Thursday, October 17, 2019 02:10 AM

सादगी से सतर्कता तक

हिमाचल अपनी सादगी से सतर्कता के करीब पहुंच गया है ताकि तरक्की के बीच अपराध और आपराधिक तंत्र घुसपैठ न कर पाएं। पर्यटन और परिवहन के डेस्टिनेशन पर पहुंचे आपराधिक तंत्र की बिसात पर कानून-व्यवस्था की चुनौतियां बढ़ रही हैं। पुलिस विभाग की संरचना तथा संचालन में भारी फेरबदल की आवश्यकता है। शिमला, मंडी या मनाली में उभरे एक साथ कई और सेक्स रैकेटों की जड़ों में जो तंत्र बिछा, ठीक उसी तरह नशे के व्यापारिक गठबंधन प्रदेश के माहौल में खलल डाल रहे हैं। हिमाचल अभी तक अपनी सादगी में परंपरागत आचरण को अहमियत देता रहा है, लेकिन भौतिक उपलब्धियों ने मानवीय प्रतिस्पर्धा के नए औजार पैदा कर दिए हैं और इसीलिए पथभ्रष्ट होते हिमाचली समाज के कुछ अंग दिखाई देने लगे हैं। अपराध के संगठित आधार किसी न किसी वजह से हिमाचल में पनाह हासिल कर रहे हैं, तो धीरे-सीधे परिदृश्य की यही मिलावट बड़ा आकार ले लेगी। ऐसे में पर्यटन के रास्ते अपराध का आगंतुक होना किसी भी सूरत स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सेक्स रैकेटों का लगातार सामने आना हिमाचल के पर्यटन आकर्षण को विद्रूप बनाता है। पर्यटन के आस्तीन में ऐसे सांपों का होना सतर्कता पैदा करता है। मात्रात्मक दृष्टि से प्रदेश में सैलाब की तरह आते भ्रमण को हम हमेशा पर्यटन नहीं मान सकते, लेकिन विडंबना भी यही है कि कुछ ऐसे लोगों का डेरा हिमाचल में बसने लगा है, जो प्रदेश की सादगी और शांति के खिलाफ है। कुछ बाहरी संगठन तथा अलग-अलग समागम भी हिमाचल की धरती को माप रहे हैं। बल्हघाटी में दो समुदायों के बीच तनाव के क्षण स्थानीय संवेदना में आयातित मंजर की कहानी है। तथ्यों की पैरवी और परीक्षण में जो अंतर रहता है, उसी में विवेक व संयम की परीक्षा होती है। दुर्भाग्यवश हिमाचल का समाज आज जहां खड़ा होने का बहाना ढूंढ रहा है, वहां सियासत की प्राथमिकताएं भी असामाजिक तत्त्वों की प्रश्रयदात्री साबित हो रही हैं। कई तरह के आर्थिक अपराधों की किश्ती में बहते हुए हम अपनी परंपरागत जिरह और जुबान का सौहार्द भूल गए, लिहाजा समाज के पहरे जिस तीव्रता से छिन्न-भिन्न हो रहे हैं, वहां आपराधिक प्रवृत्तियां गठजोड़ कर रही हैं। जहां गली भटक रही हो, वहां बच्चों को नशे के खिलाफ सशक्त करते समाज के बाजू नहीं रहे। समाज के भीतर जो रंग बदरंग हो रहा है, उसके कारण अब धर्म की तलाशी में समाज की अखंडता खतरे में है। खतरे प्रदेश की प्रगति को निहारते मंसूबों में भी देखने होंगे, क्योंकि नशे की खेप में पढ़ा-लिखा नौजवान भी दिखाई दे रहा है। दौलत के अंगारों की चमक पर भरोसा करेंगे, तो अंततः झुलसेंगे तो अपने ही कदम। प्रदेश की महत्त्वकांक्षा में समाज की सादगी का मौजूद रहना ही पर्वतीय जीवन की सहजता है, वरना दौड़ती-भागती जिंदगी के सरोकारों में गिरावट तय है। अपराध उन्हीं गलियों से गुजरता है, जहां से समाज किनारा करते हुए निजी जीवन को चुनता है। हिमाचल में आपराधिक मामलों को सामाजिक व सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझते हुए यह भी तय करना होगा कि कहीं हमारी उन्नति का खुलापन गाहे-बगाहे ऐसी ताकतों को आमंत्रित तो न कर ले। पर्यटन की आसान किस्तों में हिमाचल की कमाई तो बढ़ सकती है, लेकिन जहां संस्कृति की अलग पहचान तथा जीने का अंदाज भिन्न है, वहां अपराध की घुसपैठ पर सतर्क होना ही नहीं, दिखाई भी देना होगा।