Thursday, September 19, 2019 10:11 PM

साहित्य की दलाली खाता व्यंग्य

व्यंग्य की अपनी रफ्तार, अपनी लताड़ है, इसलिए बिना कोसे ही जब विषय की वेदना कहीं खुद पर कटाक्ष करे, तो सहजता से कही गई बात भी मारक होती है। सवाल ‘आओ दलाली खाएं’ के संदर्भ में उठते हैं और लेखक अशोक गौतम का व्यंग्य कौशल हमारे आसपास के सच को कानों में सूई की तरह डाल देता है। चुनाव के मौसम में उनके संवाद की परिस्थिति को ‘मैं आया, मैं आया - वोटां वालिए, बंधुओं के लिए खुशखबरी व हम होंगे कामयाब’ में समझा जा सकता है। लेखक ने वोट की मर्यादा में पिलपिलाते लोकतंत्र की पृष्ठभूमि खंगाली तो उल्लू बनने और बनाने की प्रतियोगिता में हम सभी साक्ष्य बन जाते हैं।

दल-बदलुओं की बदबू से भरी राजनीति में अशोक गौतम ने अपने तरीके से प्रहार किए हैं। दफ्तरी माहौल के खाकों से उभरती हास्य भरी पीड़ा का किस्सा जब ‘सफल नौकरी परम रहस्य’ बनकर सामने आता है, तो बॉस के सामने अपनी हार में जिंदगी चुनना और फिर सहज-सरल भाव में ‘हारने का क्या लोगे’ के तहत विवशताओं का गुलदस्ता करीने से सजा देना, लेखकीय अवलोकन की निरंतर परिपाटी है। ‘खुद को जस्टिफाई करिए ना’ में लेखक ने अखबारी पत्रकारिता की तस्वीर उतार कर पाठक के गुस्से से व्यंग्य यूं कसा, ‘हर समाचार के पीछे पुलिस वालों का हाथ होता है।’ कहीं अंतरंग से निकला संवाद, ‘टोले से जा रहे वो’ पर मेहरबान होता है। संग्रह में पाठक अपने जीवन की विडंबनाओं को हंसते-खेलते, लेकिन कहीं इनसानी फितरत को खुरचते मुहावरे चुनते अशोक गौतम की लेखकीय बानगी, ‘साहब ने मेरी टेबुल पर फटी फाइल रखी और वैसा ही फटा सा चेहरा बनाया। काम निकालने के लिए जितनी तरह का अभिनय करो कम’ में कहीं हम सभी खड़े हैं। लेखक के भीतर की खामोशियां जब व्यंग्य से टूटती हैं, तो हकीकत के सूचनापट पर लिखे गए शब्दों को सहजता से परोसते हुए 51 अध्याय पूरे हो जाते हैं। इस तरह ‘आओ दलाली खाएं’ में भरपूर सामग्री है जो लेखक को शरद जोशी की तहजीब में जीते हुए देखती है। सियासत की टोकरी में लड्डू हों या सत्ता के घुटनों का दर्द, संग्रह के बीचोंबीच पाठक अपना पक्ष खोज लेगा। देश की खबरों से व्यंग्य चुनना कितना आसान है, इसी की आभा में संयोजित सामग्री सच्ची राष्ट्र भावना पेश करती है, तो लेखकीय तटस्थता यूं जाहिर होती है, ‘तू सच्ची चुनाव लड़ रहा है?’ ‘हां तो, नहीं तो क्या मेरे को पागल कुत्ते ने काटा है जो खद्दर पहनूं।’ भारत के नाम चिट्ठी में, ‘हर गली में रोज निहत्थे गांधी मारे जा रहे हैं’, तो हे बिचौलिए, तुझे प्रणाम! में ‘ज्यादा मत बोल। खेल दिखाने से भी जाएगा। तू मीडिया नहीं, जमूरा है’ अभिव्यक्ति का खुलापन साझा करता है।

मैं-सूअर मौसेरे भाई में दोस्ती सूंघती कलम, ‘यार मियां - तुम सच्ची बुरा मान गए, उनकी सरकार से मैंने वर्षों में कुछ और चाहे न सीखा हो परंतु रूठों को मनाना अवश्य सीख लिया है’ जैसे संवाद से आजादी के माहौल की परख होती है। डायरी छुपा के रखना में दो अक्सों पर लेखकीय चुंबक इनसानी रोशनी में उम्र और हालात की अभिव्यक्ति लिखता है, तो ‘लागा लेखन का रोग’ में लेखक संप्रदाय की बेडि़यों तथा तलवों की पीड़ा को घर के भीतर कितनी अप्रासंगिक ठहरा दी जाती है, इसका बखूबी जिक्र है। संग्रह में, सब लापता है, बिदाउट बैक, हैडेक ही हैडेक, पीछा छूट लाखों पाए, तौबा मेरी तौबा, साहब की बगल, त्राहिमाम! त्राहिमाम!! रिटायर होने वाले - तेरा खुदा हाफिज व छपने का असाध्य रोग इत्यादि लेख अपने विषयों की प्रभावशाली प्रस्तुति बनाते हैं। अंत में व्यंग्यकार यह प्रश्न छोड़ जाता है, ‘हे साहित्यकार बंधु! जब तुम ही रचनाओं के पारिश्रमिक से अपना जीर्णोद्धार नहीं कर पाए तो इस लुच्चे-लफंगे समाज का क्या खाक होगा।’ 

-निर्मल असो