सेना में सीएसडी सुविधा

कर्नल मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

देश की सेना का हिस्सा बनना हर नागरिक के लिए बड़े गर्व की बात है। सैनिक बनना कोई नौकरी या मात्र जीविका कमाने के लिए 9 से 5 बजे के बीच की 8 घंटे की ड्यूटी देने तक सीमित नहीं वल्कि 24*7 की वालंटियर या स्वैच्छिक सेवाए अलग सभ्यता एवं अलग जीवन यापन का एक तरीका है। सेना में सैनिक एक परिवार की तरह रहते हैं, प्रोफेशनल काम के अलावा, चिकित्सा एवं जरूरत की हर चीज का प्रबंध कैंपस के अंदर ही होता है। इसी के चलते दिनचर्या में इस्तेमाल किए जाने वाले हर सामान जैसे तेल, साबुन आदि के लिए सीएसडी यानी कैंटीन स्टोर डिपार्टमेंट या यूआरसी की सुविधा का इंतजाम होता है। सेना की छोटी से छोटी टुकड़ी जब भी स्थायी या अस्थायी तौर पर किसी दुर्गम क्षेत्र या शहर गांव से दूर जाती है तो कैंटीन भी इसका हिस्सा होती है। कैंटीन में कुछ टैक्स माफ  होने की वजह से सामान बाकी दुकानों से सस्ता होता है। जिसके कारण ज्यादातर सिविलियन फौजी से दोस्ती करते हैं। सैनिकों को यह सुविधा सेवानिवृत्ति के बाद भी दी जाती है। जिसमें हर सैनिक को उसके रैंक के अनुसार एक फिक्स अमाउंट तक का सामान लेने का प्रावधान होता है। इस सुविधा का गलत इस्तेमाल न हो उसके लिए हर सैनिक को एक कम्ंप्यूटराइज चिप युक्त कार्ड उपलब्ध करवाया जाता है, जिसमें उसके हर लेन-देन का हिसाब रहता है। भूतपूर्व सैनिकों की कैंटीन का जिम्मा नजदीकी स्टेशन हैडक्वार्टर या सव एरिया का होता है, पर फौजी काम में व्यस्त एवं कैंटीन का कंटोनमेंट से दूर होने के कारण वह इस सुविधा पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते, दूसरा भूतपूर्व सैनिकों की संख्या में लगातार वृद्धि तथा कैंटीन काउंटर की लिमिटेड फेसेलिटी के चलते सामान की सप्लाई एडिक्येट नहीं हो पाती। जिससे वर्तमान में भूतपूर्व सैनिकों के लिए कैंटीन सुविधा एक सहायता कम और कठिनाई ज्यादा हो गई है। वार्डर पर दुश्मनों के सामने न झुकने वाले फौजी अकसर सामान की लिस्ट लिए कैंटीन के बाहर लाइन में खड़े, धक्के खाते दिखते हैं। बेहतर होगा कि सेवानिवृत्ति सैनिकों की इस सुविधा को बंद कर उनके रैंक के अनुसार एक महीने में मिल रहे आर्थिक लाभ को कैलकुलेट कर वो राशि उनकी पेंशन में जोड़ दी जाए, जिससे भूतपूर्व सैनिक भी अपनी इच्छा से आधुनिक दुकान या माल में जाकर सामान ले सके या फिर डीजीआर के जरिए भूतपूर्व सैनिकों को योग्यता अनुसार  कैंटीन काउंटर अलाट कर जरूरत के मुताबिक इनकी संख्या बढ़ाकर सामान की सप्लाई सुचारू की जाए। इससे रिंपलाइमेंट के अवसर बढ़ेंगे, सेवारत फौजी कैंटीन छोड़ अपने काम को समय दे पाएंगे और भूतपूर्व सैनिकों की सुविधा में सुधार हो जाएगा।