Monday, April 06, 2020 06:34 PM

सार्वजनिक क्षेत्र की मांग घटी

हिमाचल में 6127 स्कूलों के औचित्य पर लगे प्रश्नचिन्ह को मिटाने का एक फार्मूला इन्हें कलस्टर में समाहित करके सक्रिय बनाए रखने का है, जबकि इस यथार्थ को भी कबूल करना होगा कि सरकारी प्रांगण क्यों उदासीन हो रहे हैं। शिक्षा के सामर्थ्य में हिमाचल की प्रगति का एक बड़ा जरिया सरकारी स्कूलों की तादाद व उनका समुदाय से सामीप्य रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में गुणवत्ता के आधार पर अभिभावकों के सामने निजी शिक्षण संस्थानों का विकल्प प्राथमिक बनता जा रहा है। यहां प्रश्न सरकारी स्कूल को बचाने से भी कहीं ज्यादा यह समझाने का है कि सार्वजनिक धन से भी अच्छी पढ़ाई हो सकती है। यह राजनीतिक इरादों की बरसात का ऐसा सूखापन है, जिस पर गौर करना होगा। अनावश्यक स्कूल-कालेज खोलकर शिक्षा का मात्रात्मक रुख अब कमजोर साबित हो रहा है, लिहाजा ऐसे खूंटों से अलग होने की पहल को मजबूती से अंजाम तक पहुंचाने की जरूरत है। बेशक कलस्टर स्कूलों के फार्मूले पर अध्यापक वर्ग को एतराज होगा या इसे जनता अलग तरह से भी देख सकती है, लेकिन यहां सवाल औचित्य पर खड़ा होता है। हिमाचल की योजनाओं में औचित्य के प्रश्न अब मुंह बाये खड़े हैं, भले ही हम स्वार्थी कारणों से इन्हें आगे सरका दें। मात्रात्मक उपलब्धियों के बाद अगर गुणवत्ता को पारंगत करना है, तो कलस्टर प्लानिंग एक बेहतर उपाय हो सकता है। यह न केवल शिक्षा, बल्कि हर विभाग की योजना में दक्षता लाने के नजरिए से आवश्यक साबित होगा। हिमाचल का विभागीय युक्तिकरण भी वांछित है। हमने जरूरत से ज्यादा स्कूल, कालेज व चिकित्सा संस्थान खोल दिए, लेकिन प्रदेश की स्वाभाविक मांग पूरी नहीं हुई। मेडिकल कालेजों की तादाद बढ़ाने से कितने चिकित्सा संस्थान असमर्थ हुए, इस पर गौर करना होगा। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की तरफ कदमताल करते हुए, हमारी योजनाओं के बजाय चिकित्सा संस्थानों के श्रीगणेश में राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा फलती फूलती गई, नतीजतन स्वास्थ्य लाभ के लिए अब हिमाचल में ही निजी अस्पताल एक जरूरत बन गए। निजी विश्वविद्यालयों की खेप में ‘डिग्री’ उजड़ गई, जबकि शिक्षा की आवश्यकताएं पूरी ही नहीं हुईं। कौन कह सकता है कि हिमाचल में शिक्षण व चिकित्सा संस्थान अपनी योग्यता से परिपूर्ण होकर सेवा कर पा रहे हैं। हिमाचल में सरकार और समाज की योजनाओं और आवश्यकताओं में अंतर को समझना होगा। यही अंतर कई स्कूल-कालेजों में छात्र तादाद में झलकता है, तो तमाम सुविधाओं के बावजूद निजी अस्पतालों के बाहर पहुंचे मरीजों के हाल से मिलता है। जाहिर तौर पर हिमाचली उत्कृष्टता के फलक पर निजी क्षेत्र का उत्थान स्पष्ट है, फिर भी सार्वजनिक क्षेत्र को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती है। सरकार को समाज की अपेक्षाओं और जरूरतों में अंतर पैदा करना होगा। अपेक्षा तो अब भी यही रहेगी कि सरकारी स्कूल-कालेजों और अस्पतालों की संख्या बढ़ती रहे, लेकिन जरूरत ऐसे शिक्षण संस्थानों की रहेगी जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो। यह ऐसी अभिलाषा भी हो सकती है जो निजी स्कूल का औचित्य ढूंढती है। समाज की बदलती जरूरतें अब शिक्षा-चिकित्सा से कहीं आगे जीवनशैली के बदलते आयाम खोज रही है, अतः हिमाचली योजनाओं का नजरिया भी इसी परिप्रेक्ष्य में बदलाव चाहता है। अब शहरीकरण की कलस्टर प्लानिंग में जीवन के संदेश ऊंचे करने पड़ेंगे, तो यातायात की व्यवस्था को भी विभिन्न कलस्टरों में समाहित करना होगा। कई कार्यालयों का युक्तिकरण तथा सेवा क्षेत्र का नेतृत्व करना पड़ेगा। दरअसल हिमाचल की मांग पर उत्तर खोजती योजनाएं व परियोजनाएं केवल सरकारी नहीं हो सकतीं, अतः निजी क्षेत्र की भागीदारी को समझना होगा। हिमाचल निजी स्कूलों को शिक्षा की विरासत से जोड़कर देखे, तो वहां एक उभरता हुआ प्रदेश भी नजर आएगा। सार्वजनिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल 6127 स्कूलों को बंद होने के कगार पर खड़े होते देखना कतई नहीं हो सकता, बल्कि समूची शिक्षा का मूल्यांकन करते हुए निजी स्कूलों के प्रति भी कृतज्ञता दर्शाने का रहेगा। कहना न होगा कि हिमाचल के सार्वजनिक क्षेत्र के सामने निजी संस्थान अगर सशक्त हो रहे हैं, तो यह बढ़ती हुई मांग की आपूर्ति है। यकीनन सरकारी स्कूल की मांग घटी है और इस स्थिति को नए सिरे से खंगालते हुए प्रबंधकीय और प्रशासनिक तौर तरीके बदलने होंगे।