सिजोस्कीजोफ्रेनियाई दोस्त

अशोक गौतम

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कल अपने सिजोस्कीजोफ्रेनियाई दोस्त बड़े दिनों बाद मिले। सरकार उनके कथनानुसार उनकी थी तो तय था उनका सिर उनके असली सिर से ऊंचा होता। जिसकी सरकार में पैठ हो उसे अपना आभासी सिर अपने सिर की वास्तविक सिर की ऊंचाई से कम से कम आधा फुट खींच-खांच कर ऊंचा रखना भी चाहिए। भले ही दिमाग की नसें खिच जाएं। ऐसा न करने पर वास्तविक सिर का अपमान होता है। सरकार का खास होने पर तोहमत लगती है। सरकार के खास होने के बाद भी हम जमीन पर ही रह जाते हैं। जबकि सत्ता  के तथाकथित आसपास तक वालों को जमीन पर रहना राजनीतिशास्त्र में वर्जित माना गया है। झूठ-मूठ को जो सरकार में होने के बाद भी जो सिर की ऊंचाई पहले की तरह तो आपकी काहे की सरकार? लगता है, आप ज्यों सिजोस्कीजोफ्रेनियाई के शिकार हो गप्प मार रहें हों। ‘और दोस्त क्या हाल है?’ वे समाने से आए आसमान में अपना सिर घुसा, तो कल तक के उनके सिर को याद कर हंसी भी आई। सच में देखा जाए तो दूसरा कोई हमारी खिल्ली नहीं उड़ाता! उसमें हमारी खिल्ली उड़ाने की हिम्मत होती ही नहीं। हमें अपने आप अपनी खिल्ली उड़ाने से फुर्सत हो फिर तो हम दूसरों की खिल्ली उड़ाएं। असल में हम ही उहर किसी को अपनी खिल्ली उड़ाने को मजबूर करते हैं-आ दोस्त! मेरी खिल्ली उड़ा। कह मैंने उन्हें पहले की तरह गले लगाने की सोची। यह जानते हुए भी अब वे मेरे पहले वाले दोस्त नहीं। अब वे जरा ऊपर के दोस्त हो गए हैं। वक्त-वक्त की बात है, पहले वे खुद ही मेरे न चाहते हुए भी मेरे गले पड़ जाते थे और आज मैं उनके गले लगने की कोशिश रहा था तो भी वे.... वैसे मैं जानता हूं कि जो-जो मेरे दोस्त समय-समय पर सरकार के साथ चलने में सफल रहे हैं, या जिन्होंने सरकार की टांग में जैसे-कैसे अपनी गली सड़ी टांगें फिट कीं, उनकी गर्दनें इतनी भारी होती रही हैं कि.... भैंसे को भी अपनी गर्दन से मोटा उनकी गर्दन देखकर अपनी गर्दन को लेकर हीनता होती रही है। वह भैंसों के बीच क्यों है? काश! वह भी किसी सरकार के साथ होता! उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। मुझे पता था कि इन दिनों उनकी गर्दन इतनी मोटी हो गई है कि वह उनके चाहने के बावजूद पीछे नहीं मुड़ सकती। मैंने पुराने दिनों के दोस्त को एक बार फिर आवाज दी कि कल को फिर वे होंगे तो यहीं, ‘और दोस्त कैसे हो?’ तब हो सकता है उन्हें मेरी आवाज परिचित सी लगी हो अबके। तभी तो उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपनी गर्दन पीछे की, ‘कौन?’ ‘मैं तुम्हारा तंगियों के समय का वही कुबड़ा सा पुराना दोस्त! तुम बड़े दिनों बाद दिखे तो सोचा कि.... ‘मेरे दोस्त? इन दिनों मैं किसी का दोस्त नहीं, पर हां! मेरे सरकार में होने के चलते सभी मेरे दोस्त बने फिरते हैं,‘ उनमें धीरे-धीरे सिजोस्कीजोफ्रेनियाई के लक्षण दिखने लगे। उनके कहते ही मैं एकदम समझ गया कि इन दिनों वे फिर बड़े मजे से सिजोफे्रनिया  और सिजोस्कीजोफ्रेनिया दोनों के एक साथ फिर शिकार हो गए हैं। फिर बड़ी देर तक वे अपने दिमाग पर ज्यों बड़ा प्रेशर पाने के बाद सोचते बोले, ‘अच्छा तो तुम’ ‘हां मैं!’ लगा इनका सिजोस्कीजोफ्रेनिया अभी कुछ कंट्रोल्ड है। ‘देखो’ मैं भी कितना भुल्लक? हूं! तुम्हारा नाम ही भूल गया। आजकल सरकार के साथ अपने काम ही इतने हैं कि..... अभी वहां मीटिंग अटेंड करनी है, पर दस बज गए। आधे घंटे में..... ‘कल तक सारा दिन सरकारी कुर्सी तोड़ते सरकार को गालियां देने वाले को आज इतना व्यस्त देखा तो मैंने भगवान से प्रार्थना की, ‘हे भगवान मुझे भी सिजोफ्रेनिया दे दे ताकि मैं भी ऐसे दोस्तों से.....‘