सार्वभौमिक आय योजना

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

देश की सरकार यदि चाहे तो यूबीआईएस के लिए धन जुटा सकती है। गणित इस प्रकार है। केंद्र सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं पर निम्न प्रकार के खर्च किए जा रहे हैं - खाद्य सबसिडी पर 140000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष, रोजगार गारंटी एवं दूसरी कल्याणकारी योजनाओं पर 136000 करोड़ तथा शिक्षा-स्वास्थ्य पर 134000 करोड़, कुल 410000 करोड़...

चुनाव के इस मौसम में दोनों प्रमुख पार्टियां भाजपा तथा कांग्रेस मतदाताओं को लुभाने वाली घोषणाएं कर रही हैं। पहले भाजपा के वित्त मंत्री ने अंतरिम बजट में ऐलान किया कि हर छोटे किसान के खाते में 6000 रुपए की रकम प्रति वर्ष सीधे डाल दी जाएगी। इसके बाद कांग्रेस ने ऐलान किया कि यदि वह सत्ता में आई, तो गरीब व्यक्ति को यानी केवल छोटे किसान को ही नहीं, बल्कि देश के हर गरीब नागरिक के खाते में 6000 रुपए प्रति माह या 72000 रुपए प्रति वर्ष की रकम सीधे डाली जाएगी, जिससे वे अपनी मौलिक जरूरतों को पूरा कर सकें। दोनों पार्टियों को यह समझ आ रहा है कि सरकारी योजनाएं गरीब को राहत पहुंचाने में सफल नहीं हुई हैं। इस प्रस्तावित नकद ट्रांसफर योजना का एक सीधा लाभ यह होगा कि गरीबी पूरी तरह दूर हो जाएगी, बशर्ते सभी नागरिकों को इन योजनाओं में शामिल किया जाए। ऐसे नकद ट्रांसफर को यूनिवर्सल इन्कम बेसिक स्कीम अथवा यूबीआईएस कहा जाता है। जैसे यदि केवल बीपीएल धारकों को यह रकम दी जाती है, तो यह पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि कई अध्ययन बताते हैं कि तमाम गरीबों के पास बीपीएल कार्ड नहीं हैं। इसलिए यदि यह योजना सभी देशवासियों पर लगाई जाती है, तो गरीबी निश्चित रूप से दूर हो जाएगी।

इस योजना का दूसरा लाभ होगा कि अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। गरीब के पास धन आएगा, तो वह उस रकम से कपड़ा और साइकिल खरीदेगा तथा अर्थव्यवस्था में मांग एवं निवेश का सुचक्र स्थापित हो जाएगा। यही रकम यदि कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से व्यय की जाती है, तो उसके एक हिस्से का रिसाव हो जाता है, जैसे सोना खरीदने में वह रकम देश से बाहर चली जाती है। सीधे नकद देने में यह रिसाव बंद हो जाएगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। तीसरा लाभ यह होगा कि तमाम कल्याणकारी योजनाओं में व्याप्त नौकरशाही के भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी। इन सभी लाभों को देखते हुए देशवासियों को सीधे रकम देने की योजना को लागू करना चाहिए, लेकिन सभी को संशय है कि इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी। इस संशय को बल इस बात से भी मिलता है कि विश्व में केवल एक देश ने यूबीआईएस को प्रयोग के रूप में लागू किया गया था - फिनलैंड में। हालांकि फिनलैंड ने इस योजना को केवल दो साल बाद ही त्याग दिया, क्योंकि इस योजना को लागू करने का आर्थिक भार बहुत अधिक था, लेकिन मेरे गणित के अनुसार अपने देश में यह भय निर्मूल है, चूंकि हम बहुत बड़ी रकम कल्याणकारी योजनाओं पर व्यय कर रहे हैं। देश की सरकार यदि चाहे तो यूबीआईएस के लिए धन जुटा सकती है। गणित इस प्रकार है। केंद्र सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं पर निम्न प्रकार के खर्च किए जा रहे हैं - खाद्य सबसिडी पर 140000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष, रोजगार गारंटी एवं दूसरी कल्याणकारी योजनाओं पर 136000 करोड़ तथा शिक्षा-स्वास्थ्य पर 134000 करोड़, कुल 410000 करोड़। इस रकम का मेरे आकलन में आधा यानी 205000 करोड़ प्रशासनिक खर्च में जाता है। शेष का आधा यानी 102000 करोड़ बीपीएल परिवारों और शेष का आधा 102000 करोड़ एपीएल परिवारों को मिलता है, जिसका बीपीएल को नुकसान होगा। केंद्र सरकार द्वारा ही फर्टिलाइजर एवं पेट्रोलियम पर 100000 करोड़ रुपए की सबसिडी हर वर्ष दी जा रही है। इसे समाप्त कर दिया जाए, तो मेरे आकलन में बीपीएल परिवारों को इसका पांच प्रतिशत यानी 5000 करोड़ का नुकसान होगा। फर्टिलाइजर तथा पेट्रोलियम की सबसिडी में उनका हिस्सा कम होगा, क्योंकि इन माल की खपत बीपीएल द्वारा कम की जाती है। शेष 95000 करोड़ का घाटा एपीएल परिवारों को होगा। सरकार कुछ रकम अतिरिक्त टैक्स लगाकर अर्जित  कर सकती है। अपने देश में पेट्रोल और डीजल की 14532 करोड़ लीटर की खपत होती है। इस पर 10 रुपए प्रति लीटर का यूबीआईएस सैस लगा दिया जाए, तो 140000 करोड़ रुपए अर्जित हो सकते हैं। इसी प्रकार जीएसटी पर यदि 10 प्रतिशत यूबीआईएस सैस लगा दिया जाए, तो 120000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष अर्जित हो सकते हैं। इन दोनों मदों पर 260000 करोड़ रुपए अर्जित किए जा सकते हैं। इसमें बीपीएल पर भार 10 प्रतिशत यानी 26000 करोड़ रुपए पड़ेगा, जबकि एपीएल पर भार 90 प्रतिशत यानी 234000 करोड़ पड़ेगा, क्योंकि पेट्रोल एवं अन्य वस्तुओं की अधिकाधिक खपत एपीएल परिवारों द्वारा ही की जाती है। केंद्र सरकार द्वारा आयकर पर यदि 10 प्रतिशत का यूबीआईएस सैस लगा दिया जाए, तो 100 करोड़ रुपए अर्जित किए जा सकते हैं, जिसका पूरा भार एपीएल परिवारों पर पड़ेगा, क्योंकि बीपीएल परिवार आयकर नहीं देते हैं। उपरोक्त गणना के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा 410000 करोड़ विभिन्न सबसिडीज को समाप्त करके, 100000 करोड़ फर्टिलाइजर एवं पेट्रोलियम सबसिडी समाप्त करके, 260000 करोड़ रुपए पेट्रोल एवं जीएसटी पर सैस लगाकर और 100000 करोड़ इन्कम टैक्स पर सैस लगाकर अर्जित किए जा सकते हैं। यह कुल मिलाकर 870000 करोड़ होता है। इस रकम से 135 करोड़ लोगों को 6000 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष दिया जा सकता है। यदि पांच लोगों का परिवार मानें, तो यह रकम 30000 करोड़ रुपए प्रति परिवार प्रति वर्ष अथवा 2500 रुपए प्रति परिवार प्रति माह बैठती है। इस रकम को देने में सरकार पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा।

अब देखें कि बीपीएल परिवार पर इस योजना का क्या प्रभाव पड़ेगा। बीपीएल को कल्याणकारी योजनाओं के निरस्त होने से 102000 करोड़ की हानि होगी। फर्टिलाइजर एवं पेट्रोलियम सबसिडी समाप्त करने से 5000 करोड़ की हानि होगी। पेट्रोल एवं जीएसटी पर यूबीआईएस सैस लगाने से 26000 करोड़ की हानि होगी। कुल 133000 करोड़ की हानि होगी। इसके सामने यूबीआईएस से बीपीएल परिवारों को कुल 870000 करोड़ का एक-तिहाई यानी 287000 करोड़ रुपए का लाभ होगा। इस प्रकार बीपीएल परिवारों को 154000 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ होगा। एपीएल के लिए भी यह सौदा लाभ का है। उन्हें विभिन्न सबसिडीज को समाप्त करने से 102000 करोड़ रुपए की हानि होगी।  फर्टिलाइजर एवं पेट्रोलियम की सबसिडी को समाप्त करने से 95000 करोड़ रुपए की हानि होगी। पेट्रोल और जीएसटी पर यूबीआईएस सैस से 234000 करोड़ की हानि होगी और इन्कम टैक्स पर सैस लगाने से 100000 करोड़ की हानि होगी।

कुल हानि 531000 करोड़ होगी। इसके सामने 870000 करोड़ रुपए की कुल यूबीआईएस राशि में इनका दो-तिहाई हिस्सा होगा, यानी इन्हें 574000 करोड़ रुपए मिलेंगे। इस प्रकार इन्हें भी 43000 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ होगा। अंतिम आकलन है कि केंद्र सरकार अपने ही बल पर यूबीआईएस को लागू कर सकती है। वित्त मंत्री ने जो छोटे किसान को सीधे रकम देने का वादा किया है, उसका विस्तार करना चाहिए। कांग्रेस को  यूबीआईएस को केवल गरीबों पर लागू करने के स्थान पर संपूर्ण जनता पर लागू करना चाहिए।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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