Thursday, July 09, 2020 04:41 PM

साधुओं की रहस्यमयी हत्याएं

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि ऐसी स्थिति में जबकि नरेंद्र मोदी जैसे नेता देश का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में हिंदू संतों की हत्या एक पहेली क्यों बनी हुई है। इस मामले में षड्यंत्र का खुलासा क्यों नहीं हो पा रहा है। वह इस मामले में चुप क्यों हैं तथा मामले की जांच के लिए सीबीआई को क्यों नहीं लगा रहे हैं। मैं यह भी समझ नहीं पा रहा हूं कि भाजपा भी इस मामले में आधिकारिक वक्तव्य के अलावा आक्रामक रुख क्यों नहीं अपना रही है। इस मामले में मुस्लिम एंगल प्रमाणित नहीं हुआ है क्योंकि न तो पुलिस वालों में कोई मुसलमान था और न ही इस हत्या को अंजाम देने वाली भीड़ में कोई मुसलमान था। पुलिस का व्यवहार भी इस मामले में निराशाजनक है, वह आश्चर्यजनक रूप से इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय सहजता के साथ ले रही है। राज्य सरकार भी सीबीआई जांच को अनुमति नहीं दे रही है, हालांकि अर्नब गोस्वामी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। मीडिया की भूमिका भी इस मामले में निष्क्रिय रही है। उधर देश में यह आम धारणा है कि इस मामले में केंद्र को कोई ठोस रुख अपनाना चाहिए तथा भविष्य में इस तरह की जघन्य हत्याओं को रोका जाना चाहिए। इस मामले में एक सौ से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है, किंतु वास्तविक कहानी कोई नहीं बता रहा है...

महाराष्ट्र के पालघर में दो निर्दोष साधुओं की जघन्य हत्या के चंद दिन बाद ही उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के एक गांव में मंदिर में दो साधुओं की हत्या कर दी गई। ऐसा लगता है जैसे संतों और धार्मिक प्रमुखों की हत्याओं की एक अनवरत शृंखला चल पड़ी है। यह हत्याएं सुनियोजित तरीके से की गई लगती हैं तथा इसमें पहले से निश्चित एक प्रणाली का इस्तेमाल हुआ है। जबकि भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर सभी राजनीतिक दल पालघर साधु हत्याकांड पर चुप रहे, उधर उत्तर प्रदेश के मामले में महाराष्ट्र की अपेक्षा विचार योग्य हो-हल्ला हुआ। स्पष्ट है कि इस मामले में गुप्त रूप से कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा था तथा इससे कपटी रूपरेखा की बू आती है। आश्चर्यजनक बात यह है कि अब तक हुई जांच से कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है। बुलंदशहर के मामले में, कांग्रेस के इस जोरदार दावे के बावजूद कि कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई है, पूरा प्रकरण किसी राजनीतिक निष्कर्ष में परिणित हुआ है। मंदिर में रह रहे दो साधुओं ने एक नशेड़ी के खिलाफ चोरी की शिकायत की थी जिससे वह खिन्न हो गया था। उसने एक लाठी उठाई और जब साधु सो रहे थे, तो उनकी हत्या कर दी। आरोपी व्यक्ति को जब पकड़ा गया तो उसने साधुओं से शत्रुता की बात कबूल की। उसने यह भी कबूल किया कि उसने भांग पी ली थी जिससे उत्तेजित होकर उसने यह कृत्य किया। इस हत्याकांड का पालघर से कोई संबंध नहीं है। इसमें राजनीति को भी कुछ करने के लिए बाकी नहीं था, सिवाय इसके कि उत्तर प्रदेश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ तोप चलाने का विपक्ष को मौका मिल गया। इससे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि को नुकसान हुआ है, जिन्हें एक कठोर प्रशासक के रूप में जाना जाता है। इस तरह के अपराध के हालांकि कोई राजनीतिक और सांप्रदायिक निहितार्थ नहीं थे तथा यह मामला किसी षड्यंत्र का हिस्सा भी नहीं लगता है। इस केस ने दादरी में पुलिस के एक अधिकारी की हत्या की याद दिला दी जिसे बदले की कार्रवाई ही कहा जा रहा था, हालांकि इस मामले में कुछ दलों ने सांप्रदायिक रंगत देने की भी कोशिश की। लेकिन बुलंदशहर हत्याकांड में कोई रहस्य बाकी अब नहीं है, जैसा कि पालघर साधु हत्याकांड के मामले में लग रहा है जहां हत्या के इतने दिनों बाद भी अभी रहस्य बरकरार है। पालघर मामले में अभी तक उन पुलिस अफसरों के खिलाफ अभी तक कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हुई है जिनके सामने भीड़ ने साधुओं की हत्या कर दी थी। यह एक गंभीर मामला होने के साथ-साथ दुर्लभ मामला भी है क्योंकि साधुओं की कोई गलती न होने के बावजूद उनकी जघन्य हत्या कर दी गई और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। यह बात याद रखी जानी चाहिए कि इससे पहले इसी क्षेत्र में रूटीन ड्यूटी कर रहे डाक्टरों को ग्रामीणों ने उत्पीडि़त किया था और पुलिस इस मामले में भी डाक्टरों को बचा नहीं पाई थी। पालघर के मामले में हालांकि पुलिस नाटक को देखने वाली बनी रही। सवाल यह है कि पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की? इस मामले में किसी को क्षमा नहीं किया जा सकता है। यह भी बताया जा रहा है कि जब इस हत्याकांड को ग्रामीण अंजाम दे रहे थे तो कत्ल हुए साधुओं ने पुलिस से सहायता की मांग की थी, किंतु पुलिस ने अपने हाथ खड़े कर लिए और उसने हत्या हो जाने दी।

भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर किसी भी दल ने न तो इस हत्याकांड की निंदा की, न ही इस मामले में कार्रवाई की मांग की। मीडिया तथा अधिकतर न्यूज चैनलों ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और मामले को दबाने की कोशिश की गई। भाजपा को छोड़कर बाकी दलों के नेता इस मामले में चुप रहे तथा राहुल गांधी, ममता बैनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने भी इस मामले में कुछ नहीं कहा। पुलिस ने मात्र कुछ कांस्टेबलों को निलंबित किया तथा एक अधिकारी का तबादला कर दिया। जैसी अपेक्षा की जा रही थी, वैसी कड़ी कार्रवाई इस मामले में नहीं हुई। इस मामले में सीबीआई की जांच होनी चाहिए थी, लेकिन मामले को स्थानीय अधिकारियों पर छोड़ दिया गया है। अन्य मामलों में सभी दल खूब हो-हल्ला करते रहे हैं, पर इस मामले में वे चुप्पी साधे हुए हैं। यहां तक कि भाजपा के नेताओं ने भी इस मामले में केवल आधिकारिक रूप से निंदा की और प्रदर्शन किया, लेकिन उसने तथा उसके सहयोगियों ने मामले को हलके में ही लिया है। राज्य सरकार ने इस मामले में किसी सांप्रदायिक संबंधों से इनकार किया है तथा मामले में केवल अफवाह पहलू की ही जांच होगी, जबकि कत्ल के इरादे व षड्यंत्र पहलू की जांच नहीं होगी। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि ऐसी स्थिति में जबकि नरेंद्र मोदी जैसे नेता देश का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में हिंदू संतों की हत्या एक पहेली क्यों बनी हुई है। इस मामले में षड्यंत्र का खुलासा क्यों नहीं हो पा रहा है। वह इस मामले में चुप क्यों हैं तथा मामले की जांच के लिए सीबीआई को क्यों नहीं लगा रहे हैं। मैं यह भी समझ नहीं पा रहा हूं कि भाजपा भी इस मामले में आधिकारिक वक्तव्य के अलावा आक्रामक रुख क्यों नहीं अपना रही है।

इस मामले में मुस्लिम एंगल प्रमाणित नहीं हुआ है क्योंकि न तो पुलिस वालों में कोई मुसलमान था और न ही इस हत्या को अंजाम देने वाली भीड़ में कोई मुसलमान था। पुलिस का व्यवहार भी इस मामले में निराशाजनक है, वह आश्चर्यजनक रूप से इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय सहजता के साथ ले रही है। राज्य सरकार भी सीबीआई जांच को अनुमति नहीं दे रही है, हालांकि अर्नब गोस्वामी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। मीडिया की भूमिका भी इस मामले में निष्क्रिय रही है। उधर देश में यह आम धारणा है कि इस मामले में केंद्र को कोई ठोस रुख अपनाना चाहिए तथा भविष्य में इस तरह की जघन्य हत्याओं को रोका जाना चाहिए। इस मामले में एक सौ से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है, किंतु वास्तविक कहानी कोई नहीं बता रहा है।

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