Monday, June 01, 2020 01:45 AM

हमें रचनात्मक रहना है

एसआर हरनोट

मो.-9816566611

कर्फ्यू के भीतर साहित्यिक जिंदगी-5

मन के ताले खोले बैठे साहित्य जगत के सृजन को कर्फ्यू कतई मंजूर नहीं। मुखातिब विमर्श की नई सतह पर और विराम हुई जिंदगी के बीचों-बीच साहित्य कर्मी की उर्वरता का कमाल है कि कर्फ्यू भी सृजन के नैन-नक्श में एक आकृति बन जाता है। ऐसे दौर को हिमाचल के साहित्यकारों, लेखकों और पत्रकारों ने कैसे महसूस किया, कुछ नए को कहने की कोशिश में हम ला रहे हैं यह नई शृांखला और पेश है इसकी पांचवीं किस्त...

-गतांक से आगे...

संवाद से ही प्रकाशित उपमा ऋचा द्वारा अनुवादित मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘स्वीकार’ भी पढ़ा जिसमें जीवन की विसंगतियों का मार्मिक चित्रण किया गया है। इसी क्रम में वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं के संग्रहों-घर एक यात्रा है, चट्टान पर लड़की, बात करती है हवा, आदमी की दुनिया का दिन और शहर एक मोंटाज है-से दोबारा गुजरना सुखद लगा। श्रीनिवास जी को पढ़ना और समझना धैर्य मांगता है। इसी के साथ सुरेश सेन निशांत के दोनों कविता संग्रह-वे जो लकड़हारे नहीं थे और कुछ थे जो कवि थे-को दोबारा पढ़ना उनको बहुत गहरे स्मरण करना भी था। चर्चित कवि आत्मारंजन का कविता संग्रह ‘पगडंडियां गवाह हैं’ को बार-बार पढ़ना जैसे नए और दुलर्भ संदर्भों को तलाशना है। बहुत सी किताबें सहेजी हैं जिन्हें धीरे-धीरे पढ़ूंगा...पता नहीं यह स्थिति कब तक रहेगी... जिसमें न चाहते हुए भी रचनात्मक होना अनिवार्य है...यह उम्र का तकाजा भी है और दुनिया भर के डॉक्टर मान रहे हैं कि कोरोना को हमउम्र साठ पार के लोगों की ज्यादा तलाश है। बजाय इसके कि डर और अवसाद के साथ मृत्यु आए, क्यों न अच्छी किताबों के साथ दुनिया से विदा ली जाए। मैं बार-बार सोचता हूं कि हमने जिस तरह प्रकृति का विनाश किया है, वह अकल्पनीय है। इस पृथ्वी के साथ जो अत्याचार हुए हैं वे भयावह हैं। हमने यह सोचना छोड़ दिया है कि हमारी सत्ता से कहीं ताकतवर एक दूसरी सत्ता भी है, जो इस पृथ्वी को संचालित करती है। हम उस पर अपना आधिपत्य चाहते हैं। हमने अपने हाथों से जल, जंगल और जमीन तीनों को नष्ट कर दिया है। आज हमारे पास न जल है, न जंगल है, न जमीन ही बची है, बस महज कंकरीट के जंगल हैं, उजाड़ और रूखे खेत हैं, वनस्पतिहीन पहाडि़यां हैं और तकनीक से संचालित हमारी जिंदगी है जो वास्तविकता से कहीं दूर है। हम अंतहीन अहंकार की दौड़ में शामिल हो चुके हैं। कुछ बचा भी है तो वह प्रदूषित है और हम अपने ही रचे नर्क में रहने को अभिशप्त हैं।

सोचता हूं कि इस लॉकडाउन ने जाने-अनजाने प्रकृति को नया जीवन दिया है। जैसे वह खुले में सांसें लेने लगी है। हमारी कैद से वह आजाद होने लगी है। हम अपने ही निर्मित जाल में फंसे जीवन और मृत्यु के बीच सांस लेने को मजबूर हैं...। यह पकृति बचेगी तभी मानवता बची रहेगी और अब समय आ गया है कि हम बहुत गंभीरता से इस ओर सोचें और ध्यान दें। इतिहास गवाह है कि कोई भी विश्व युद्ध या महामारी या आततायियों द्वारा किए गए जनसंहार सभ्यताओं को समाप्त नहीं कर पाए हैं। यह सिद्ध करता है कि विकट अंधेरों के बाद रोशनी की उम्मीदें बरकरार रहती हैं। यह समय भी निकलेगा ही। मनुष्य के साहस, इच्छाशक्ति और मनोबल के आगे कोई भी अवसाद और निरुत्साह नहीं टिक पाया है...। विश्व को अब यह भी सोचना है कि यदि पृथ्वी और प्रकृति को बचाना है तो इस घोर महामारी के समय के लॉकडाउन को भविष्य में सप्ताह या महीने में एक या दो दिन के लॉकडाउन में बदलना जरूरी है। इससे बड़ा और सशक्त उपाय शायद ही प्रदूषण को कम करने के लिए कोई बचा हो। समय बदलेगा, जरूर बदलेगा, वह पता नहीं असमय मौत की कितनी कुर्बानियां क्यों न ले ले, वह बदलेगा ही। हम और आप फिर से साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ पकड़े बाजार में किसी रेस्तरां में जरूर चाय पीने जाएंगे, तपाक से गले भी मिलेंगे...उस समय तक इस भयानक मौत के सन्नाटे के हम फिर आदी हो जाएंगे...अथाह बजट होगा, इंजेक्शन-दवाइयां उपलब्ध हो जाएंगी, किसी एक-दो देश की अर्थव्यवस्था और शेयर मार्केट आसमान को छूते नजर आएंगे। हम आराम से, बिना उंगलियों में सेनेटाइजर लगाए अपने घर का दरवाजा खोलने लगेंगे और किसी एटीएम से बिना संकोच अपने क्रेडिट या डेबिट कार्ड से दो-चार सौ रुपए निकालकर आश्वस्त होने लगेंगे कि सब कुछ अच्छा है...किताबें छपने लगेंगी। प्लेग शीर्षक से न सही, कोरोना से ही...फिर वही सब...धर्म पर बहसें, चुनाव की तिक्कड़में। और भी बहुत कुछ। मीर तकी मीर कहते हैं:

आग कितनी ही खौफनाक सही

उसकी लपटों की उम्र थोड़ी है। चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना वायरस अब तक विश्वभर में लाखों जानें ले चुका है। भारत में तो यह महामारी अब हिंदू-मुस्लिम का रूप भी लेती दिखाई दे रही है। चारों तरफ  दहशत का माहौल निर्मित हो रहा है या किया भी जा रहा है। ऐसे समय में मैं इस आख्यान का अंत 1899 में बंगाल में आए प्लेग (महामारी) और स्वामी विवेकानंद की ‘प्लेग मैनिफेस्टो’ को याद करते हुए करना चाहता हूं जो हमें मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से समस्याओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। इसे बंगाली और हिंदी दोनों भाषाओं में तैयार किया गया था, जिसे स्वामी सदानंद और भगिनी निवेदिता की कड़ी मेहनत से जनसंख्या के एक बड़े हिस्से तक पहुंचाया गया था। अपने ‘प्लेग मैनिफेस्टो’ में विवेकानंद कहते हैं ः ‘भय से मुक्त रहें क्योंकि भय सबसे बड़ा पाप है। मन को हमेशा प्रसन्न रखो। मृत्यु तो अपरिहार्य है, उससे भय कैसा। कायरों को मृत्यु का भय सदैव द्रवित करता रहता है।’ उन्होंने इसी डर को दूर करने का आग्रह और प्रयास किया, ‘आओ हम इस झूठे भय को छोड़ दें और भगवान की असीम करुणा पर विश्वास रखें (यहां भगवान प्रकृति है)। अपनी कमर कस लें और सेवा कार्य के क्षेत्र में प्रवेश करें। हमें शुद्ध और स्वच्छ जीवन जीना चाहिए। रोग, महामारी का डर आदि ईश्वर की कृपा से विलुप्त हो जाएगा।’ निःसंदेह इसमें ईश्वर की कृपा की परिकल्पना हमारे भीतर का आत्मबल और विश्वास ही है। आज चाहे मनुष्य अकेला है, उसे अकेले ही अतीव उत्साह और अभयता के साथ खड़े रहना है। रचनात्मक होना है। हमारे पास आज न जाने कितने संत, महात्मा और बाबे-गुरु हैं, मौलवी हैं, पर स्वामी विवेकानंद जैसा कोई नहीं। मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे हैं, लेकिन जो हम और आपकी गाढ़ी कमाई को इमोशनल ब्लैकमेलिंग से अल्लाह और ईश्वर के नाम की तिजोरियों में डालते नहीं थकते थे, आज न उनके प्रवचन काम आ रहे हैं न ही उनके चमत्कार। न देव पंचायतें कुछ कर पा रही हैं और न देवी-देवता। अल्लाह के दर से इधर इस महामारी को दूर-दूर तक फैलाने के षड्यंत्र इजाद हो रहे हैं...इस विकट समय में काम आएगी तो केवल मानवता, मनुष्यता और मनुष्य का अपनापन, आपसी सहयोग, स्नेह, विश्वास, आत्मबल और अदम्य साहस।                (समाप्त)