Tuesday, February 18, 2020 07:26 PM

सायों की सलवटों में

हिमाचल को अब कड़वी बात कह लेनी होगी, वरना इस शहद में डंक भर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में हिमाचल का लबादा कुछ इस तरह उतरा कि एक मंत्री को जातीय भेद का आडंबर खोलना पड़ा। देश जिस वजह से दस साल के लिए अनुसूचित जाति-जनजातियों के लिए सामाजिक न्याय का प्रण लेते हुए आरक्षण बढ़ाता है, वहां हिमाचल का किस्सा शर्मनाक है। यह दबाव, दमन और दृष्टि का अपाहिज चेहरा है, जो हिमाचल की शिकायत के अलग-अलग प्रतिबिंब पैदा कर रहा है। यह तमाम बयानों के सत्य-असत्य के बीच मानवीय पड़ताल है, जहां जयराम सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा. राजीव सहजल कहते हैं कि उनका मंदिर प्रवेश बाकायदा रोका गया। ये शब्द हिमाचल के कानों में गर्म सीसे की तरह उतरते हैं, तो प्रगतिशील समाज के आईने टूट कर प्रदेश के वजूद को सीधे किसी दलदल में उतार देते हैं। इस सत्य-असत्य के बीच तथ्यों का अन्वेषण ही साबित करेगा कि किसका पलड़ा भारी है। जानकारियों के समूह को किसी गांव-देहात के स्कूली माहौल में, मिड-डे मील के दौरान अगर थाली-थाली में भेद नजर आया, तो यहां सत्य ही तथ्य है। राजीव सहजल के कथन पर नाचन हलके के विधायक जो भी बयान दें, समाज की निगाहों में हम शर्मिंदा हैं। इस कहानी का मार्मिक पक्ष छूएं या उन अर्जियों पर गौर करें, जो गाहे बगाहे फिर हमें सामाजिक असमानता के भंवर में छोड़ देती हैं। दूसरी ओर ज्ञान के मंदिर में डा. राजीव सहजल की हाजिरी इतनी भी कमजोर नहीं कि वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े हों। वह हिमाचल के अग्रणी व्यक्तियों में और सरकार की बाहों में एक मजबूत हस्ताक्षर हैं, तो ऐसे परिदृश्य में कमजोर कौन हुआ। बहरहाल हिमाचल का दंभ कहीं न कहीं इस वृत्तांत से टूटा जरूर है। दूसरी ओर कानून के दायरे ही अगर चीखने लगें, तो सामान्य व्यक्ति का अपने हक के कानून के आगे क्या हश्र होगा। कोटखाई प्रकरण के अंधेरों के बीच हिमाचल की कटी नाक आज भी लहूलुहान है। न्याय की प्रतीक्षा में समय के पन्ने पलटे और सरकार भी बदल गई, लेकिन आशंकाओं के दायरे में पुलिस की गवाहियां नहीं बदलीं। पुनः सूरज लॉकअप मर्डर केस की जद में आई, एसआईटी टीम का चोर-सिपाही का खेल अब एक वरिष्ठ अधिकारी के रुतबे को प्रश्नांकित कर रहा है। इस बार सीबीआई कोर्ट के सामने शिकायत और शिकायतकर्ता वर्दी पहने हुए हैं। एक आईपीएस अधिकारी सौम्या सांबशिवन ने खुद पर दबाव बनाने के लिए आईजी जहूर जैदी के नाम का उल्लेख किया, तो सारा घटनाक्रम फिर से वीभत्स सायों की सलवटों में दिखाई देता है। यहां प्रश्न एक जांच भर या सूरज की हिरासत में मौत पर ही नहीं उठता, बल्कि उन तमाम कसौटियों पर भी है, जो नकाब पहनकर इस मामले को देख रही हैं। सीबीआई से छूटी पुलिस टीम को ऐसा आकाश दिखाने का दोष सरकार पर न लगे, लेकिन प्रमाणों को छेद नहीं होंगे, इसकी क्या गारंटी। आरोपित पुलिस अधिकारी अगर बेदाग अन्य पुलिस अधिकारी की गवाही में प्रभाव का इस्तेमाल कर सकता है, तो इसी प्रकार की अनेक आशंकाएं निरस्त नहीं होती। पुलिस के कुछ अन्य अधिकारी मीडिया रिपोर्टिंग पर दबाव बनाते रहे हैं और इसका जिक्र अदालती मामलों की ऐसी कहानियां बयां करता है। सीबीआई अदालत ने जिस प्रकरण की परतों में मीडिया को सहयोगी पाया है, उसके खिलाफ एसआईटी टीम के कुछ पुलिस अधिकारी अगर अदालत में गए हैं, तो इससे कानून की मदद हो रही है या मीडिया को घसीटने की छूट मिल गई। सीबीआई कोर्ट चाहे तो इस प्रकरण के बिंदुओं पर मीडिया का अन्वेषण कर सकती है। सरकार ने तीव्रता से विवादित-आरोपित पुलिस अधिकारियों की मन माफिक पोस्टिंग करके कोटखाई प्रकरण के नासूर को फिर से नजरअंदाज किया है। इन दोनों मामलों में हम यह नहीं कह सकते कि शिकायत सही है या शिकायतकर्ता, लेकिन सत्य और असत्य के बीच हिमाचल सरकार को उपर्युक्त दोनों मामलों में अपनी भूमिका के स्वतंत्र व निष्पक्ष अक्स स्थापित करने होंगे। इन दोनों मामलों में जनता का विश्वास ही समाज का आगाज है, जहां सिक्के का हर पहलू कानून से कानून पाने की अभिलाषा है।