Tuesday, March 31, 2020 07:53 PM

सियासी उद्दंडता नहीं कांगड़ा

भावुकता की शिकायत में दर्ज सियासी अठखेलियां अगर कांगड़ा में गोता खा रही हैं, तो माहौल के नथुने जरूर फूलेंगे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने होटल एसोसिएशन के समक्ष कुछ पन्ने उस एहसास के खोल दिए जो वक्त को राजनीतिक पैबंद से अलग करके देख सकते हैं। इसमें कई किंतु परंतु ढूंढे जा सकते हैं या राजनीतिक के मुहाने पर पुनः कांगड़ा का अवलोकन होगा। दरअसल मुख्यमंत्री ने उन तमाम घटनाओं और घटकों का जिक्र किया जो सत्ता के दो सालों में उनके संतुलन की सादगी में छिप गए। बतौर मुख्यमंत्री मलाल इस बात का है कि कांगड़ा में दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खड़ा करके भी जिला की सियासत उनके पीछे खड़ा नहीं हो रही या अपनी पार्टी में जिन्हें वह सीने से लगा रहे हैं, वे भी मैदान में उन्हें अकेला छोड़ रहे हैं। यह दिल से निकली बात या जज्बात की बारात हो सकती है, लेकिन सियासी व्यथा भी है कि प्रदेश को साधने की हर गुंजाइश बिफर जाती है। पाठकों को याद होगा कि हमने दो एक पूर्व ‘नए सिरे से’ के तहत अपने जिक्र को शीतकालीन प्रवास की प्रथा में टटोला था। बेशक मुख्यमंत्री कुछ उसी अदा से एक अभिमान के तहत कुछ शिलान्यास या कुछ उद्घाटन चुन रहे हैं। गदगद माहौल के निशानों में सरकारी पट्टिकाएं कृतज्ञ हो सकती हैं या क्षेत्रीय राजनीतिक की दोपहर में देखने को ‘नजारा’ भी बनेगा, लेकिन इससे हटकर उस निरंतरता की समीक्षा होगी जो सरकार को अपने करीब अनुभव करने की कवायद है। ऐसे में जनमंच तो पूरे प्रदेश में हो रहे हैं, तो समस्याओं के समाधान क्यों अचानक मुख्यमंत्री को अलग से सोचने पर विवश करते हैं। जनमंच में कांगड़ा या कांगड़ा के जनमंच में शीतकालीन प्रवास का मूड बताना होगा। सरकार केवल सत्ता नहीं कि केवल मंच, उद्घाटन या शिलान्यास के अवसर पर ही दिखाई दे। यह राजनीतिक नियुक्तियों के असर या सुशासन के जिक्र में आम जनता की राय हो सकती है। बेशक लोग खिलखिलाते नहीं और न ही मुस्कराते हैं या सरकार अपनी कसौटियों पर कुछ नया करने की दिली ख्वाहिश रखती हो, लेकिन कारवां अपनी मंजिल पर ही मुकम्मल होगा। इसलिए संवाद और विवाद के बीच ही सरकार की कार्यशैली का उत्तीर्ण पक्ष देखा जाता है। जरूरी यह नहीं कि मुख्यमंत्री की हाजिरी में ही जनता सरकार को देखे, लेकिन यहां मंत्रियों के उदाहरण कारगर नहीं हो रहे। एक-एक करके विभाग केवल मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्रों के लाभ ही देख रहे हैं। अगर धर्मशाला के जोनल अस्पताल में कोई एमडी डाक्टर नहीं या इसी तरह विशेषज्ञों के कक्ष पर ताले लगे हैं, तो सरकार के एहसास को परखा जाएगा। सरकार के हस्ताक्षर तो हर अदने से कर्मचारी की कार्यशैली में देखे जाएंगे। ऐसे में मुख्यमंत्री को साहस करके एक बार मंत्रिमंडल को पूरी तरह फेंट देना चाहिए। विभाग बदल देने चाहिएं और उन मंत्रियों का कार्यभार बढ़ाना चाहिए, जो अपने दायरे से बड़ा कार्य कर पाने में सक्षम हैं। सत्ता के कसूर में हिमाचली जनता हमेशा लाभार्थी बनी रहना चाहती है, इसलिए सरकारों के समक्ष आंदोलनों की जिरह सिर्फ कुछ पाने की अभिलाषा है। हम पूरे प्रदेश की व्यथा को क्षेत्रों में बांट कर न तो हल कर सकते हैं और न ही राजनीति की दीवारें आज तक की खिन्नता को रोक पाईं। हमें यह भी समझना होगा कि वाईएस परमार से जयराम ठाकुर के सफर तक हर बार कांगड़ा क्यों चर्चित हो जाता है। स्व. पंडित शालिग राम शर्मा से राजन सुशांत के कंधों पर आखिर ऐसा आक्रोश क्यों टंगा रहता है। क्यों अपनी राजनीतिक क्षमता व व्यक्तित्व की अपार संभावना के बावजूद मेजर विजय सिंह मनकोटिया अंत में असफल रहे। ऐसे में क्या शांता कुमार के बाद कांगड़ा की हस्ती केवल सत्ता के खिलाफ उद्दंडता ही बनी रहेगी या यह बेकसूर होने की सजा है। जाहिर है हिमाचल का राजनीतिक गणित इस क्षेत्र को अंगीकार करता है, लेकिन एक लंबा विराम यहां के नेताओं को विचलित भी कर रहा है। विडंबना यह भी रही है कि कांगड़ा के नेताओं के बीच सत्ता की कुंडियां अड़ी रहीं और विवाद आपसी तनातनी में मशगूल हो गए। मसला किशन कपूर बनाम सरवीण चौधरी हो या अतीत में सुधीर शर्मा बनाम जीएस बाली रहा हो, घाटे में कांगड़ा का अस्तित्व ही रहा। यह मर्ज मंडी में भी रहा, लेकिन जयराम ठाकुर के रूप में अब क्षेत्रीय राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को खुद को साबित करने का अवसर मिल गया। ऐसे में जयराम ठाकुर को हिमाचल के बीचोंबीच विराजित अपनी सत्ता विरासत को शिमला व कांगड़ा को दो बाजुओं के रूप में इस्तेमाल करना होगा। कुछ असंतुलन अगर है, तो इसे महसूस करते हुए नए  विजन को आगे बढ़ाना होगा। सरकार के मुखिया के सामने प्रदर्शन होंगे, सियासी विवाद उठेंगे और भीतरी मतभेद भी होंगे, लेकिन राजनीति केवल साधना नहीं साध्य प्रतिफल का वर्णन है। प्रदेश की मुख्यधारा का सामाजिक पक्ष ऐसे समीकरणों को हर दिन खोजता है, जो सुशासन को सक्षम बनाएं और जहां सरकार होने का सबब समझ आए।