Wednesday, July 17, 2019 12:39 AM

सामाजिक सरोकारों से दूर न्यूज चैनल्स

सुप्रीम कोर्ट ने टीवी चैनल्स के बारे में एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की थी : ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया स्वयं को इस प्रकार प्रस्तुत करता है जैसे वो पोप हो।’ हमारे देश में करीब 800 सैटेलाइट टीवी आउटलेट्स हैं, जिनमें से 410 न्यूज चैनल्स हैं यानी 50 प्रतिशत से अधिक संख्या समाचार चैनलों की है, जो 24 घंटे कार्यक्रम प्रसारित करते रहते हैं। लेकिन विश्वसनीयता के स्तर में ये सभी चैनल समाज में घोर आलोचना के शिकार हैं।

लोकसभा चुनावों में जिस प्रकार चैनल विभिन्न राजनीतिक दलों के राजनेताओं के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं, उससे एक बात तो साफ है कि इन्हें सामाजिक सरकारों या जनहित के मुद्दों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ये टीवी चैनल गत पांच साल तक राजनेताओं की चाकरी करते रहे। चुनाव के दौरान टीवी स्क्रीन पर मोदी, राहुल, अमित शाह, प्रियंका, अखिलेश आदि बेशुमार नेताओं के गाली-गलौचपूर्ण भाषणों, अभद्र भाषा का प्रयोग, घटियापन की सभी सीमाएं लांघ कर चुनाव प्रचार आदि माहौल को देखकर दर्शक स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहा है। उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या देखे और न देखे। पांच साल तक टीवी चैनल कभी राम मंदिर तो कभी बाबरी मस्जिद और तीन तलाक के मुद्दों पर देश भर में सामुदायिक तनाव पैदा करते रहे।

असहिष्णुता ने गोरक्षा के नाम पर कितने ही निर्दोष मुसलमानों को लील लिया और न्यूज चैनल्स हिंदू व मुसलमानों में वैमनस्य और घृणा की दीवारों को पुख्ता करने में लगे रहे। यानी जो भूमिका धुव्रीकरण के नाम पर हमारे नेता निभा रहे हैं, उसे जंगल की आग की तरह फैलाने का काम हमारे ये चैनल कर रहे हैं।

मोदी और भाजपा का गुणगान करने वाले जी न्यूज का कंटेंट देखें तो लगता है इसने स्वयं को भाजपा के यहां गिरवी रख छोड़ा है।

पहले टाइम्स नाऊ के सूत्रधार रहे अर्नब गोस्वामी ने रिपब्लिक टीवी के जरिए पब्लिक डिस्कोर्स के स्तर को रसातल तक ले जाने का काम किया है। अर्नब गोस्वामी ऐसे बुद्धिमान एंकर हैं कि डिबेट के दौरान प्रतिभागी विशेषज्ञों के साथ गाली-गलौज पर उतर आते हैं और उन्हें अपना मत रखने का अवसर नहीं देते। जी न्यूज के सुधीर चौधरी की तरह अर्नब गोस्वामी भी फंयूडल माइंडसैट के शिकार हैं और अपनी विचारधारा को दर्शकों पर लादने के लिए सभी सीमाएं लांघ जाते हैं। जहां तक रीयल इश्यूज का प्रश्न है वे सिरे से ही गायब हैं। पांच साल तक चैनलों के कंटेंट से विपक्ष गायब सा बना रहा और मोदी, अमित शाह की जोड़ी के भाषणों के लाइव प्रसारण व बार-बार चौबीस घंटे उन्हें दिखाया जाना इस बात का सूचक है कि हमारे चैनल्स अपना एजेंडा तय कर चुके हैं।

यानी गरीब, दबे-कुचले, शोषित लोग व हाशिए पर सिमटे लोग भाड़ में जाएं। उनके लिए ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं। किसान आत्महत्याएं, नक्सली हिंसा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, सड़कें, बिजली-पानी हमारे न्यूज चैनल्स की एजेंडा लिस्ट में कभी नहीं रहे। अलबत्ता एनडीटीवी के रवीश कुमार ने प्राइम टाइम पर नौकरियों से जुड़ी सीरीज को महीनों तक चलाए रखा।

जंतर-मंतर व देशभर में आंदोलनरत लोगों की आवाज बनने का प्रयास एनडीटीवी ने किया। इस चैनल ने हमारे देश में राज्यों के उन भ्रष्ट, लूटमार में जुटे चयन आयोगों को कुंभकर्णी नींद से झकझोरने का प्रयास किया, जो नौकरी में आवेदनों के नाम पर करोड़ों, अरबों की फीस हड़पने के बावजूद नौकरी नहीं देते। इसी चैनल ने बार-बार दर्शकों को चेताया कि वे हिंदू-मुसलमान बहसों से दूर रहें और अपने बच्चों को दंगाई बनाने से बचें। अभिव्यक्ति के खतरों और असहिष्णुता के जहरीले वातावरण में ऐसे मुट्ठी भर चैनलों की आवाज वास्तव में लोकतंत्र को बचाए रखने का प्रयास ही है।

पहले आज तक चैनल, फिर एबीपी चैनल के एंकर, लेखक व बुद्धिजीवी पुण्य प्रसून वाजपेयी को चैनलों की स्क्रीन से सत्ताधारियों ने इसलिए गायब कर दिया कि जनहित व सरोकारों के मुद्दों को फोकस में लाकर सरकार, सत्ता व प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने में काबिल थे। वे अपनी साफगोई व बेबाकी के शिकार हुए और एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वामी रामदेव पर एक इंटरव्यू में नागवार टिप्पणी के कारण दर्शकों की आंख से ओझल हो गए। आब्जेक्टिव, निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता के कद्रदान पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे टीवी एंकरों को आज भी बेहद ‘मिस’ करते हैं। मीडिया को रेगुलेट करना और उस पर अंकुश लगाने के सरकारी प्रयास निष्फल रहे हैं। संविधान की धारा 19 (1) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्याख्या की गई है और मीडिया भी उसी का हिस्सा है, लेकिन मीडिया स्वयं पर नियंत्रण रखे तो उचित है।

आत्मावलोकन ही सार्थक मीडिया की कुंजी है। दर्शक या पाठक ही यह तय कर सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है और क्या पढ़ना है। उसकी फीडबैक मीडिया के लिए महत्त्वपूर्ण है। कुछ मीडिया विशेषज्ञ मानते हैं कि न्यूज चैनल्स ने नैतिकता को तिलांजलि दे रखी है और वे सर्कस की तरह काम कर रहे हैं।

उनका कंटेंट मनोहर कहानियों की तरह है। लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे पूरी तरह गायब हैं और नेताओं की अभद्र भाषा व अनाप-शनाप बयानबाजी मीडिया के लिए सनसनी है।

शायद इसलिए ‘वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम’ ने भारतीय मीडिया को बेहद भ्रष्ट बताया है। फोरम के मुताबिक न्यूज चैनल्स ‘माचिस बॉक्स’ की तरह काम कर रहे हैं। वे टीआरपी बढ़ाने के लिए बालाकोट जैसे मुद्दे को भी भुनाना नहीं चूकते।