Saturday, April 20, 2019 01:57 PM

सिर्फ सिद्ध करने की जिद्द

भारत भूषण ‘शून्य’

स्वतंत्र लेखक

जब जिद्द यह हो जाए कि हमें सब सिद्ध करना है जो हमारा मन कहता है तो जान लीजिए कि हम आंतरिक गुफाओं के वक्रजाल में फंस गए हैं। जीवन किसी खास आदर्श या विशेष आग्रह के आगे गुलामी करने के लिए अस्तित्व में नहीं आया। इसकी अपनी महक है। अपनी भूमिका जो इस भूमि को सुंदर बनाने के लिए कर्मशील है बिना किसी औचित्य के। बिना किसी कारण के। अगर कारण के मकड़जाल में पड़ गए तो यह अंतहीन गंतव्यों से हमें धकाकर छोड़ेगा। जो है ही अपने आप के लिए। जो है ही अपने आप से संवाद के लिए, उसे दूसरों के भरोसे डाल देने से इसका भूलभलैया की गिरफ्त में आना निश्चित हो जाता है। सीधे, सरल और साधारण होने की इसकी सहजता में ही यह पूर्ण और अपूर्ण है। हमारी कलुष मांगें इसे विकट और दुरूह बना डालती हैं। सपनों की चोट से इसे धराशायी करने की सनातनता सदियों से जारी है। अबाध क्रिया के इस रसायन ने इसे और सतही और उथला बनाया है। कथित विकास की मूर्तिमान प्रतिबद्धता के कारण हम मूर्तिवत होते जा रहे हैं। खुद को दुनिया का केंद्र बिंदु मान लेने का जुनून हम पर तारी है जैसे हमारे बिना इस कायनात का अस्तित्व नहीं होगा। जैसे हमारी सांसों के उच्छवास से यह जीवित है। अपनी सांसों का भरोसा नहीं, लेकिन सांस थामे दूसरों को बदल डालने का जोश भारी है।

हालात से उपजा सम्मान उस खुले नीड़ की तरह है जो बारिश की एक मार से ध्वस्त हो जाता है। पद के लिए खुद की काट-छांट करने से पद की गरिमा को आंच आ ही जाएगी। जिंदगी के वजूद की विस्तीर्णता को आभासी फ्रेमों में बांधने की कला ने कभी किसी का साथ नहीं दिया। खुद की क्षणभंगुरता को पकड़े बिना इस दुनिया का कोई सिरा पकड़ में नहीं आने वाला। इसकी तरलता को किसी बांध से नहीं बांधा जा सका। सिद्ध करने की किसी जिद्द के आगे यह जिंदगी हमेशा ताल ठोकती आई है।