाइश भी समझी जाए, लेकिन आंकड़े महज फरियादी पैदा न करें। स्वाभिमानी समाज के लिए सरकारी कामकाज का ढर्रा जनमंच के मार्फत कितना सुधर गया या भविष्य में शिकायतों का पिटारा लौटकर जब दफ्तर को ही जनमंच बना दे, तो समझो सुशासन गरीब की झोंपड़ी तक पहुंच गया, वरना सार्वजनिक खर्च में हर शिकायत अपनी कीमत वसूल रही है। जिला से राज्यस्तरीय होते जनमंच की सौगात में प्रदेश पुनः निगरानी की व्यवस्था कर रहा है। जाहिर है मसले बड़े होंगे और नीतियों-कार्यक्रमों की समीक्षा में शिकायत का असर व्यवस्थागत होगा। यह जनता से फीडबैक लेने का जरिया हो सकता है, लेकिन अंदाज में शोहरत की लाली न हो। जनता केवल अपने मसलों की खेती उगाने लगे, तो जनमंच का यथार्थ डाकिया बन जाएगा, लिहाजा इसे और इसकी परिपाटी को ताजगी, परिकल्पना तथा परिपक्वता चाहिए। यह केवल शिकायतों का निवारण केंद्र नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं की निगरानी में व्यवस्था को सचेत व दुरुस्त करे। ऐसे में भविष्य के लोकमंचों में सरकार की प्राथमिकताओं का असर, क्षेत्रीय विकास का संतुलन तथा भविष्य का रेखाकंन भी हो। विभागीय तौर पर मंत्री अगर लोकमंच को फीडबैक का जरिया बनाएं, तो कार्यशैली बदलेगी। ऐसे में राज्यस्तरीय लोकमंच के कम से कम दो पहलू हों। पहले में किसी एक मंत्री के सामने प्रदेश के प्रदर्शन की तस्वीर का मुआयना हो, तो दूसरे पल जनता और प्रबुद्ध वर्ग के फीडबैक से निकले सुझावों का अवलोकन हो। उदाहरण के लिए पहला राज्यस्तीय लोकमंच अगर परिवहन क्षेत्र पर हो, तो एचआरटीसी के तमाम डिपुओं की व्यवस्था, निजी ट्रांसपोर्टरों की शिकायत और भविष्य की परिवहन आवश्यकता का मूल्यांकन हो पाएगा। इससे विभागीय कसौटियां और सुशासन की तरफ प्रदेश की पारदर्शिता का विश्लेषण होगा। बेशक लोकमंच अपनी तरह का साहसिक प्रयास है। इसलिए बहस करते विपक्ष के विधायक को सुनना तथा मंच पर आसीन सत्ता पुरुष को संयम करना, इसकी पहली शर्त रहेगी।