Tuesday, June 02, 2020 11:58 AM

सेना में कर्त्तव्य भ्रमण

कर्नल (रि.) मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

पिछले दिनों भारतीय सेना प्रमुख का सेना में सेवाएं देने के इच्छुक सिविलयन के लिए कर्त्तव्य भ्रमण या टुअर ऑफ  ड्यूटी का सुझाव चर्चा का विषय बना हुआ है। सिविलयन को सैन्य जीवन का तजुर्बा देने की भावना से ही सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन की शुरुआत हुई थी। इसमें पांच साल की सेवा के बाद भूतपूर्व सैनिक का दर्जा देकर सेवानिवृत्त किया जाता था। पर ट्रेनिंग के खर्च के हिसाब से मात्र पांच वर्ष की सेवा आर्थिक रूप से सैन्य बजट पर बोझ बन रही थी। इसलिए बाद में इसको 5.5.4 यानी कुल 14 वर्षों तक एक्सटेंडेबल और वर्तमान में शॉर्ट सर्विस कमीशन को 10.4 वर्ष के लिए कर दिया गया है। इसमें 10 या 14 वर्ष की सेवा के बाद अधिकारी को बिना किसी पेंशन के मात्र भूतपूर्व सैनिक का दर्जा देकर सेवानिवृत्त किया जाता है। इस निर्णय से सेना की ट्रेनिंग पर किए गए खर्चे की तो भरपाई ठीक हो रही थी, पर 10 या 14 साल के बाद बिना पेंशन के सेवानिवृत्त होने से सिविल में दोबारा किसी कार्य को शुरू करना मुश्किल होता है। ट्रेनिंग के खर्च तथा अन्य चीजों को ध्यान में रखते हुए एक अधिकारी को कम से कम 20 तथा सिपाही को 15 साल की सेवा देना अनिवार्य होता है और इसके बाद ली गई सेवानिवृत्ति से ही भूतपूर्व सैनिक का दर्जा तथा पेंशन का बेनिफिट मिलता है। इस सब के बीच में पिछले दिनों जब टुअर ऑफ  ड्यूटी की बात की गई तो उस पर अलग-अलग  प्रतिक्रिया आने लगी कि अगर एक सिपाही और अधिकारी के प्रशिक्षण पर किए गए खर्च को पूरा करने के लिए उसे कम से कम अधिकारी को 20 वर्ष और सिपाही को 15 वर्ष की सेवाएं देना जरूरी है तो फिर सिर्फ तीन साल के बाद ही अधिकारी और सैनिक को सेवानिवृत्त कर देने से यह आर्थिक रूप से सही निर्णय कैसे हो सकता है। पर अगर इस सुझाव को व्यवस्थित ढंग  और अच्छी प्लानिंग से लागू किया जाए जिसमें  टूअर आफ  ड्यूटी के नाम से सेना में शामिल होने वाले सैनिकों एवं अधिकारियों के प्रशिक्षण की अवधि को कम कर मात्र तीन से छह महीने तक रखा जाए और उसमें सिर्फ सीआई ऑप्स और गोरिल्ला वार फेयर की ही ट्रेनिंग पर मुख्य तवज्जो देने के साथ-साथ फिजिकल फिटनेस और डिसिप्लिन तक ही सीमित रखा जाए और बचे हुए ढाई साल इन अधिकारियों व सैनिकों को सीआई ऑप्स में ही सेवाएं देने का मौका दिया जाए तथा तीन साल के सेना के अनुभव के साथ इन्हें कुछ लंपसम धन राशि देकर, दूसरा करियर चुनने में प्राथमिकता के साथ सेवानिवृत्ति दी जाए। इससे सेना के आर्थिक बजट पर भी ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा और देश को भी अच्छे डिसिप्लिन और प्रशिक्षित युवा मिलेंगे जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी एक मिसाल के तौर पर आगे बढ़ पाएगी।