साहित्यिक कांव-कांव के बीच कृष्ण काव

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

हमारे रीढ़विहीन समाज में किसी व्यक्ति का अपने मूल्यों के प्रति ऐसा समर्पण कुछ ऐसे ही अन्य लोगों को सामाजिक तूफानों के मध्य प्रकाश स्तंभ की मानिंद सदा प्रेरणा देता रहता है। जहां तक ब्यूरोक्रेसी का सबंध है तो जिस समाज में आज भी राजा या महाराजा जैसी उपाधियां जीवित हों, वहां सामंती भाव का अस्त होना नामुमकिन है...

बीते शुक्रवार तपोवन स्थित गैर सरकारी संगठन ‘गुंजन’ के परिसर में एक आउट्साइड्र अर्थात महाराज कृष्ण काव की स्मृति में आयोजित समारोह ‘जश्न-ए-काव’ में प्रदेश के लिए बतौर व्यक्ति, प्रशासक और साहित्यकार की गई उनकी सेवाओं के लिए उन्हें याद किया गया। मेरी स्मृति में वह ऐसे पहले प्रशासक हैं, जिनकी प्रशासनिक और साहित्यिक योग्यताओं, दक्षताओं और सेवाओं को याद करने के लिए प्रदेश में कोई साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया गया हो। यह कार्यक्रम और बेहतर हो सकता था अगर किन्हीं दो ऐसे व्यक्तियों को उनकी प्रशासनिक और साहित्यिक योग्यताओं, दक्षताओं और सेवाओं पर बतौर मुख्य वक्ता बोलने के लिए जिम्मेदारी सौंपी गई होती, जो उनके साथ इन क्षेत्रों में उनके संगी रहे होते। इससे उनके जीवन के विविध आयामों के बारे में जानकारी उपलब्ध हो सकती थी। प्रायः देखा गया है कि किसी अदीब की याद में आयोजित कार्यक्रम महज श्रद्धांजलि कार्यक्रम बनकर रह जाते हैं, जहां उपस्थित सभी लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दिवंगत की स्मृति में कुछ न कुछ अवश्य बोलें। इससे मरहूम के व्यक्तित्व का सही अंदाजा नहीं लग पाता। पिछले दिनों डा. पीयूष गुलेरी की याद में उनके परिजनों द्वारा आयोजित समारोह में भी यही मंजर सामने आया। जहां तक महाराज कृष्ण के व्यक्तित्व का सवाल है, ऐसी शख्सियत विरली होती हैं जिन्हें सेवानिवृत्ति के इतने बरसों बाद भी उनके कार्यों के लिए, ऐसे लोगों द्वारा याद किया जाए जो शायद ही कभी उनकी जिंदगी से सीधे बावस्ता रहे हों।

हमारे रीढ़विहीन समाज में किसी व्यक्ति का अपने मूल्यों के प्रति ऐसा समर्पण कुछ ऐसे ही अन्य लोगों को सामाजिक तूफानों के मध्य प्रकाश स्तंभ की मानिंद सदा प्रेरणा देता रहता है। जहां तक ब्यूरोक्रेसी का सबंध है तो जिस समाज में आज भी राजा या महाराजा जैसी उपाधियां जीवित हों, वहां सामंती भाव का अस्त होना नामुमकिन है। ब्यूरोक्रेट्स के चेहरों पर आम आदमी को शायद ही कभी मुस्कान नजर आती हो। लगता है जैसे पूरे देश का भार उनके कंधों पर धरा है। ऐसे में सही मायनों में समाज सेवा कहीं ताक पर धरी रह जाती है। तमाम राजनीतिक उठापटक के मध्य प्रशासनिक कार्यों के लिए वक्त निकालना और उसमें भी अपनी अभिरुचि के मुताबिक समाज तथा अदब की सेवा करना आसान नहीं। ऐसे में अधिकारी या तो प्रशासनिक कार्य भूल जाते हैं या उनका सेवाभाव तहखाने में छिप जाता है। बेहद जहीन काव केवल मंझे हुए लेखक और कवि ही नहीं, ऐसे स्केचर, कलाकार और गायक भी थे, जिन्हें कला और संगीत की गहरी समझ थी। वह जिस भी महकमे में रहे, वहां आज भी उनका प्रकाशपुंज महसूस किया जा सकता है, उनके कार्यों, प्रशासनिक और सुधारात्मक, दोनों की वजह से। हिमाचल में कांगड़ा जिला, शिक्षा विभाग, भाषा एवं संस्कृति विभाग हो या केंद्र में पे-कमीशन, मानव संसाधन और सिविल एविएशन आदि। सिर्फ काम में डूबे रहने का दिखावा करने वाले अधिकारी अपने महकमे में उनकी पोस्टिंग होते ही कहीं और जाना पसंद करते थे, लेकिन काव की विशेषता थी, अपने मातहतों का विषम परिस्थितियों में बचाव। अब ऐसा देखने को नहीं मिलता।

प्रायः न हो सकने वाले कामों के लिए अब जूनियर इसीलिए मना नहीं कर पाते कि उनके सीनियर्स पहले ही पीठ दिखा चुके होते हैं। इसीलिए राजनीतिज्ञ, जिन्हें प्रशासन की समझ नहीं होती, अपने अहंकार में ऐसे कार्यों के लिए जोर देते हैं, जो समाज के हित में कतई नहीं होते।  उनकी लिखी मुख्य पुस्तकों में, ‘कहना आसान है, एन ओएसिस ऑव सोलीट्यूड इन द मल्टीट्यूड ऑव सहारा, कुशाग्रास, इक्ष्वाकू, द सैंडलवुड डोर (काव्य संग्रह), स्नो मैन (कहानी संग्रह) लुकिंग क्लोजली एट ॐ, लाइफ इज ए स्क्विर्ल, ब्यूरोक्रेसी गेट्स क्रेजियर, कश्मीर एंड इट्स पीपल्स (संपादन), एन आउट्साइडर ऐवरीवेयर (आत्मकथा), आसमान नहीं गिरते (उपन्यास), द साइंस ऑव स्पिरिचुएल्टि, काव कॉव सिली प्वाइंट’ आदि प्रमुख हैं। जहां तक बेहद सौम्य, मृदुभाषी, मिलनसार और चेहरे पर हर पल फकीराना मुस्कराहट लिए काव साहिब का हिमाचल में अपने को आउट्साइड्र मानने का प्रश्न है तो मैं उनसे इस बात पर इत्तिफाक नहीं रखता कि हिमाचल उन्हें आउट्साइड्र मानता था। क्योंकि कश्मीर में आतंकवाद फैलने के बाद हिमाचल में रहने आए कश्मीरियों को हिमाचली दिल से अपना चुके हैं, चाहे वह कांगड़ा के वरिष्ठ पत्रकार और समाज सेवी अशोक रैना हों, धर्मशाला की शिक्षिका राका कौल हों या फिर अध्यात्म में विचरने वाले योल के समाज सेवी भूषण। अगर वह अध्यात्म की परिभाषा में अपने को आउट्साइड्र मानते रहे हों, तब भी उनसे सहमत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इस रंगमंच को अपना समझकर ही हम अपनी भूमिका निभा सकते हैं, जो उन्होंने बखूबी निभाई। भगवान ऐसे ऊर्जावान व्यक्तित्व को समय-समय पर प्रदेश में भेजता रहे। आमीन!

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