Monday, June 01, 2020 02:30 AM

साहित्यकार के अनेकानेक सरोकार

डा. विनोद प्रकाश गुप्ता

मो.-9811169069

मैं और मेरा परिवार कोरोना त्रासदी के चलते अजीबोगरीब परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हैं। बेटे की नई नौकरी मुंबई से चंडीगढ़ हुई तो मेरी पत्नी, बेटा और मैं, बाकी परिवार बहू, दोनों पोतियां बेटी के घर मुंबई छोड़ कर चंडीगढ़ आ गए। बेटा अपने हेडक्वार्टर गुरुग्राम चला गया और हम शिमला आ गए यह सोच कर कि 22 मार्च को चंडीगढ़ पहुंच जाएंगे। पर 22 मार्च को भारत में लॉकडाउन के साथ ही सभी राज्यों में कर्फ्यू लग गया और आज हम विभिन्न जगहों में कैद हुए बैठे हैं और बेटे के सामान का ट्रक राजस्थान की सरहद पर खड़ा है। यह अभूतपूर्व परिस्थिति और ऊपर से जानलेवा कोरोना का भय बहादुर से बहादुर व्यक्ति को भी चिंतातुर कर सकता है और कर रहा है। यही समय है जब मेरे बच्चों ने मोबाइल पर मेरी पत्नी और मेरे लिए हुक्मनामा जारी कर शिमला रहने का आदेश जारी कर दिया क्योंकि हिमाचल सबसे सेफ राज्य है। बेटी-बेटे न कहा, ‘पापा आप तो गजलों-कहानियों के पीछे पड़ जाइए और हमारी फिक्र छोड़ दीजिए।’ फिक्र तो नहीं छूटती। अब लॉकडाउन का पहला काम है प्रतिदिन बेटी, बहू, पोतियों से तथा बेटे से स्काइप-फेसटाइम पर सब से नियमित बात करना और हर रोज कुछ न कुछ सार्थक लिखना। इस लेख के माध्यम से मैं सभी प्रदेशवाशियों से अनुरोध करना चाहूंगा कि वे देश-प्रदेश में जहां भी हों, वहीं रहें, घर से बाहर न निकलें क्योंकि कोरोना को हराने का यही एकमात्र उपाय है। दूरी बनाए रखें और संक्रमण से खुद को बचाएं। लॉकडाउन के पहले 12-13 दिन तो हमने घर की सफाई करने की ठानी। हमारे घर में साहित्यिक पत्रिकाओं से अलमारियां भरी पड़ी हैं। जब भी मैं साहित्यिक पत्रिकाएं पढ़ता हूं तो उन्हीं पर अपनी कविताएं, टिप्पणियां भी लिख लेता हूं। मुझे इन पत्रिकाओं से अपनी लिखी कविताओं-गजलों को छांटने व मोबाइल पर फोटो संग्रह करने में तीन दिन लग गए। मेरी पत्नी ने सलाह दी कि हम इतने जतन से सजाई-संवारी इन पत्रिकाओं व अपनी किताबों की लाइब्रेरी का बड़ा हिस्सा अब डीएवी स्कूल टूटू (शिमला) को दान दे दें ताकि हमारी लाइब्रेरी सुरक्षित रह सके और विद्यार्थियों के काम आए। हमें खुशी है कि हमने तकरीबन 300 साहित्यिक व अन्य पत्रिकाएं व लगभग 400 उपन्यास स्कूल को दे दिए। इस कार्य को संपन्न करने में हमें 5 दिन लगे। अभी और भी छंटनी जारी है।

इस दौरान हमने अपनी लिखी डायरियों को खंगाला जहां से हमें स्वरचित पुरानी लिखी कविताएं-गजलें तथा कुछ कहानियां और अंग्रेजी में लिखे दो उपन्यासों के ड्राफ्ट भी मिले जिन्हें हमनें अलग से संजो लिया है। मुझे आशा है कि मैं इस या अगले वर्ष तक एक गजल संग्रह, एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह अपने पाठकों तक पहुंचा सकूंगा। दोनों उपन्यासों के ड्राफ्ट पुनः पढ़ने शुरू किए हैं ताकि जो अब तक लिखा है, उसका अवलोकन किया जा सके। काफी दिनों से मैंने दि ट्रिब्यून चंडीगढ़ से प्रकाशित हो रहे अंग्रेजी अखबार के एडिट पेज के लिए (मेरे 30-40 मिडिल प्रकाशित हुए हैं) मिडिल लेख नहीं भेजा है, उसे भी लिख रहा हूं और शीघ्र भेजने वाला हूं। मैं साहित्यकार होने के साथ-साथ पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, अर्थशास्त्र का विद्यार्थी एवं लेक्चरर रहा हूं। इस नाते आर्थिक मामलों की काफी समझ भी रखता हूं। इस दौरान मैंने साहित्यिक गतिविधियों के अलावा लॉकडाउन के आर्थिक व सामाजिक परिणामों का गहन अध्ययन किया, विभिन्न अखबारों में छपे लेखों को पढ़ा और अनवरत पढ़ रहा हूं। इसके अलावा मैंने कुछ नई गजलें-कविताएं तथा पांच कहानियों के प्रथम ड्राफ्ट पूर्ण किए हैं। एक नई गजल देखें जो वर्तमान परिस्थितियों पर सटीक बैठती है ः

छल रहा है आपका अंदाज़ मुझको

पंख देकर दी नहीं परवाज़ मुझको

जा रहा था छोड़ कर तेरा शहर जब

दे ही देते एक तो आवाज़ मुझको

हार जाऊं मैं हज़ारों बार तो क्या

फिर से करना है नया आग़ाज़ मुझको

मैं पुरानी सोच का हिस्सा नहीं हूं

यूं नहीं मरना है बे-आवाज़ मुझको

मेरी ख़ामोशी फलक को चीर देंगी

मत समझिए तार टूटा साज़ मुझको

घर से बाहर पांव रखने में भी डर है

लील लेगा आसमानी बाज़ मुझको

रोशनी और ताप है दीपक का इनमें

छू गए तेरे ‘शलभ’ अल्फाज़ मुझको।

अंत में मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि इस घोर विपत्ति से भारत व संपूर्ण संसार की रक्षा करेंगे। हम सब अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं, भारत व हिमाचल सरकार के निर्देशों का पालन करें व सरकारों का आर्थिक सहयोग करें तथा विस्थापित होते कामगारों, मजदूरों व अपने घरेलू सहायकों की पूरी-पूरी मदद करें। इस समय यही सच्ची साहित्यिक साधना होगी।