Monday, June 01, 2020 02:18 AM

साहित्य से किनारा करते युवा: कारण-निवारण

मदन हिमाचली, मो.- 9816002522

हिमाचल प्रदेश में स्तरीय साहित्य सृजन किया जा रहा है। देवभूमि हिमाचल के साहित्यकार संस्कृत, हिंदी व पहाड़ी में प्रचुर मात्रा में सृजन कर रहे हैं। लेकिन इतना होने के पश्चात भी युवाओं तथा बाल साहित्य का अभाव है। आज का युवा वर्ग बाजारू और अश्लील साहित्य चाहता है या वे मात्र पाठ्यक्रम तक सीमित हैं। इतना ही नहीं, परीक्षाओं संबंधी पुस्तकों से युवा वर्ग बाहर नहीं निकल पा रहा है जिससे श्रेष्ठ साहित्यिक पुस्तकें मात्र पुस्तकालयों तक सीमित रह गई हैं। बड़ा संकट तो यह है कि अभिभावक भी अपने बच्चों में पढ़ने या श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने के संस्कार पैदा नहीं कर पा रहे हैं। आज महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह श्रेष्ठ संस्कारयुक्त साहित्य पढ़ने का अभाव है। आज प्रमुख रूप से साहित्यकारों व शिक्षाविदों को यह चिंतन करना चाहिए कि बाल साहित्य को सरल, संस्कारयुक्त बनाकर और पाठ्यक्रम में मूलभूत परिवर्तन करके उसे पाठ्यक्रम में समाहित करें ताकि भारत देश के भविष्य को संवारा जा सके। युवाओं के लिए ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए जो ज्ञानवर्धन के साथ-साथ प्रतियोगिताओं में भी काम आ सकें और श्रेष्ठ गुणों का समावेश भी करवा सकें।

साहित्य समाज का वह दर्पण है जो परिवेश के यथार्थ को दिखाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सदियों से साहित्यकारों ने कविता, कहानियों, नाटकों तथा व्यंग्यों के माध्यम से सामाजिक परिवेश में फैली विषमताओं को बड़ी सहजता के साथ आईना बनकर सामने लाने का प्रयास किया है, वह चाहे राजा-महाराजाओं का दरबार हो या लोकतांत्रिक व्यवस्था हो। साहित्यकार में वह अद्भुत क्षमता है कि वह कागज, कलम और विचाराभिव्यक्ति के माध्यम से अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर व्यवस्था को सही दिशा में लाने का प्रयास करता रहा है। आजादी के इन 73 वर्षों में हिमाचल प्रदेश में भी लगातार साहित्य सृजन किया जा रहा है। प्रदेश के 12 जिलों में हिंदी के अलावा लोक भाषा में भी साहित्य सृजन किया गया। सामाजिक परिवेश का सही चित्रण दिखाने के प्रयास किए जाते रहे हैं। स्वतंत्रता से लेकर आज तक के साहित्य सृजन पर यदि नजर दौड़ाएं तो स्तरीय साहित्य प्रदान करने के प्रयास साहित्यकारों द्वारा किए गए हैं। लेकिन आधुनिकता की आड़ में पाश्चात्य सभ्यता के अंधाधुंध अनुकरण के कारण युवाओं का रुझान साहित्य सृजन के प्रति उतना नहीं हो पाया है जितना होना चाहिए था।

साहित्य के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए अध्यापकों, अभिभावकों और साहित्यकारों के समन्वित प्रयास इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। युवाओं की अभिरुचि के उन्नयन और सही दिशा में परिष्कृत करने के लिए युवा मनोविज्ञान की गहरी समझ के साथ उनकी जरूरतों के अनुरूप साहित्य की विविध विधाओं में सृजन कर रचनात्मक साहित्य के प्रति उन्मुख किया जा सकता है। इसके अलावा बाल साहित्य भी इतना अधिक नहीं लिखा गया कि बच्चों में लेखन के संस्कार उत्पन्न हो सकें। हमारे प्रचार-प्रसार, फिल्मों के अंधानुकरण के कारण साहित्य और पाठकों के बीच खाई देखी जा सकती है। इसका कारण यह भी है कि बच्चों और युवाओं के कोमल मन पर छाप छोड़ने वाला सृजन नहीं हो पाया। या युवा वर्ग के पठन-पाठन का आधार केवल परीक्षा पास करने तक की सीमाओं तक रह गया है। अगर उनमें साहित्य को प्रिय बनाना हो तो आज जरूरत इस बात की है कि उनमें रुचि पैदा करने वाला साहित्य रचा जाए। ऐसा साहित्य विशेष रूप से रचा जाए जिसे वे अपने साथ का साहित्य समझें। युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित करना होगा कि वे केवल अपने सिलेबस तक सीमित न रहें।