सेवा में समर्पित होम गार्ड्स

बी.एस. माहल 

लेखक, धर्मशाला से हैं

हिमाचल होम गार्ड्स का वर्तमान प्रारूप जो वर्तमान हम देखते हैं, ऐसा नहीं था। इन स्वयं सेवकों ने प्रदेश में उस समय अपनी सेवाएं प्रदेश सरकार को देनी शुरू की जब भारत-चीन युद्ध का समय व कठिन दौर से देश जूझ रहा था। देश और प्रदेश की वित्तीय व सैनिक स्थिति उस समय बहुत कमजोर थी। लेकिन इस देव धरती के सूपतों ने उस समय भी किन्नौर जैसे दुर्गम क्षेत्र में अपनी सेवाएं अर्धसैनिक बलों के साथ भी दी जब इन्हें मात्र 50 पैसे सरकार दैनिक भत्ते के रूप में देती थी, परंतु इन वीरों ने मात्र देश की सेवा को सर्वोपरि समझा, वहां विपरीत हालात में इन्होंने अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन किया था।

इस स्वयं सेवक संस्था की शुरुआत बहुत कठिन दौर से गुजरी है। 1962 में युद्ध के दौरान प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा.वाईएस परमार ने प्रदेश के संसाधनों को देखते हुए एक ऐसे बल की चाहत प्रकट की जो वित्तीय लाभ न मांगे परंतु जब सरकार चाहे तो वह देश की आंतरिक सुरक्षा में पुलिस व अन्य अर्ध-सैनिकों के साथ वर्दी धारी के रूप में अपनी सेवाएं दें। उन्होंने यह चर्चा अर्की के वाधल स्टेट के युवराज राजेंद्र सिंह से की। क्योंकि युवराज का प्रदेश में उस समय बहुत राजनीतिक मेल-मिलाप था। परमार साहिब ने भांप लिया था  कि राजनीतिक क्षेत्र में यह मुझे कभी भी शिकस्त दे सकता है। इसलिए परमार साहिब ने गहन विचार करके युवराज को होम गार्ड्स विभाग का कमांडेंट जनरल बनाने की पेशकश दी जो रुतबा आज डायरेक्टर जनरल पुलिस का है।

परमार साहिब ने राजिंदर सिंह को मनाया ही नहीं बल्कि शाही परिवार से संपन्न होने की वजह से उन्हें मास का वेतन मात्र एक रुपया लेने पर मना लिया व राजा साहिब ने बहुत ही मेहनत व लगन से विभाग के उत्थान के लिए प्रयत्न शुरू किए। कुछ ही वर्षों में प्रदेश के 12 जिलों में इस का गठन कर दिया गया। जिला स्तर पर कमांडेंट के पद सृजित किए गए, उसमें आर्मी से सेवा निवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति की गई व कुछ पुलिस कप्तान भी डेपुटेशन से लिए। इन अधिकारियों और जवानों के सहयोग से हिमाचल होम गार्ड्स पूरे देश में होम गार्ड्स के दूसरे राज्यों से हर स्पर्धा में अव्वल रहने लगी व परमार साहिब राजा राजिंदर सिंह से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने विभाग में जो चाहा वही हुआ। हर जिले में होम गार्ड्स के ट्रेनिंग सेंटर, विभाग को गाडि़यां, जवानों का वेतन इत्यादि सभी विषयों पर ध्यान दिया व जवानों का मनोबल बढ़ाया व प्रदेश के होम गार्ड्स के जवानों को देश के किसी भी प्रदेश में इलेक्शन के समय सबसे भरोसेमंद विभाग और सस्ता बल जानने लगा।

6 दिसंबर 1971 को होम गार्ड्स दिवस पर परमार साहिब ने राजा राजिंदर सिंह प्रदेश का अग्निशमन विभाग, पुलिस और म्युनिसिपल कमेटी से लेकर एक आत्म निर्भर विभाग बनाने के लिए घोषणा कर दी। राजा साहिब ने इस विभाग की तरफ भी ध्यान दिया व 10 जिलों के मुख्यालयों में फायर ब्रिगेड खोल दिए। बाद में राजा साहिब का विभाग को छोड़ना व पुलिस के डीजीपी के रैंक के अधिकारी का पद को हथियाना उनको नहीं भाया क्योंकि पुलिस के उच्च अधिकारी अपने उच्च पद का फायदा लेते हुए जो फायर इंजीनियरिंग के माप दंड जनहित में थे उनकी अनदेखी करने लगे, फल स्वरूप सेवाओं के निर्वहन में अड़चन आने लगी व वह यूपीएससी के माध्यम देहली फायर सर्विस के प्रमुख बन गए। 1971 से लेकर 2010 तक किसी भी कमांडेंट जनरल ने विभाग की सुध नहीं ली।

यहां तक कि होम गार्ड्स के कई डिवीजन कमांडेंट के पद खाली कर दिए। परंतु वी कमल कुमार आईपीएस ने इस विभाग की तरफ ध्यान दिया व होम गार्ड्स के कई पद पदोन्नति व सीधी भर्ती से भरे गए। आज भी जिला स्तर पर कई जिलों में पुलिस अधीक्षक इस पद पर बैठे हैं जिसके कारण इसके अपने कैडर के अफसरों की अनदेखी हो रही है। प्रदेश में आज भी होम गार्ड्स के उच्च पद पर डिप्टी कमांडेंट जनरल बैठा है जबकि इसमें बढ़ोतरी भी आवश्यक है।

 

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