Monday, November 19, 2018 04:33 PM

सिसकता बड़ा भंगाल तड़पता गिरिपार

हिमाचल के सबसे बड़े जिला कांगड़ा का दुर्गम क्षेत्र बड़ा भंगाल और सिरमौर जिला का दूरवर्ती इलाका गिरिपार जनजातीय हक के लिए लड़ रहे हैं। प्रदेश में ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जो आज भी शेष विश्व से साल भर कटे रहते हैं। न अस्पताल, न डिस्पेंसरी, न स्कूल, न आंगनबाड़ी, न बिजली, न पानी, न रास्ता, न सड़क,  सिर्फ है तो दिक्कतों का अंबार। क्या है दोनों का हाल देखें इस बार का दखल...

बड़ा भंगाल और गिरिपार क्षेत्र की परिस्थितियां विकट हैं। बेशक यहां के लोगों को इन परिस्थितियों में रहने की  आदत हो चुकी हो, मगर इनका भी हक है कि वे भी सामान्य जीवन व्यतीत करें, जिनके बारे में कोई नहीं सोच रहा। राजनीतिक मंशा भी इनको इनका हक दिलाने में कामयाब नहीं हुई है। बार-बार इन क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित करने की मांग उठ रही है, लेकिन आज तक इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। एक तरफ ये क्षेत्र हैं जिन्हें ट्राइबल के दर्जे की जरूरत है और दूसरी तरफ कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें ट्राइबल का दर्जा तो मिल चुका है, लेकिन वहां के लोग यहां रहते ही नहीं और दूसरे स्थानों में जाकर सुख-सुविधाएं भोग रहे हैं। राजनीतिक दल इन क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित करने के वादे तो करते हैं और  बयानबाजी भी काफी होती है, परंतु नतीजा कुछ नहीं निकल सका। अभी भी इनकी मांग जस की तस है।

बड़ा भंगाल पर कोई स्टडी ही नहीं

दूसरी तरफ बड़ा भंगाल जिसकी और भी अधिक विकट परिस्थितियां हैं, वहां के लिए अभी तक अध्ययन भी नहीं हो सका है। प्रदेश सरकार का जनजातीय विकास विभाग ट्राइबल घोषित करने की मांग को लेकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एक विशेष अध्ययन करवाता है, जिसमें क्षेत्र की परिस्थितियों, वहां की संस्कृति, लोगों के रहन-सहन और जनसंख्या को आधार माना जाता है, जिसके साथ लोगों की आर्थिक स्थिति देखते हुए उसे ट्राइबल घोषित किया जाता है। बड़ा भंगाल को राशन पहुंचाने के लिए भी सरकार को हेलिकाप्टर तक का सहारा लेना पड़ता है। इस बार हेलिकाप्टर के माध्यम से वहां राशन पहुंचा, जिससे लोगों का आने वाले समय का गुजारा चलेगा। बर्फबारी के दौरान इन क्षेत्रों में बिजली तक की व्यवस्था नहीं होती। यहां सोलर लाइट सिस्टम के लिए सरकार प्रयास कर रही है। इस तरह की कठिनाइयों के बावजूद यहां के लोगों को आज तक ट्राइबल का दर्जा नहीं मिल सका, जहां के युवा इसके हकदार हैं।

विशेष अध्ययन में ट्राइबल की संभावनाएं

सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र को ट्राइबल का दर्जा दिलाने के लिए काफी कसरत हो चुकी है। इसके लिए एक विशेष अध्ययन करवाया गया है, जिसमें गिरिपार को ट्राइबल घोषित करने की सभी संभावनाएं सही पाई गई हैं। इस रिपोर्ट के बाद ट्राइबल के दर्जे के लिए प्रदेश सरकार ने मामला केंद्र सरकार को भेजा है। केंद्र सरकार के जनजातीय आयोग व संबंधित मंत्रालय से मामला उठाया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मुद्दे पर बात हुई है, वहीं भाजपा के सांसद लगातार दिल्ली में यह मामला उठा रहे हैं। लोकसभा में भी गिरिपार को ट्राइबल के दर्जे पर चर्चा हो चुकी है, परंतु हैरानी की बात है कि आज दिन तक कोई फैसला केंद्र सरकार इस पर नहीं ले पाई है।

राशन पहुंचाना चुनौती

बड़ा भंगाल में रहने वाले लोगों का रहन-सहन बड़ा ही साधारण है। बड़ा भंगाल में रहने वाली आबादी का गुजर बसर भी प्रकृति के संसाधनों के अलावा खेती पर निर्भर करता है। यहां लोग विभिन्न सब्जियों की खेती करते हैं। इतना ही नहीं गांव में रहने वाले लोगों को सरकार तथा जिला प्रशासन द्वारा भी राशन उपलब्ध करवाया जाता है। गर्मियों के मौसम में गांव के लोगों को आवश्यक खाद्य सामग्री की उपलब्धता करवाई जाती है, लेकिन मौसम खराब होने की स्थिति में गांव तक राशन पहुंचाना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। वहीं गांव के लोग पशुआें को पालते हैं।

जहां सुख-सुविधाएं वे वहां रहते ही नहीं

एक तरफ प्रदेश का गिरिपार और बड़ा भंगाल ट्राइबल दर्जे की मांग कर रहा है, तो दूसरी तरफ जिन क्षेत्रों को यह दर्जा मिला है, वहां के लोग दूसरे क्षेत्रों में जाकर सुख-सुविधाएं भोग रहे हैं। उन क्षेत्रों के लोगों को ट्राइबल के दर्जे की जरूरत ही नहीं है बावजूद इसके वे लाभ उठा रहे हैं। भरमौर, लाहुल-स्पीति व किन्नौर को देखें, तो आज वहां के ट्राइबल का दर्जा हासिल लोग कहीं दूसरे स्थानों पर रह रहे हैं। समूचा भरमौर आज कांगड़ा जिला में बसा हुआ है, लाहुल-स्पीति के लोग कुल्लू- मनाली में निवास कर रहे हैं, किन्नौर के लोगों का डेरा शिमला व सोलन में लगा है। ऐसे में इन लोगों को सरकारी सुख-सुविधाओं का लाभ मिल रहा है, लेकिन जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिल पा रहा। कई लोग ऐसे भी हैं, जो अपना ट्राइबल क्षेत्र नहीं छोड़ते, क्योंकि उन्हें वहां रहने का पूरा लाभ मिल रहा है। वे लोग अपनी संस्कृति नहीं छोड़ सकते और उसी रहन-सहन में ढले हुए हैं। गिरिपार और बड़ा भंगाल में सरकारी अदारे की भी भारी कमी है।  यहां सामान्य क्षेत्रों से कोई जाने को भी तैयार नहीं होता। बमुश्किल यहां सरकारी सेवाएं मिल पा रही हैं। ऐसे में वहां की व्यवस्था और परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार को तुरंत इन क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित करना चाहिए। इसके लिए राज्य सरकार को भी गंभीरता से कदम उठाने चाहिएं अन्यथा यहां के लोग अभी और कई साल तक ट्राइबल का अधिकार हासिल नहीं कर पाएंगे।

राजा भगालियां ने रखी थी रानी

बड़ा भंगाल में वर्तमान समय में रह रहे लोगों के अनुसार मानव सभ्यता की कहानी का पुख्ता कोई भी ब्यौरा नहीं है, लेकिन पूर्वजों की सुनाई बातों के अनुसार राजा भगालियां ने अपनी एक रानी को इस दुर्गम क्षेत्र में रखा था और उसकी सेवा के लिए कई परिवार वहां स्थापित कर दिए, जिसके बाद सभी लोग रानी को देवी की तरह पूजते थे और रानी का अपना ही राज पाठ वहां चलता था। रानी की मृत्यु के बाद सेवादार परिवारों के भी आगे अपने परिवार हो गए थे, जिसके बाद लोगों ने जिंदगी वहीं पर व्यतीत करना शुरू कर दी।

लोगों ने ही किया था ट्राइबल दर्जे का विरोध

बड़ा भंगाल क्षेत्र के लोगों को ट्राइबल का दर्जा दिलाने के लिए जब मुहिम शुरू हुई और जनजातीय आयोग ने धर्मशाला के प्रयास भवन में सरकारी अधिकारियों के साथ बैठक की थी। आयोग के सदस्यों ने धर्मशाला के बाद बैजनाथ में भी संबंधित क्षेत्र के लोगों से मिलकर उनके विचार और समस्याएं सुनी थीं। इस दौरान उस क्षेत्र के अनुसूचित जाति के लोगों ने बड़ा भंगाल के लोगों को ट्राइबल का दर्जा देने का कड़ा विरोध किया था। अनुसूचित जाति के लोगों ने यह कहकर आयोग के समक्ष आपत्ति जताई थी कि वहां रहने वाले लोग उन्हें मंदिरों में नहीं जाने देते, पानी के स्रोतों का सार्वजनिक प्रयोग नहीं करने देते। हालात ऐसे हैं कि कुछ रास्तों से भी गुजरने पर आपत्ति जताई जाती है।

गपशप और ताश-पत्ते खेलने में मनोरंजन

पहाड़ों के बीच बह रही रावी के किनारे बसे दुर्गम क्षेत्र बड़ा भंगाल में लोगों को मनोरंजन के कोई भी साधन नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद लोग घरों के रोजाना किए जाने वाले कार्यों से निजात पाकर गांव के मध्य स्थान पर एकत्रित होते हैं। इसमें लोग अपनी मौज-मस्ती की गपशप और ताश-पत्ते खेलकर समय व्यतीत करते हैं।

पता नहीं, दुनिया है कैसी

प्रदेश के अति दुर्गम क्षेत्र बड़ा भंगाल के बुजुर्ग लोगों ने इच्छा जताते हुए बताया कि कुछ समय पूर्व बड़ा भंगाल में डीसी कांगड़ा आए थे, उस समय बुजुर्गों ने इच्छा जाहिर की थी कि उनके लिए एक बार हेलिकाप्टर भेजा जाए और उन्हें एक बार बीड़ या बैजनाथ की दुनिया भी दिखाई जाए। उन लोगों ने बताया कि वे लोगों से सुनते हैं कि दुनिया में कई कुछ है। बुजुर्ग पहाड़ों से निकलकर यह दुनिया देखना चाहते हैं, लेकिन इस दूरदराज के क्षेत्रों के बुजुर्गों की सुनने वाला कोई नहीं है।

ट्राइबल्स की तरह दे रहे सुविधाएं

कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के सांसद शांता कुमार का कहना है कि बड़ा भंगाल गए अभी तो बहुत समय हो गया है, लेकिन बड़ा भंगाल की परिस्थितियों से वह भली तरह से वाकिफ हैं। उस क्षेत्र के लोग अब निचले क्षेत्रों में भी आते-जाते रहते हैं। केंद्र व राज्य सरकार ने बड़ा भंगाल ही नहीं, इस तरह के पिछड़े क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाएं तैयार कर काम शुरू कर दिए गए हैं। दोनों ही सरकारें अंत्योदय की भावना से काम कर रही हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उस क्षेत्र के लोगों की समस्याएं सुलझाने और उन्हें मूलभूत सुविधाएं समय पर देने के लिए सरकार व प्रशासन से कई बार मामला उठाया है, जिसके फलस्वरूप वहां काम भी हुए हैं, लेकिन क्षेत्र इतना दुर्गम और दूरस्थ है कि कमियां रह जाती हैं। क्षेत्र में बिजली, पानी, स्कूल व स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सरकार लगातार प्रयासरत है। इसके बावजूद जो भी कमियां वहां के स्थानीय लोग और प्रतिनिधि बताते हैं उन्हें हल करने के लिए अन्य क्षेत्रों के बजाय पिछड़ा क्षेत्र होने के नाते विशेष योजना के आधार पर काम किया जाता है। सांसद शांता कुमार का कहना है कि बड़ा भंगाल को ट्राइबल क्षेत्रों की तरह ही सभी तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उस क्षेत्र के लोगों के विकास के लिए लगातार प्रयास किए हैं।

केंद्र सरकार देगी राहत

जनजातीय विकास मंत्री रामलाल मार्कंडेय का कहना है कि गिरिपार व बड़ा भंगाल में वाकई परिस्थितियां कठिन हैं। वहां की चिंता प्रदेश सरकार को है, जिसे देखते हुए ही दोनों क्षेत्रों को ट्राइबल घोषित करने का मामला केंद्र सरकार को भेजा गया है। इस पर फैसला केंद्र सरकार को लेना है, जो जल्द ही राहत प्रदान करेगी। इन क्षेत्रों में प्रदेश सरकार सभी तरह की सुविधाएं देने के लिए प्रयासरत रहती है, क्योंकि अभी ट्राइबल में ये एरिया नहीं हैं, इसलिए उनके महकमे की ओर से कोई विशेष कदम यहां नहीं उठाए जा सकते।

चुनाव से नहीं जोड़ा जा सकता मुद्दा

सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र को ट्राइबल घोषित करने को लेकर जितने प्रयास दस साल में हुए हैं, वे लोगों को सामने दिखाई देते हैं। शिमला लोकसभा सीट के सांसद व भाजपा नेता प्रो. वीरेंद्र कश्यप का कहना है कि वर्तमान में हाटी का मुद्दा केंद्र सरकार के पास चर्चा के लिए है। हाल ही में हिमाचल सरकार ने यह मुद्दा केंद्र सरकार को भेजा है तथा केंद्र सरकार इस पर अपनी टिप्पणी कर इसे रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया आरजीआई को भेजेगी। आरजीआई हिमाचल सरकार द्वारा भेजी गई रिपोर्ट का अवलोकन करेगी। उन्होंने कहा कि वह सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र की लगभग सभी पंचायतों का दौरा कर चुके हैं तथा क्षेत्र की भौगोलिक व सभी प्रकार की स्थिति से भलीभांति परिचत हैं। प्रो. कश्यप ने बताया कि गिरिपार क्षेत्र को जोंसार बाबर की तर्ज पर ट्राइबल का दर्जा मिलना चाहिए तथा इस बारे में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा. राजीव सहजल, विधायक सुरेश कश्यप, पूर्व विधायक बलदेव तोमर समेत केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की गई है।

132 पंचायतें छह दशक से कर रहीं संघर्ष

जिला सिरमौर के हाटी समुदाय का मुद्दा छह दशक से भी अधिक समय से दिल्ली सरकार की फाइलों में अठखेलियां खेल रहा है। गिरिपार क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदों पर दशकों से पानी फिर रहा है। जनजातीय क्षेत्र के दर्जे को लेकर हाटी समुदाय के लोग छह दशक से भी अधिक से अपनी मांग प्रदेश व केंद्र सरकार तक पहुंचा रहे हैं, परंतु अभी भी गिरिपार क्षेत्र जनजातीय घोषित नहीं हो पाया है। हाटी समुदाय के करीब पौने तीन लाख लोग हर बार विधानसभा व लोकसभा चुनाव में एक बार अपनी मांग दोहराते हैं तथा उम्मीद की किरण उनको कहीं दूर नजर आती है। हैरानी की बात तो यह है कि पूरा गिरिपार क्षेत्र व उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र दोनों तमाम प्रक्रियाओं में एक साथ पले बड़े हैं तथा दोनों ही क्षेत्रों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियां हू-ब-हू एक समान हैं। उत्तराखंड के जोंसार बाबर की करीब 124 पंचायतें 1967 में ट्राइबल घोषित हो चुकी हैं, जबकि इसके बिलकुल सामांनातर गिरिपार क्षेत्र की 132 पंचायतें अभी भी ट्राइबल के लिए संघर्ष कर रही हैं।

पौने तीन लाख आबादी सुविधाओं से दूर

गिरिपार क्षेत्र करीब 1294 वर्ग मीटर में फैला हुआ है, जिसमें 132 पंचायतों के अंतर्गत करीब पौने तीन लाख की आबादी रहती है। गिरिपार क्षेत्र में अभी भी मूलभूत सुविधाओं से लोग कोसों दूर हैं। क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई व सड़क जैसी सुविधाओं की भारी कमी है। ऐसे में गिरिपार क्षेत्र के लाखों लोग लोकसभा चुनाव को लेकर फिर से आश्वस्त हैं कि केंद्र सरकार इस बार चुनाव से पूर्व गिरिपार क्षेत्र के हाटी समुदाय को ट्राइबल घोषित करेगी।

केंद्रीय गृह मंत्री से दो बार मुलाकात

लोकसभा चुनाव के दौरान वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नाहन प्रवास के दौरान गिरिपार क्षेत्र को पिछड़ा घोषित करने का आश्वासन दिया था, परंतु उस आश्वासन को भी पांच वर्ष का समय पूरा होने को है। गिरिपार क्षेत्र के लोग बेहद ही शांत स्वभाव के हैं। पिछले छह दशक से भी अधिक समय से लगातार इस मांग को प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुंचाया जा रहा है। पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान हाटी समुदाय का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला था। उस दौरान वर्ष 2011 में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के समक्ष भी केंद्रीय हाटी समिति के पदाधिकारियों ने यह मुद्दा उठाया था।

केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है फाइल

प्रदेश सरकार की ओर से गिरिपार क्षेत्र को जनजातीय क्षेत्र घोषित करने की फाइल केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है। केंद्रीय जनजातीय मंत्री इस मामले को लेकर आश्वासन दे चुके हैं, परंतु फाइल फिलहाल केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है। रजिस्ट्रार गवर्नर ऑफ इंडिया आरजीआई के पास भी हाटी समुदाय के लोग गुहार लगा चुके हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, शिमला लोकसभा के सांसद वीरेंद्र कश्यप, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा. राजीव सहजल, पच्छाद के विधायक सुरेश कश्यप, शिलाई के पूर्व विधायक बलदेव तोमर, भाजपा के प्रदेश महामंत्री चंद्रमोहन ठाकुर ने इसी माह दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से गिरिपार के ट्राइबल मुद्दे को लेकर मुलाकात की। इस दौरान प्रदेश सरकार की ओर से भी केंद्र सरकार से गिरिपार को ट्राइबल घोषित करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के नेतृत्व में रखा गया।

जोंसार बाबर जैसा दर्जा मांग रहा हाटी समुदाय

केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष डा. अमी चंद, उपाध्यक्ष सुरेंद्र हिंदोस्तानी व वेद प्रकाश ठाकुर, महासचिव कुंदन सिंह शास्त्री, कोषाध्यक्ष अतर सिंह नेगी, मीडिया प्रभारी उदय राम शर्मा, सिरमौर युवा विकास मंच के अध्यक्ष सुनील ठाकुर व प्रदीप सिंगटा आदि लोगों का कहना है कि आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्व गिरिपार क्षेत्र के पौने तीन लाख लोगों से जुड़ा हाटी समुदाय का मुद्दा केंद्र सरकार को प्रमुखता से विचार में लाना चाहिए। केंद्रीय हाटी समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि जब एक समान भौगोलिक, सांस्कृतिक व सभी प्रकार की बुनियादी सुविधाएं होने वाले उत्तराखंड के जोंसार बाबर क्षेत्र को 1967 में ट्राइबल घोषित किया जा चुका है, तो गिरिपार क्षेत्र के पौने तीन लाख लोगों के साथ आखिर कब तक अन्याय होगा।

स्कूल है...डिस्पेंसरी है...ड्यूटी देना कोई चाहता नहीं

आजादी के सात दशकों के बाद भी बड़ा भंगाल क्षेत्र में सड़क सुविधा न होने के चलते क्षेत्र में शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है। क्षेत्र में भले ही प्रदेश सरकार ने एक हाई स्कूल मंजूर किया है, लेकिन दुर्गम क्षेत्र में कोई भी ड्यूटी को तैयार नहीं होता। इस स्कूल में गांव के करीब दो दर्जन बच्चे विभिन्न कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण करने के लिए रजिस्टर्ड हैं। पालमपुर के एक ही अध्यापक के सहारे स्कूल चल रहा है। साथ ही गांव में पढ़े-लिखे कुछ अन्य लोग भी बच्चों को पढ़ाते हैं। सर्दियों में बर्फबारी होने से पहले इस स्कूल के बच्चे भी बीड़ में पहुंच जाते हैं। बीड़ में ही इन विद्यार्थियों की आगामी पढ़ाई तथा परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा बड़ा भंगाल में किसी तरह का शिक्षण संस्थान नहीं है। दुर्गम क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर केवल एक आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी है और यहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को छोड़कर अन्य कोई भी स्टाफ नहीं है। डिस्पेंसरी में उपलब्ध दवाइयां चपरासी द्वारा ही लोगों को दी जाती हैं, लेकिन गांव में दवाइयों का भी अभाव रहता है, जिसके चलते बीमारी के दौरान क्षेत्र के लोग स्थानीय देवता तथा क्षेत्र में मिलने वाली जड़ी-बूटियों से ही इलाज करते हैं। बुखार तथा जुकाम होने की स्थिति में गुच्छी तथा काले जीरे का काढ़ा होता है। गंभीर बीमारी में मरीज कंधों पर लाए जाते हैं। क्षेत्र की गर्भवतियों के प्रसव मामले गांव की ही एक बुजुर्ग महिला चमारी देवी सुलझाती हैं। पशुपालन विभाग की डिस्पेंसरी का बोर्ड भी गांव में एक कमरे पर टांगा गया है। सर्दियों के मौसम में गांव की अधिकतर आबादी बड़ा भंगाल से पलायन कर बीड़ में रहती है। इस दौरान बड़ा भंगाल में कुछेक ही लोग अपने पशुआें तथा घरों की देखरेख के लिए रुकते हैं। गांव से बाहर अन्य क्षेत्रों में आपात स्थिति के दौरान संपर्क करने के लिए एक सेटेलाइट फोन उपलब्ध है।  यह फोन भी सोलर सिस्टम के माध्यम से चार्ज होता है तथा दिन भर इस फोन को सूरज की रोशनी में चार्ज किया जाता है, जिसके बाद यह केवल दो घंटे के लिए ही प्रयोग किया जाता है। मौसम खराब रहने की स्थिति में फोन चार्ज भी नहीं होता है।

निचली मंजिल में जानवर, ऊपर खुद का बसेरा

बड़ा भंगाल में लोग आज भी दीपक की लौ में जीवन बिता रहे हैं। इस क्षेत्र में 2008 तक एक पावर हाउस चलता था, लेकिन इसकी मोटर खराब होने के बाद प्रशासन ने उसे ठीक करवाकर पावर हाउस चलाने का कष्ट नहीं किया। लोग दस साल से अंधेरे में हैं। इस क्षेत्र में एक सेटेलाइट फोन है, जो कभी प्रशासन तक संदेश पहुंचाने का काम कर जाता है। इस क्षेत्र में लोग सजा ही काट रहे हैं। क्षेत्रवासी आज भी सड़क या पक्के मार्ग से महरूम हैं। इस क्षेत्र में सरकार न तो लोगों को सुविधा प्रदान कर रही है और न ही पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर रही है। इस क्षेत्र में लाखों रुपए की फसलें या फल हर साल गल सड़ जाते हैं। लोगों को आज के दौर में भी अपने घरों में ही जानवर रखने पड़ रहे हैं। इस क्षेत्र में लकड़ी के दोमंजिला मकान होते हैं। नीचे व धरातल की मंजिल में लोग जानवर रखते हैं, तो ऊपर की मंजिल में स्वयं रहते हैं। इस क्षेत्र में एक भी शौचालय नहीं बन पाया है।

मीलों पैदल, न रास्ता, न पगडंडी

बड़ा भंगाल प्रदेश का ऐसा दुर्गम क्षेत्र है, जहां कई किलोमीटर पैदल चलने के बाद एक क्षेत्र ऐसा आता है, जहां दो गांवों में सैकड़ों लोग रहते हैं। इन दोनों गांवों का नाम बड़ा भंगाल है। यहां यही क्षेत्र है, जहां आबादी बसती है। इसके अलावा चारों तरफ पहाडि़यां ही पहाडि़यां हैं। इन पहाडि़यों को चीरते हुए इस क्षेत्र से रावी नदी निकलती है और आगे कुछ किलोमीटर दूर जाकर चंबा पहुंचती है। इस क्षेत्र तक पहुंचने के लिए होली (चंबा), बीड़-बिलिंग (बैजनाथ) और पतलीकूहल के रास्ते अपनाए जा सकते हैं। रास्ता बचा नहीं है, सिर्फ कल्पना और मैप का सहारा बचा है।

सूत्रधार : शकील कुरैशी, पवन शर्मा, सूरत पुंडीर, तनुज सैणी, नितिन राव